कक्षा ५ हिंदी अध्याय 11 बातचीत के लिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
आपकी छुट्टियाँ कब-कब होती हैं? आप छुट्टियों में कहाँ-कहाँ जाते हैं?
उत्तर

यह आपके अपने जीवन का प्रश्न है, इसलिए उत्तर हर बच्चे का अलग होगा। कक्षा में बताते समय दो बातें ज़रूर कहिए — छुट्टी कब होती है, और आप कहाँ जाते हैं।

विद्यालय में छुट्टियाँ प्रायः इन समयों पर होती हैं —

छुट्टीकब होती हैप्रायः कितने दिन
दशहरे की छुट्टीसितंबर–अक्तूबर मेंलगभग एक सप्ताह
दीपावली की छुट्टीअक्तूबर–नवंबर मेंकुछ दिन
जाड़े की छुट्टीदिसंबर–जनवरी मेंलगभग दो सप्ताह
गरमी की छुट्टीमई–जून मेंसबसे लंबी छुट्टी
रविवार और त्योहारहर सप्ताह, तथा होली, ईद, क्रिसमस आदि परएक या दो दिन
नमूना उत्तर: मेरी छुट्टियाँ साल में तीन बार होती हैं — दशहरे में, जाड़े में और गरमी में। सबसे लंबी छुट्टी गरमी की होती है। गरमी की छुट्टियों में मैं अपने नाना-नानी के गाँव जाता हूँ। वहाँ मैं तालाब के किनारे घूमता हूँ और आम के बगीचे में खेलता हूँ। पिछले दशहरे में हम सब मिलकर पास के किले को देखने गए थे। दीपावली की छुट्टी में मैं घर पर ही रहकर दीये सजाता हूँ।
पाठ से जोड़िए: पाठ में भी निशा दशहरे की छुट्टियों में ही अजंता और एलोरा गई थी। छुट्टी का असली मज़ा तभी है जब हम कुछ नया देखें या सीखें — जैसे निशा ने दो हजार साल पुराने चित्र देखे।
प्र2.
अजंता और एलोरा की गुफाओं के भीतर दीवारों पर अत्यंत सुंदर चित्र बने थे। आपके घर और घर के आस-पास कौन-कौन से चित्र बने या लगे हैं?
उत्तर

अपने घर में और घर के आस-पास ध्यान से देखिए। चित्र दो तरह के मिलेंगे — कुछ दीवार पर बने हुए, और कुछ लगाए हुए (यानी बनाकर टाँगे हुए)।

कहाँकैसे चित्र प्रायः मिलते हैं
घर की बैठक की दीवार परपरिवार की तसवीरें, देवी-देवताओं के चित्र, कैलेंडर के चित्र
घर के मुख्य द्वार पररंगोली, स्वस्तिक, शुभ-लाभ, आम के पत्तों का तोरण
रसोई या आँगन की दीवार परफूल-बेल की बनी हुई चित्रकारी, हाथ की छाप
विद्यालय की दीवार परवर्णमाला, गिनती, महापुरुषों के चित्र, नक्शे
गली, बस-अड्डे और दुकानों परदुकानों के रंगीन बोर्ड, दीवारों पर बने संदेश-चित्र
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे मेंदीवारों और छत पर बनी बेल-बूटे और कथाओं की चित्रकारी
नमूना उत्तर: मेरे घर की बैठक में दादा जी की एक बड़ी तसवीर लगी है और उसके पास एक कैलेंडर है जिस पर पहाड़ों का चित्र छपा है। रसोई की दीवार पर मेरी माँ ने हरे रंग से बेल-बूटे बनाए हैं। दीवाली पर हम दरवाज़े के आगे रंगोली बनाते हैं। मेरे विद्यालय की बाहरी दीवार पर भारत का नक्शा बना है। पास की दुकान के बोर्ड पर एक बड़ी-सी चाय की प्याली बनी है।
सोचने की बात: अजंता के चित्र दीवार पर बने थे और दो हजार साल टिके रहे। हमारे घर की रंगोली एक दिन में मिट जाती है। दोनों ही कला हैं — फ़र्क़ बस इतना है कि एक पत्थर पर बनी और एक ज़मीन पर।
प्र3.
आपके घर में कौन-कौन और कहाँ-कहाँ चित्रकारी करते हैं? (जैसे – कागज पर, धरती पर, दीवारों पर, मिट्टी की वस्तुओं पर, कपड़ों पर आदि।)
उत्तर

घर में चित्रकारी सिर्फ़ चित्रकार ही नहीं करते। हम सब कुछ-न-कुछ बनाते हैं। पहले सोचिए कौन बनाता है, फिर किस चीज़ पर

कौनकहाँ बनाते हैंक्या बनाते हैं
माँधरती पर, द्वार के आगेरंगोली, चौक, अल्पना
दादीदीवार पर और मिट्टी के घड़े परबेल-बूटे, फूल, हाथ की छाप
बड़ी बहनकपड़ों परदुपट्टे और रूमाल पर कढ़ाई तथा रंग
मैं और मेरा छोटा भाईकागज पर और चित्रकला की कापी मेंपेड़, घर, चिड़िया, अपने विद्यालय का चित्र
पिता जीदीवार पर, त्योहार के समयरंग-रोगन और सादे बेल-बूटे
नमूना उत्तर: मेरे घर में सबसे अधिक चित्रकारी मेरी माँ करती हैं। वे दीपावली और तीज-त्योहार पर द्वार के आगे धरती पर रंगोली बनाती हैं। मेरी दादी मिट्टी के घड़े और दीयों पर सफ़ेद और लाल रंग से फूल बनाती हैं। मेरी बहन कपड़े पर कढ़ाई करती है। मैं कागज पर पेंसिल और रंगों से चित्र बनाता हूँ। पिछली बार मैंने अपनी कापी में पहाड़ और उगता हुआ सूरज बनाया था।
ध्यान दीजिए: अजंता के कलाकारों ने भी पत्थर की दीवार को ही अपना कागज बनाया था। कला के लिए महँगी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती — जो सामने है, उसी पर बनाया जा सकता है।
प्र4.
गुफाओं के चित्र देखते ही निशा के मुँह से ‘वाह!’ क्यों निकला? आपके मुँह से कब-कब ‘वाह!’ निकलता है?
उत्तर

निशा के मुँह से ‘वाह!’ इसलिए निकला क्योंकि गुफा की दीवारों के चित्र उसकी सोच से भी कहीं अधिक सुंदर और सजीव थे। जो चीज़ अचानक बहुत अच्छी लगे, उसे देखकर मुँह से अपने-आप ‘वाह!’ निकल जाता है।

पाठ की पंक्ति देखिए —

“गुफाओं के अंदर दीवारों पर अत्यंत सुंदर चित्र बने हैं।…
आदि के चित्र अत्यंत सजीव थे।…
उन्हें देखते ही निशा के मुँह से निकला, “वाह!”

‘वाह!’ निकलने के तीन कारण पाठ में साफ़ दिखते हैं —

  1. चित्र बहुत सुंदर थे — “अत्यंत सुंदर चित्र बने हैं।”
  2. चित्र सजीव थे — सजीव यानी जीते-जागते से। आगे लिखा है — “ऐसे सजीव चित्र थे कि लगता था अभी बोल पड़ेंगे।”
  3. चित्रों में इतनी बारीकी थी — हाथों की मुद्रा, आँखों के भाव, अंगों की लोच और मुख की झुर्रियाँ तक बनी थीं।
नमूना उत्तर (दूसरा भाग): मेरे मुँह से ‘वाह!’ तब निकलता है जब बरसात के बाद आकाश में इंद्रधनुष दिखता है। जब मेरी माँ मेरी पसंद का हलवा बनाती हैं, तब भी ‘वाह!’ निकल जाता है। दीपावली की रात पूरे मुहल्ले में जलते दीये देखकर और क्रिकेट में किसी का लंबा छक्का देखकर भी मैं ‘वाह!’ कह उठता हूँ।
‘वाह!’ कैसा शब्द है: यह एक विस्मयादिबोधक शब्द है — यानी अचानक मन में उठे भाव को बताने वाला शब्द। इसे बोलने के लिए सोचना नहीं पड़ता, यह अपने-आप निकल जाता है। इसीलिए इसके बाद विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगाया जाता है।
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