ये रहीं वे पंक्तियाँ —
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।”
इनका सरल अर्थ: चाँद रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटता और बढ़ता रहता है। और किसी एक दिन तो वह ऐसा कर देता है कि किसी की भी आँखों को दिखाई ही नहीं देता — यानी आसमान से बिलकुल गायब हो जाता है।
| पंक्ति का हिस्सा | वह क्या बताता है |
|---|---|
| “घटता-बढ़ता रोज” | चाँद हर दिन बदलता है — कभी कम, कभी ज़्यादा। |
| “किसी दिन ऐसा भी करता है” | महीने में एक दिन कुछ खास होता है। |
| “नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है” | उस दिन वह किसी को भी नहीं दिखता। ‘किसी की भी’ कहकर कवि ने बात पक्की कर दी — किसी एक को नहीं, किसी को भी नहीं। |