तब मेरे अभिभावक चुपचाप उठकर मुझे फिर से ओढ़ा देते हैं — और सुबह प्यार से डाँटते भी हैं।
| वे क्या कहते हैं | वे क्या करते हैं |
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| “बेटा, रजाई मत फेंको, सर्दी लग जाएगी।” | रात में दो-तीन बार उठकर रजाई फिर से ओढ़ा देते हैं। |
| “ठंड में पैर खुले रह गए तो सुबह गला ख़राब हो जाएगा।” | पैरों में ऊनी मोज़े पहना देते हैं। |
| “रजाई को अच्छी तरह दबा लो।” | रजाई के किनारे शरीर के नीचे दबा देते हैं, ताकि हवा भीतर न आए। |
| “सर्दी में खिड़की खुली मत छोड़ो।” | खिड़की और दरवाज़ा बंद कर देते हैं, कभी परदा भी डाल देते हैं। |
नमूना उत्तर: ठंडी रात में जब मैं सोते-सोते रजाई पैरों से हटा देता हूँ, तब मेरी माँ उठकर मुझे फिर से ओढ़ा देती हैं। वे कहती हैं — “बेटा, ठंड लग जाएगी, रजाई मत फेंको।” कभी-कभी वे मेरे पैरों में ऊनी मोज़े पहना देती हैं। सुबह वे हँसकर बताती हैं कि रात में उन्हें तीन बार उठना पड़ा। तब मुझे लगता है कि माँ मेरे सोने के बाद भी मेरा ध्यान रखती हैं।