कक्षा ५ हिंदी अध्याय 3 अनुमान और कल्पना के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
आप अपनी माँ से चाँद का दुखड़ा कैसे बताएँगे?
उत्तर

‘दुखड़ा’ का अर्थ है — अपनी तकलीफ़ किसी को दुख भरे मन से सुनाना। इसलिए यहाँ आपको चाँद की तकलीफ़ अपनी माँ को इस तरह सुनानी है जैसे वह आपकी अपनी तकलीफ़ हो।

कैसे लिखें — तीन चरण:
चरण 1 — पहले बताइए कि चाँद कौन है और उसके साथ हो क्या रहा है।
चरण 2 — फिर उसकी दोनों परेशानियाँ कहिए — ठंड लगना और नाप का रोज़ बदलना।
चरण 3 — अंत में माँ से पूछिए कि अब क्या किया जाए।

नमूना उत्तर (बातचीत के रूप में):

कौनक्या कहता है
मैंमाँ, आज मुझे बेचारे चाँद पर बहुत दया आ रही है।
माँक्यों बेटा, क्या हुआ चाँद को?
मैंमाँ, वह रोज़ रात भर आसमान में चलता रहता है। जाड़े में सन-सन ठंडी हवा चलती है और उसके पास एक भी गरम कपड़ा नहीं है। वह ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह अपनी यात्रा पूरी करता है।
माँतो उसकी माँ उसे कुरता क्यों नहीं सिलवा देतीं?
मैंयही तो असली दुख है, माँ! उसका नाप ही रोज़ बदल जाता है। कभी वह उँगली जितना पतला होता है, कभी एक फुट मोटा। और एक दिन तो वह किसी को दिखाई ही नहीं देता। उसकी माँ नाप किस दिन का ले?
माँसच में, यह तो बड़ी मुश्किल है।
मैंमाँ, कोई ऐसा कपड़ा नहीं बन सकता जो अपने आप छोटा-बड़ा हो जाए? चाँद बेचारा कब तक ठिठुरता रहेगा?

नमूना उत्तर (एक अनुच्छेद में): माँ, आज मैंने चाँद के बारे में एक कविता पढ़ी और मुझे उस पर बहुत दया आई। बेचारा चाँद रोज़ रात भर खुले आसमान में चलता रहता है। जाड़े में सन-सन ठंडी हवा चलती है और उसके पास ओढ़ने-पहनने को कुछ नहीं है। वह ठिठुरता हुआ किसी तरह अपनी यात्रा पूरी करता है। उसने अपनी माँ से ऊन का एक मोटा झिंगोला माँगा, पर उसकी माँ लाचार हैं — चाँद का नाप ही रोज़ बदल जाता है। कभी वह पतली रेखा जैसा होता है, कभी पूरा गोल, और अमावस्या को तो दिखता ही नहीं। माँ, आप ही बताइए, अब चाँद क्या करे?

प्र2.
गरमी और वर्षा से बचने के लिए चाँद अपनी माँ से क्या कहेगा? वह किस प्रकार के कपड़ों एवं वस्तुओं की माँग कर सकता है?
उत्तर

मौसम बदलेगा तो चाँद की माँग भी बदल जाएगी। गरमी में उसे ठंडक चाहिए और वर्षा में भीगने से बचाव।

मौसमकपड़ेअन्य वस्तुएँक्यों
गरमीपतला सूती कुरता, बनियान, हल्के रंग का कपड़ा, सिर पर गमछा या टोपीछाता, धूप का चश्मा, हाथ का पंखा, पानी की बोतल, मिट्टी की सुराहीसूती कपड़ा पसीना सोखता है और हवा आने देता है। हल्के रंग गरमी लौटा देते हैं। छाता और टोपी सिर को धूप से बचाते हैं।
वर्षाबरसाती (रेनकोट), प्लास्टिक की टोपी, जल्दी सूखने वाला कपड़ाछाता, गमबूट या रबड़ की चप्पल, बादलों से बचने की ओटबरसाती और छाता भीगने से बचाते हैं। गमबूट से पानी में चलना आसान होता है। भीगा कपड़ा देर तक पहनने से सर्दी लग जाती है।

नमूना उत्तर (गरमी के लिए — चाँद की अपनी आवाज़ में): “माँ, अब गरमी आ गई है। मेरा वह ऊन का मोटा झिंगोला अब रख दो। मुझे एक पतला सूती कुरता सिलवा दो, वह भी सफ़ेद या हल्के रंग का, ताकि गरमी न लगे। सिर के लिए एक टोपी और आँखों के लिए एक चश्मा भी दिलवा देना। और हाँ, रास्ते में प्यास लगे तो पीने के लिए पानी की एक बोतल भी साथ रख देना।”

नमूना उत्तर (वर्षा के लिए): “माँ, अब तो रोज़ बादल घिर आते हैं और मैं बीच रास्ते में भीग जाता हूँ। भीगे कपड़े में रात भर चलने से मुझे सर्दी लग जाती है। मेरे लिए एक बरसाती सिलवा दो और एक मज़बूत छाता दिला दो। पैरों के लिए गमबूट भी चाहिए। ऐसा कपड़ा लेना जो भीग जाए तो जल्दी सूख भी जाए।”

ध्यान दीजिए: कपड़ा हमेशा मौसम देखकर चुना जाता है। जाड़े में ऊनी और मोटा, गरमी में सूती और पतला, बरसात में जल्दी सूखने वाला। कविता में चाँद ने जाड़े के हिसाब से ऊन का झिंगोला माँगा था — यह प्रश्न वही समझ बाकी दो मौसमों पर लगाने को कह रहा है।
प्र3.
चाँद ने माँ से कुरता किराए पर लाने के लिए क्यों कहा होगा?
उत्तर

क्योंकि चाँद को ठंड इतनी सता रही थी कि उसे नए-पुराने से कोई मतलब ही नहीं रह गया था — उसे बस कोई गरम कपड़ा चाहिए था, चाहे वह किसी और का ही क्यों न हो।

“आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।

इस एक पंक्ति के पीछे चार कारण हो सकते हैं —

  1. ठंड की जल्दी थी। नया कुरता सिलने में समय लगता है — कपड़ा खरीदो, नाप दो, दर्ज़ी के पास दो, तैयार होने का इंतज़ार करो। किराए का कुरता उसी दिन मिल जाता है। चाँद को तो आज ही रात निकलना था।
  2. वह माँ पर बोझ नहीं डालना चाहता था। नया कुरता सिलवाने में पैसे लगते हैं। किराए का कपड़ा सस्ता पड़ता है। बच्चा जब कहता है “न हो अगर तो…”, तो वह माँ को छूट दे रहा होता है।
  3. उसे अपनी समस्या मालूम थी। चाँद जानता है कि उसका आकार रोज़ बदलता है। तो नया कुरता सिलवाकर भी क्या होगा — दो दिन बाद वह बेकार हो जाएगा। किराए की चीज़ काम निकलने पर लौटा दी जाती है।
  4. किराए पर चीज़ लेना हमारे यहाँ आम बात है। शादी-ब्याह में लोग कपड़े, बरतन, कुर्सियाँ और बैंड सब किराए पर लेते हैं — क्योंकि उनका काम थोड़े दिन का होता है।
सबसे सुंदर बात यही है: यह छोटी-सी पंक्ति हमें बताती है कि चाँद ज़िद्दी ज़रूर है, पर समझदार भी है। वह अपनी माँ की मजबूरी सोच रहा है। इसीलिए यह पंक्ति पढ़ते ही चाँद पर प्यार आ जाता है।
शब्द जानिए: ‘भाड़ा’ का अर्थ है किराया — यानी कोई चीज़ थोड़े समय के लिए इस्तेमाल करने के बदले दिया जाने वाला पैसा। ‘भाड़े का कुरता’ यानी किराए पर लिया हुआ कुरता, जिसे बाद में लौटाना होता है।
प्र4.
यदि माँ ने चाँद का कुरता सिलवा दिया होता तो क्या होता?
उत्तर

तो वह कुरता एक ही दिन काम आता। अगले ही दिन चाँद का नाप बदल जाता और कुरता या तो तंग हो जाता या ढीला होकर लटक जाता।

चाँद उस दिन कैसा होताकुरते का क्या होता
जिस दिन नाप लिया गयाकुरता बिलकुल ठीक बैठता। चाँद खुश हो जाता।
अगले दिन चाँद थोड़ा बड़ा हुआकुरता तंग हो जाता। बटन नहीं लगते, सिलाई उधड़ने लगती।
पूर्णिमा के दिन पूरा गोल हुआकुरता बिलकुल छोटा पड़ जाता। पहनना ही असंभव हो जाता।
घटते-घटते पतली रेखा जैसा हुआकुरता बहुत ढीला होकर लटक जाता, जैसे किसी और का पहन लिया हो।
अमावस्या को दिखाई ही नहीं दियाकुरता पहनाया किसे जाता? वह खाली आसमान में लटका रह जाता।

पूरा उत्तर इस तरह लिखिए: यदि माँ ने चाँद का कुरता सिलवा दिया होता तो वह केवल उसी दिन ठीक बैठता जिस दिन नाप लिया गया था। अगले ही दिन चाँद का आकार बदल जाता और कुरता बेकार हो जाता — कभी बहुत तंग, कभी बहुत ढीला। पूर्णिमा को वह छोटा पड़ जाता और अमावस्या को पहनने वाला ही नहीं मिलता। तब माँ को रोज़ नया कुरता सिलवाना पड़ता, जो न संभव है और न सही। इसीलिए माँ ने पहले ही पूछ लिया — “नाप तेरी किस रोज लिवाएँ?”

कविता की दृष्टि से: यदि कुरता सिल जाता तो कविता की सारी मिठास ही चली जाती। कविता का मज़ा इसी बात में है कि समस्या का कोई हल नहीं निकलता — और उसी में हमें चाँद के घटने-बढ़ने की सच्ची बात समझ आ जाती है।
सोचिए तो सही: क्या ऐसा कोई कपड़ा हो सकता है जो अपने आप छोटा-बड़ा हो जाए? हाँ! इलास्टिक यानी रबड़ वाला कपड़ा थोड़ा-बहुत फैलता और सिकुड़ता है। पर चाँद तो अंगुल-भर से एक फुट तक बदलता है — इतना खिंचाव किसी कपड़े में नहीं होता।
क्या यह उपयोगी रहा?