कक्षा ५ हिंदी अध्याय 3 चाँद का झिंगोला के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
मान लीजिए कि चाँद, झिंगोले के लिए माँ, कपड़े के दुकानदार और दर्ज़ी से संवाद करता है। बातचीत के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं। आप इन्हें आगे बढ़ाइए। आप संवाद अपनी मातृभाषा में भी लिख सकते हैं। — चाँद और माँ का संवाद (चाँद: माँ, मुझे बहुत ठंड लगती है। मेरे लिए एक मोटा झिंगोला सिलवा दो! / माँ: तुझे सच में ठंड सताती होगी लेकिन एक समस्या है। / चाँद: समस्या? कैसी समस्या, माँ? / माँ: तेरा आकार तो प्रतिदिन बदलता रहता है। कभी छोटा, कभी बड़ा, कभी एकदम गायब! मैं कैसे नाप लूँ? / चाँद: (सोचकर) अरे हाँ! लेकिन फिर भी कोई उपाय तो होगा?) — आगे के संवाद लिखिए।
उत्तर

यहाँ चार पंक्तियाँ खाली छोड़ी गई हैं — माँ, चाँद, माँ, चाँद। इन्हें इस तरह भरा जा सकता है कि बात आगे भी बढ़े और कोई हल भी निकल आए।

अच्छा संवाद कैसे लिखें — चार बातें:
1. जो बात पहले कही जा चुकी है, उसी से आगे बढ़ाइए।
2. हर पात्र अपने स्वभाव के हिसाब से बोले — चाँद बच्चों जैसा, माँ समझदार।
3. वाक्य छोटे रखिए, जैसे लोग सचमुच बोलते हैं।
4. अंत में या तो कोई हल निकले या बात हँसी में खत्म हो।

नमूना उत्तर — पूरा संवाद:

कौनक्या कहता है
चाँदमाँ, मुझे बहुत ठंड लगती है। मेरे लिए एक मोटा झिंगोला सिलवा दो! (पुस्तक में दिया हुआ)
माँतुझे सच में ठंड सताती होगी लेकिन एक समस्या है। (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँदसमस्या? कैसी समस्या, माँ? (पुस्तक में दिया हुआ)
माँतेरा आकार तो प्रतिदिन बदलता रहता है। कभी छोटा, कभी बड़ा, कभी एकदम गायब! मैं कैसे नाप लूँ? (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँद(सोचकर) अरे हाँ! लेकिन फिर भी कोई उपाय तो होगा? (पुस्तक में दिया हुआ)
माँएक उपाय तो है, बेटा। तेरे लिए ऐसा कपड़ा चुना जाए जो खिंच भी जाए और सिकुड़ भी जाए।
चाँदवाह माँ! फिर तो मैं छोटा होऊँ या बड़ा, झिंगोला मेरे बदन में आ ही जाएगा।
माँपर एक बात और है। अमावस्या को तो तू दिखता ही नहीं। उस दिन झिंगोला पहनाऊँगी किसे?
चाँद(हँसकर) उस दिन आप उसे तह करके रख देना, माँ। छुट्टी के दिन मुझे कपड़े की क्या ज़रूरत!
ध्यान दीजिए: इस नमूने में दोनों समस्याएँ उठाई गई हैं — नाप की और अमावस्या की। अच्छे संवाद में बात आगे बढ़ती है, वहीं की वहीं नहीं रहती। आप चाहें तो अपनी मातृभाषा (भोजपुरी, मालवी, अवधी, मराठी, बांग्ला — जो भी आपकी हो) में भी यही संवाद लिख सकते हैं।
प्र2.
चाँद और कपड़े का दुकानदार (चाँद: दुकानदार जी, मुझे एक गरम कपड़ा चाहिए जिससे मेरी सर्दी दूर हो जाए। / दुकानदार: अवश्य, कितने मीटर चाहिए? / चाँद: यही तो समस्या है! मैं कभी छोटा होता हूँ, कभी बड़ा। आप ही बताइए… कितने मीटर लूँ? / दुकानदार: (हँसकर) अरे छोटू चाँद! जब आपका नाप ही तय नहीं तो कपड़ा कैसे दूँ? पहले नाप तो तय करके आओ!) — आगे के संवाद लिखिए।
उत्तर

यहाँ पाँच पंक्तियाँ खाली हैं — चाँद, दुकानदार, चाँद, दुकानदार, चाँद

नमूना उत्तर — पूरा संवाद:

कौनक्या कहता है
चाँददुकानदार जी, मुझे एक गरम कपड़ा चाहिए जिससे मेरी सर्दी दूर हो जाए। (पुस्तक में दिया हुआ)
दुकानदारअवश्य, कितने मीटर चाहिए? (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँदयही तो समस्या है! मैं कभी छोटा होता हूँ, कभी बड़ा। आप ही बताइए… कितने मीटर लूँ? (पुस्तक में दिया हुआ)
दुकानदार(हँसकर) अरे छोटू चाँद! जब आपका नाप ही तय नहीं तो कपड़ा कैसे दूँ? पहले नाप तो तय करके आओ! (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँददुकानदार जी, नाप तो मैं कभी तय कर ही नहीं सकता। पर आप इतना बता दीजिए — मेरे सबसे बड़े दिन का नाप कितना होगा?
दुकानदारपूर्णिमा वाले दिन का? तब तो आप पूरे गोल हो जाते हैं। उतने के लिए तीन मीटर कपड़ा चाहिए।
चाँदतो तीन मीटर ही दे दीजिए। बड़े दिन का कपड़ा छोटे दिन भी काम आ जाएगा — बस थोड़ा ढीला रहेगा।
दुकानदारबात तो आपकी समझदारी की है! और यह लीजिए, ऊन का यह मोटा कपड़ा सबसे गरम है। इसमें थोड़ा खिंचाव भी है।
चाँदबहुत-बहुत धन्यवाद, दुकानदार जी! अब मैं इसे लेकर सीधे दर्ज़ी जी के पास जाता हूँ।
क्यों यह उत्तर अच्छा है: दुकानदार ने कहा था — “पहले नाप तो तय करके आओ।” अच्छे संवाद में इसी बात का उत्तर मिलना चाहिए। यहाँ चाँद ने एक व्यावहारिक हल निकाला — सबसे बड़े नाप का कपड़ा ले लो। यही असली ज़िंदगी में भी किया जाता है, इसीलिए माता-पिता बच्चों के कपड़े थोड़े बड़े नाप के लेते हैं।
प्र3.
चाँद और दर्ज़ी का संवाद (चाँद: दर्ज़ी जी, मेरे लिए एक कुरता सिल दीजिए। / दर्ज़ी: बिलकुल! लेकिन पहले नाप तो दो। / चाँद: यही तो समस्या है! कभी मैं छोटा, कभी बड़ा हो जाता हूँ। / दर्ज़ी: (हँसते हुए) तो फिर ऐसा करो, प्रतिदिन मेरे पास आओ और मैं प्रत्येक दिन तुम्हारे नाप का नया कुरता सिल दूँगा! / चाँद: (प्रसन्न होते हुए) फिर तो मुझे प्रतिदिन नए कपड़े मिलेंगे! लेकिन माँ मानेंगी नहीं!) — आगे के संवाद लिखिए।
उत्तर

यहाँ चार पंक्तियाँ खाली हैं — दर्ज़ी, चाँद, दर्ज़ी, चाँद। चाँद ने आखिर में एक नई बात कही है — “माँ मानेंगी नहीं!” अच्छे उत्तर में इसी बात को आगे बढ़ाना चाहिए।

नमूना उत्तर — पूरा संवाद:

कौनक्या कहता है
चाँददर्ज़ी जी, मेरे लिए एक कुरता सिल दीजिए। (पुस्तक में दिया हुआ)
दर्ज़ीबिलकुल! लेकिन पहले नाप तो दो। (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँदयही तो समस्या है! कभी मैं छोटा, कभी बड़ा हो जाता हूँ। (पुस्तक में दिया हुआ)
दर्ज़ी(हँसते हुए) तो फिर ऐसा करो, प्रतिदिन मेरे पास आओ और मैं प्रत्येक दिन तुम्हारे नाप का नया कुरता सिल दूँगा! (पुस्तक में दिया हुआ)
चाँद(प्रसन्न होते हुए) फिर तो मुझे प्रतिदिन नए कपड़े मिलेंगे! लेकिन माँ मानेंगी नहीं! (पुस्तक में दिया हुआ)
दर्ज़ीठीक कहते हो। रोज़ नया कुरता सिलवाना न माँ के बस की बात है, न मेरे। इतना कपड़ा और इतना समय कहाँ से आएगा?
चाँदतो फिर कोई और उपाय बताइए, दर्ज़ी जी। ठंड तो मुझे आज ही रात लगेगी।
दर्ज़ीएक उपाय है। मैं तुम्हारे सबसे बड़े नाप का कुरता सिल देता हूँ और उसमें कमर पर नाड़ा तथा किनारों पर इलास्टिक लगा देता हूँ। जिस दिन तुम छोटे हो, नाड़ा कस लेना; जिस दिन बड़े हो, ढीला कर देना।
चाँद(खुश होकर) वाह दर्ज़ी जी! यह तो कमाल का उपाय है। अब न माँ को चिंता होगी, न मुझे ठंड लगेगी। बहुत-बहुत धन्यवाद!
तीनों संवाद मिलाकर देखिए: माँ, दुकानदार और दर्ज़ी — तीनों एक ही बात कहते हैं कि नाप तय हुए बिना कपड़ा नहीं बनता। पर तीनों की बात का ढंग अलग है। माँ चिंता करती है, दुकानदार हँसता है, दर्ज़ी मज़ाक में हल सुझा देता है। संवाद लिखते समय हर पात्र का यही अपना ढंग बनाए रखिए।
प्र4.
अब आप इन संवादों पर कक्षा में शिक्षक की सहायता से अभिनय कीजिए।
उत्तर

यह करके सीखने वाला काम है। नीचे इसे करने का पूरा तरीका दिया गया है।

चरण-दर-चरण तैयारी:
चरण 1 — कक्षा को चार-चार बच्चों के समूहों में बाँटिए।
चरण 2 — हर समूह में भूमिकाएँ बाँट लीजिए — चाँद, माँ, दुकानदार, दर्ज़ी।
चरण 3 — अपने-अपने संवाद कागज़ पर लिखकर दो-तीन बार पढ़िए, फिर याद कीजिए।
चरण 4 — बिना कपड़े-लत्ते के एक बार पूरा अभ्यास (रिहर्सल) कीजिए।
चरण 5 — सामान तैयार कीजिए — गत्ते का गोल चाँद, फीता (नापने के लिए), कपड़े का एक टुकड़ा, कैंची।
चरण 6 — कक्षा के सामने तीनों दृश्य क्रम से कीजिए — पहले माँ का, फिर दुकान का, फिर दर्ज़ी का।
चरण 7 — अंत में दर्शक बच्चे बताएँ कि उन्हें क्या अच्छा लगा और क्या और अच्छा हो सकता था।
पात्रकैसे बोलिएक्या पहनिए या पकड़िए
चाँदबच्चों जैसी ज़िद भरी और थोड़ी काँपती हुई आवाज़ में। बीच-बीच में ठंड से सिकुड़िए।गत्ते का गोल सफ़ेद चाँद चेहरे के पास पकड़ें या सिर पर बाँध लें।
माँधीमी, प्यार भरी और समझाने वाली आवाज़ में।सिर पर चुनरी या दुपट्टा।
दुकानदारतेज़ और हँसमुख आवाज़ में, जैसे दुकान पर ग्राहक से बात होती है।कंधे पर गमछा और हाथ में कपड़े का थान (चादर का टुकड़ा)।
दर्ज़ीमज़ाक करते हुए, हँसते-हँसते।गले में नापने का फीता और हाथ में कैंची (कागज़ की बनी हुई)।
अभिनय में सबसे ज़रूरी बात: केवल शब्द बोल देना अभिनय नहीं है। आवाज़ का उतार-चढ़ाव, चेहरे के भाव और हाथों के इशारे मिलकर अभिनय बनाते हैं। जब चाँद कहे “ठिठुर-ठिठुरकर”, तो सचमुच काँपकर दिखाइए। जब दर्ज़ी हँसे, तो सचमुच हँसिए। और सबसे बड़ी बात — इतनी ऊँची आवाज़ में बोलिए कि पिछली पंक्ति तक सुनाई दे।
क्या यह उपयोगी रहा?