प्रत्युत्पन्नमति पहले से समाधान करना ज़रूरी नहीं समझती थी, क्योंकि उसे अपनी तेज़ बुद्धि पर पूरा भरोसा था। उसे लगता था कि मुसीबत आने पर वह उसी समय हल निकाल लेगी। पाठ में यह बात इन शब्दों में है —
आवश्यकता नहीं समझती थी क्योंकि उसकी सूझ-बूझ इतनी पैनी थी कि वह
समय पड़ने पर किसी भी उलझन का हल क्षण भर में निकाल लेती थी।”
तीन शब्द समझ लीजिए — आशंकित यानी जिसका डर हो। सूझ-बूझ यानी समझदारी। पैनी यानी बहुत तेज़, चाकू की धार जैसी।
उसका यह भरोसा झूठा नहीं था। कहानी में उसने यह करके भी दिखाया —
- जाल में फँसते ही उसने घबराने के बजाय सोचना शुरू किया — “अब प्रत्युत्पन्नमति अपने बचने का उपाय बड़ी तीव्रता से सोचने लगी।”
- मछुआरों की बातचीत सुनकर उसने पहचान लिया कि उन्हें स्वस्थ और जीवित मछलियाँ ही चाहिए।
- उसी क्षण उसने शरीर सिकोड़ लिया, आँखें बंद कीं और मरी हुई-सी बन गई।
- मछुआरों ने उसे जाल से निकालकर सरोवर में फेंक दिया और उसकी जान बच गई।