कक्षा ५ हिंदी अध्याय 10 सोचिए और लिखिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
प्रत्युत्पन्नमति पहले से ही समस्या का समाधान करने की आवश्यकता क्यों नहीं समझती थी?
उत्तर

प्रत्युत्पन्नमति पहले से समाधान करना ज़रूरी नहीं समझती थी, क्योंकि उसे अपनी तेज़ बुद्धि पर पूरा भरोसा था। उसे लगता था कि मुसीबत आने पर वह उसी समय हल निकाल लेगी। पाठ में यह बात इन शब्दों में है —

“वह भविष्य की किसी भी आशंकित समस्या का पहले से समाधान करने की
आवश्यकता नहीं समझती थी क्योंकि उसकी सूझ-बूझ इतनी पैनी थी कि वह
समय पड़ने पर किसी भी उलझन का हल क्षण भर में निकाल लेती थी।”

तीन शब्द समझ लीजिए — आशंकित यानी जिसका डर हो। सूझ-बूझ यानी समझदारी। पैनी यानी बहुत तेज़, चाकू की धार जैसी।

उसका यह भरोसा झूठा नहीं था। कहानी में उसने यह करके भी दिखाया —

  1. जाल में फँसते ही उसने घबराने के बजाय सोचना शुरू किया — “अब प्रत्युत्पन्नमति अपने बचने का उपाय बड़ी तीव्रता से सोचने लगी।”
  2. मछुआरों की बातचीत सुनकर उसने पहचान लिया कि उन्हें स्वस्थ और जीवित मछलियाँ ही चाहिए।
  3. उसी क्षण उसने शरीर सिकोड़ लिया, आँखें बंद कीं और मरी हुई-सी बन गई।
  4. मछुआरों ने उसे जाल से निकालकर सरोवर में फेंक दिया और उसकी जान बच गई।
नाम में ही उत्तर छिपा है: प्रत्युत्पन्नमति का अर्थ है — जिसकी मति (बुद्धि) उसी क्षण उपज आए। जिस मछली की बुद्धि मौके पर ही काम कर जाती हो, वह पहले से तैयारी करना ज़रूरी नहीं समझती। पाठ स्वयं कहता है कि तीनों मछलियाँ “अपने नाम के अर्थ को सार्थक करती थीं।”
पर सोचने की बात यह भी है: यह तरीका जोखिम भरा है। प्रत्युत्पन्नमति बच तो गई, पर उसे जाल में फँसना पड़ा। अनागतविधाता को तो जाल देखना भी नहीं पड़ा। इसलिए सबसे अच्छा रास्ता यह है — पहले से भी सोचो, और मौके पर भी तैयार रहो।
प्र2.
सभी मछलियों के भयभीत होने का क्या कारण था?
उत्तर

सभी मछलियाँ इसलिए डर गईं क्योंकि उन्हें पता चल गया कि अगली सुबह दो मछुआरे बड़ा जाल लेकर आएँगे और उन सबको पकड़ लेंगे। यह उनकी जान का खतरा था।

बात इस तरह उन तक पहुँची —

  1. मछुआरों ने योजना बनाई। — “भाई कल सवेरे हम यहाँ बड़ा जाल लेकर आएँगे और इन सब मछलियों को पकड़ेंगे।”
  2. तीनों मछलियों ने वह बात सुन ली। — “मछुआरों की बातें तीनों मछलियों ने सुन लीं।”
  3. उन्होंने तुरंत सभा बुलाकर सबको बताया। — “अनागतविधाता ने सब मछलियों को संबोधित करके बताया कि दो मछुआरे अगले दिन सवेरे सरोवर पर जाल डालकर सब मछलियों को पकड़ने की योजना बना रहे हैं।”
  4. तब सब डर गए। — “यह सुनकर सब मछलियाँ भयभीत हो गईं और पूछने लगीं कि क्या करना चाहिए।”

भयभीत यानी डरा हुआ। उनका डर तीन बातों से बना था —

डर की वजहमछलियों के लिए इसका अर्थ
खतरा जान का थापकड़े जाने का मतलब था जीवन का अंत — मछुआरे मछलियाँ बेचने के लिए ले जाते हैं।
खतरा बहुत पास थामछुआरे “कल सवेरे” आने वाले थे। सोचने और बचने के लिए केवल एक रात थी।
खतरा सब पर थाजाल बड़ा था और “इन सब मछलियों को पकड़ेंगे” कहा गया था। कोई भी अपने को सुरक्षित नहीं मान सकता था।
डर का एक अच्छा काम भी हुआ: डरकर मछलियाँ चुप नहीं बैठीं — उन्होंने पूछा “क्या करना चाहिए?” यही सही सवाल था। डर तभी तक बुरा है जब तक वह हमें सोचने से रोके। जो डरकर भी उपाय पूछ ले, वह बच सकता है।
प्र3.
‘जो होना होगा सो तो होगा ही’, यह किस मछली का मानना या और वह ऐसा क्यों मानती थी?
उत्तर

यह यद्भविष्य नाम की तीसरी मछली का मानना था। वह ऐसा इसलिए मानती थी क्योंकि उसका विश्वास था कि सब कुछ भाग्य से तय होता है, इसलिए मेहनत करने और सोचने-विचारने से कोई लाभ नहीं

“तीसरी मछली का नाम था यद्भविष्य।… वह किसी भी संकट की संभावना पर
ध्यान नहीं देती थी तथा श्रम और चिंतन से बचती थी। उसका मत था कि यत्न
करने और सोचने-विचारने से कोई लाभ नहीं क्योंकि ‘जो होना होगा सो तो होगा ही
इसलिए सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देना चाहिए और निश्चिंत होकर आनंद से रहना चाहिए।”

शब्दों के अर्थ — श्रम यानी मेहनत। चिंतन यानी गहराई से सोचना। यत्न यानी कोशिश। निश्चिंत यानी बिना किसी चिंता के।

उसने यह बात केवल कही नहीं, उस पर चली भी। जब सभा में सबको खतरा बताया गया, तब भी उसने कहा —

“मैं तो अपने इस पुराने निवास स्थान को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी। भाग्य में जो
लिखा होगा वही होगा
, मुझे कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यदि भाग्य में बचना
लिखा होगा तो हम सब बच ही जाएँगे। हो सकता है मछुआरे आएँ ही नहीं।”

उसकी सोच में तीन कमियाँ थीं —

  1. उसने खतरे की पक्की खबर को भी टाल दिया। मछुआरों की बात सुनी हुई थी, फिर भी उसने कहा “हो सकता है मछुआरे आएँ ही नहीं।”
  2. उसने आलस को भाग्य का नाम दे दिया। पाठ साफ़ कहता है — “यद्भविष्य तो स्वभाव से ही आलस्यमयी थी।”
  3. उसने अपने साथ दूसरों को भी रोक लिया। “कुछ अन्य मछलियाँ जो यद्भविष्य की राय से सहमत थीं, वहीं रहीं।” वे भी जाल में फँसीं।
कहानी का निर्णय: कहानी ने उसकी सोच को गलत ठहराया — “यद्भविष्य की जान नहीं बच सकी।” उसका नाम भी यही कहता है: यद्भविष्य = यत् भविष्य, यानी ‘जो होगा’। नाम, स्वभाव और अंत — तीनों एक ही बात कहते हैं।
पुस्तक की एक बात: पुस्तक में यह प्रश्न छपा है — “यह किस मछली का मानना या और वह ऐसा क्यों मानती थी?” यहाँ ‘या’ छपाई की भूल जान पड़ती है; पढ़ना चाहिए “यह किस मछली का मानना था”। प्रश्न का अर्थ वही रहता है।
प्र4.
अनागतविधाता ने मछुआरों की योजना से बचने के लिए क्या उपाय सुझाया?
उत्तर

अनागतविधाता ने यह उपाय सुझाया कि सवेरा होने से पहले सब मछलियाँ यह सरोवर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चली जाएँ।

“अनागतविधाता ने कहा कि इस संकट से बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि
सवेरा होने से पहले हम सब यह सरोवर छोड़कर पास के ही दूसरे सरोवर में चले जाएँ।”

यह उपाय उसने एक क्रम में रखा —

  1. सबको इकट्ठा किया। — “उन्होंने तुरंत सरोवर की सभी मछलियों को बुलाकर एक सभा की।”
  2. खतरा साफ़-साफ़ बताया। — कि दो मछुआरे कल सवेरे जाल डालकर सबको पकड़ने वाले हैं।
  3. उपाय बताया। — रात में ही जगह छोड़ देना।
  4. उपाय पर स्वयं चली। — “अनागतविधाता और बहुत-सी मछलियाँ घर छोड़कर पास के दूसरे सरोवर में चली गईं।”

यह उपाय अच्छा क्यों था, इसे ऐसे समझिए —

उपाय की बातइसका लाभ
जाल आने से पहले हट जानाजब मछली वहाँ होगी ही नहीं, तो जाल में फँसने का प्रश्न ही नहीं उठेगा।
रात में जानामछुआरे सवेरे आने वाले थे। रात का समय बिना रुकावट निकल जाने का सही समय था।
पास के सरोवर में जानादूर जाने में थकान और नया खतरा होता। पास का सरोवर जल्दी और सुरक्षित पहुँच के भीतर था।
सब मिलकर जानाझुंड में जाने पर छोटी और कमज़ोर मछलियाँ भी पीछे नहीं छूटतीं।
यही उसका स्वभाव था: पाठ के आरंभ में ही लिखा है कि वह “भविष्य की संभावित समस्याओं का हल पहले से ही निकालकर रखती थी।” यहाँ उसने वही किया — खतरे की खबर मिलते ही, खतरा आने से पहले, हल निकाल लिया।
प्र5.
प्रत्युत्पन्नमति ने मछुआरों से बचने के लिए क्या उपाय किया?
उत्तर

प्रत्युत्पन्नमति ने मरी हुई मछली बनने का नाटक किया। उसने अपना शरीर सिकोड़ लिया और आँखें बंद करके निर्जीव-सी पड़ गई, जिससे मछुआरों ने उसे मरा हुआ समझकर वापस सरोवर में फेंक दिया।

उसने यह चार चरणों में किया —

  1. घबराने के बजाय सोचा। — “अब प्रत्युत्पन्नमति अपने बचने का उपाय बड़ी तीव्रता से सोचने लगी और उसे तुरंत सूझ गया कि क्या करना चाहिए।”
  2. मछुआरों की बातचीत से सुराग पकड़ा। — “मछुआरों की बातचीत से वह समझ गई कि उन्हें स्वस्थ और जीवित मछलियाँ ही चाहिए।”
  3. तुरंत वैसा रूप बना लिया जो उन्हें नहीं चाहिए था। — “उसने उसी क्षण अपना शरीर सिकोड़ लिया और आँखें बंद करके निर्जीव सी बनकर पड़ गई।”
  4. चुपचाप पड़ी रही, जब तक फेंकी न गई। — “मछुआरे मछलियों को सँभालने लगे तो देखा कि एक मरी हुई मछली है। उन्होंने तुरंत प्रत्युत्पन्नमति को जाल से निकालकर सरोवर में फेंक दिया।”
पाठ का निष्कर्ष —
“और अपनी प्रत्युत्पन्न बुद्धि के कारण उसकी जान बच गई।”
उपाय की असली चतुराई कहाँ थी: उसने मछुआरों से लड़ने या भागने की कोशिश नहीं की — जाल में यह संभव भी नहीं था। उसने वह बात पकड़ी जो मछुआरे चाहते थे, और ठीक उसका उलटा बन गई। जब आप किसी की चाहत जान लें, तो बचाव का रास्ता वहीं से निकलता है।
प्रकृति में भी ऐसा होता है: कई जीव खतरे के समय सचमुच मरा हुआ बनने का ढोंग करते हैं — जैसे कुछ भृंग (कीड़े) और साँप। इसे अंग्रेज़ी में ‘डेथ फ़ेगनिंग’ कहते हैं। कहानी की यह चतुराई सचमुच की दुनिया से ली गई है।
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