पहले पृष्ठ 128 पर दी गई बात समझ लीजिए। पुस्तक बताती है कि पंचतंत्र का प्रसार समय के साथ अरब देशों और यूरोप तक हुआ। प्राचीन यूनान (आज का ग्रीस) में रची गई ईसप की दंतकथाएँ भी पंचतंत्र की प्रेरणा से ही बनीं। दंतकथा यानी वह कहानी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मुँह से मुँह तक चलती आई हो। ‘लोमड़ी और अंगूर’ या ‘खट्टे हैं अंगूर’ इन्हीं में से एक है।
चित्र में क्या दिख रहा है — एक ऊँचा पेड़ है जिस पर अंगूर की बेल चढ़ी है। ऊपर अंगूर के हरे-पीले गुच्छे लटक रहे हैं। नीचे एक लोमड़ी अपने पिछले पैरों पर खड़ी होकर, गर्दन ऊपर उठाकर उन्हीं गुच्छों को देख रही है। पीछे पहाड़ और हरी घास है।
अच्छी कहानी में ये चार बातें ज़रूर होनी चाहिए —
- शुरुआत: लोमड़ी कौन थी, कहाँ थी, और उसे भूख क्यों लगी थी।
- इच्छा: उसने अंगूर देखे और उन्हें पाने की कोशिश की।
- कोशिश और हार: उसने कई बार उछलकर देखा, पर अंगूर बहुत ऊँचे थे।
- अंत और सीख: हारकर उसने कहा “अंगूर खट्टे हैं” और चली गई।
नमूना उत्तर — कहानी के रूप में:
एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। एक दिन वह सवेरे से भोजन की खोज में घूम रही थी। दोपहर हो गई, पर उसे कुछ नहीं मिला। भूख से उसका पेट जलने लगा।
घूमते-घूमते वह एक बगीचे के पास पहुँची। वहाँ एक ऊँचा पेड़ था और उस पर अंगूर की बेल चढ़ी हुई थी। बेल पर पके हुए अंगूर के बड़े-बड़े गुच्छे लटक रहे थे। धूप में वे चमक रहे थे। लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया।
उसने सोचा — “बस, आज तो पेट भर जाएगा।” वह पिछले पैरों पर खड़ी हुई और गर्दन ऊपर उठाकर अंगूर तक पहुँचने की कोशिश करने लगी। पर अंगूर बहुत ऊँचे थे। फिर वह थोड़ा पीछे हटी, दौड़कर आई और ज़ोर से उछली। अंगूर फिर भी हाथ न आए।
उसने बार-बार कोशिश की। कभी पत्थर पर चढ़कर उछली, कभी पेड़ के तने से टेक लगाई। पर हर बार वह नीचे ही गिरी। अब वह थक चुकी थी और उसकी साँस फूल रही थी।
आख़िर में उसने अंगूरों की ओर देखा और मुँह बनाकर बोली — “छोड़ो! ये अंगूर तो खट्टे हैं। ऐसे अंगूर भला कौन खाता है!” यह कहकर वह वहाँ से चल दी।
सीख: जो चीज़ हमें नहीं मिलती, उसे बुरा कह देना आसान होता है। पर सच यह है कि उससे न चीज़ मिलती है, न मन को शांति। ठीक यह है कि या तो और कोशिश करो, या हार मानकर सच बोलो — “मुझसे यह नहीं हो सका।”
नमूना उत्तर — कविता के रूप में:
ऊँचे पेड़ पर बेल दिखाई।
लटके थे अंगूर सुनहरे,
देख-देखकर मन ललचाई॥
पंजों पर वह खड़ी हो गई,
गरदन ऊपर बड़ी हो गई।
उछली, कूदी, दौड़ लगाई,
पर हर बार वहीं गिर आई॥
हाँफ रही थी, थक भी गई थी,
आँखों में बस लालच ही थी।
मुँह बनाकर बोली धीरे —
“खट्टे हैं ये अंगूर मेरे!”॥
सीख यही है, प्यारे भाई —
मिले नहीं तो दोष न लाई।
या तो फिर से यत्न करो तुम,
या फिर सच कह दो — “हम हारे”॥
| चित्र का भाग | कहानी में उसे कैसे लिखें |
|---|---|
| ऊँचा पेड़ और उस पर चढ़ी बेल | “एक ऊँचा पेड़ था और उस पर अंगूर की बेल चढ़ी हुई थी।” |
| अंगूर के लटकते गुच्छे | “बेल पर पके अंगूर के बड़े-बड़े गुच्छे लटक रहे थे।” |
| पिछले पैरों पर खड़ी लोमड़ी | “वह पिछले पैरों पर खड़ी होकर अंगूर तक पहुँचने की कोशिश करने लगी।” |
| ऊपर उठी हुई गरदन और नज़र | “उसकी नज़र अंगूरों पर टिकी थी और मुँह में पानी आ रहा था।” |
| पीछे के पहाड़ और खुला मैदान | “वह जंगल में भोजन की खोज में दूर-दूर तक घूम आई थी।” |