‘दुखड़ा’ का अर्थ है — अपनी तकलीफ़ किसी को दुख भरे मन से सुनाना। इसलिए यहाँ आपको चाँद की तकलीफ़ अपनी माँ को इस तरह सुनानी है जैसे वह आपकी अपनी तकलीफ़ हो।
चरण 1 — पहले बताइए कि चाँद कौन है और उसके साथ हो क्या रहा है।
चरण 2 — फिर उसकी दोनों परेशानियाँ कहिए — ठंड लगना और नाप का रोज़ बदलना।
चरण 3 — अंत में माँ से पूछिए कि अब क्या किया जाए।
नमूना उत्तर (बातचीत के रूप में):
| कौन | क्या कहता है |
|---|---|
| मैं | माँ, आज मुझे बेचारे चाँद पर बहुत दया आ रही है। |
| माँ | क्यों बेटा, क्या हुआ चाँद को? |
| मैं | माँ, वह रोज़ रात भर आसमान में चलता रहता है। जाड़े में सन-सन ठंडी हवा चलती है और उसके पास एक भी गरम कपड़ा नहीं है। वह ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह अपनी यात्रा पूरी करता है। |
| माँ | तो उसकी माँ उसे कुरता क्यों नहीं सिलवा देतीं? |
| मैं | यही तो असली दुख है, माँ! उसका नाप ही रोज़ बदल जाता है। कभी वह उँगली जितना पतला होता है, कभी एक फुट मोटा। और एक दिन तो वह किसी को दिखाई ही नहीं देता। उसकी माँ नाप किस दिन का ले? |
| माँ | सच में, यह तो बड़ी मुश्किल है। |
| मैं | माँ, कोई ऐसा कपड़ा नहीं बन सकता जो अपने आप छोटा-बड़ा हो जाए? चाँद बेचारा कब तक ठिठुरता रहेगा? |
नमूना उत्तर (एक अनुच्छेद में): माँ, आज मैंने चाँद के बारे में एक कविता पढ़ी और मुझे उस पर बहुत दया आई। बेचारा चाँद रोज़ रात भर खुले आसमान में चलता रहता है। जाड़े में सन-सन ठंडी हवा चलती है और उसके पास ओढ़ने-पहनने को कुछ नहीं है। वह ठिठुरता हुआ किसी तरह अपनी यात्रा पूरी करता है। उसने अपनी माँ से ऊन का एक मोटा झिंगोला माँगा, पर उसकी माँ लाचार हैं — चाँद का नाप ही रोज़ बदल जाता है। कभी वह पतली रेखा जैसा होता है, कभी पूरा गोल, और अमावस्या को तो दिखता ही नहीं। माँ, आप ही बताइए, अब चाँद क्या करे?