क्योंकि हमारी धरती गोल है और घूमती रहती है। जब हमारे यहाँ रात होती है, तब धरती के दूसरी ओर दिन होता है। किरन वहीं चली जाती है। उसी हिस्से को कविता में “दूसरी दुनिया” कहा गया है।
दुनिया में मैं जाती हूँ।
बच्चे जो बिस्तर में सोए
होते, उन्हें जगाती हूँ।”
किरन के इस उत्तर के पीछे तीन बातें हैं —
- यह विज्ञान की सच्ची बात है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उसका जो भाग सूरज के सामने आता है, वहाँ दिन हो जाता है और पीछे वाले भाग में रात। यही बात पुस्तक ने पृष्ठ 6 के इसे भी जानिए बक्से में समझाई है।
- वह बालिका को समझा रही है। बालिका सोच रही थी कि किरन “सुख से सोई होगी”। किरन बताती है कि वह सोती नहीं — उसका काम कहीं और चलता रहता है।
- “दूसरी दुनिया” कहना ज़्यादा सुंदर लगता है। कवि चाहते तो लिख देते “पृथ्वी के दूसरे भाग में जाती हूँ।” पर बच्चों की कविता में दूसरी दुनिया कहने से मन में एक जादू-सा दृश्य बनता है — जैसे किरन कोई सहेली हो जो दूर किसी अनजाने देश की सैर पर निकल जाती हो।