कक्षा ५ हिंदी अध्याय 3 कविता से आगे के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
क्या चाँद की तरह आप भी अपनी माँ से किसी वस्तु के लिए हठ करते हैं? आप अपनी माँ को इसके लिए कैसे मनाते हैं?
उत्तर

हाँ, हम सब कभी-न-कभी हठ करते हैं। पर हठ करने से बात कम बनती है, समझाने से ज़्यादा।

मनाने का तरीकावह कैसे काम करता है
कारण बतानाबता दीजिए कि वह चीज़ आपको क्यों चाहिए — जैसे “मेरी पुरानी कॉपी भर गई है।” कारण सुनते ही बड़े लोग आधे मान जाते हैं।
सही समय चुननाजब माँ काम में उलझी हों या थकी हों, तब मत कहिए। शाम को फुरसत में या खाना खाते समय कहिए।
अपना काम करके दिखानागृहकार्य पूरा करके, कमरा ठीक करके माँगिए। तब आपकी बात में वज़न आ जाता है।
इंतज़ार करने को तैयार रहनाकहिए — “अभी नहीं तो अगले महीने ले लेना।” इससे माँ को लगता है कि आप उनकी कठिनाई समझते हैं।
कम में काम चलानामहँगी चीज़ की जगह सस्ती चीज़ मान लेना। कविता में चाँद ने यही किया — “ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”
रोना-चिल्लाना नहींज़िद करके रोने से माँ को दुख होता है और बात बनने की जगह बिगड़ जाती है।

नमूना उत्तर: हाँ, कभी-कभी मैं भी चाँद की तरह अपनी माँ से किसी चीज़ के लिए हठ कर बैठता हूँ। पिछली बार मैंने रंगों का डिब्बा माँगा था। मैंने पहले उन्हें कारण बताया कि विद्यालय में चित्रकला की प्रतियोगिता है और मेरे पुराने रंग सूख चुके हैं। मैंने अपना सारा गृहकार्य पूरा करके शाम को फुरसत के समय बात की। जब माँ ने कहा कि इस महीने ख़र्च ज़्यादा है, तो मैंने कहा कि मैं अगले महीने तक इंतज़ार कर लूँगा। यह सुनकर माँ खुश हो गईं और उन्होंने उसी सप्ताह मुझे रंग दिला दिए। मैंने सीखा कि रोने-चिल्लाने से नहीं, प्यार से समझाने से बात बनती है।

कविता से जोड़िए: चाँद ने भी यही किया। उसने पहले कारण बताया — “सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ।” फिर उसने माँ को छूट भी दी — “न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।” यही मनाने का सबसे अच्छा तरीका है।
प्र2.
आपकी माँ आपको किसी काम के लिए कैसे मनाती हैं?
उत्तर

माँ प्रायः डाँटकर नहीं, समझाकर मनाती हैं। वे कारण बताती हैं, थोड़ा लालच देती हैं, कभी साथ बैठकर काम करती हैं और कभी काम को खेल बना देती हैं।

माँ का तरीकाउदाहरण
कारण बताना“दूध पिओगे तो हड्डियाँ मज़बूत होंगी और लंबाई बढ़ेगी।”
प्यार से पुकारना“चलो मेरे राजा बेटा, बस दो मिनट का काम है।”
काम को खेल बना देना“देखें, तुम पहले खिलौने समेटते हो या मैं बरतन?”
थोड़ा-सा इनाम“गृहकार्य पूरा कर लो, फिर एक घंटा खेलने जाना।”
साथ बैठ जानापढ़ाई के समय पास बैठ जाती हैं, जिससे मन लगा रहता है।
उदाहरण देना“देखो, दीदी ने भी अपना काम खुद किया था।”
कहानी सुनानाखाना खिलाते समय कहानी सुनाकर पूरी थाली खत्म करवा देती हैं।
भरोसा जताना“मुझे पता है तुम यह कर लोगे।” यह सुनकर हिम्मत आ जाती है।

नमूना उत्तर: मेरी माँ मुझे किसी काम के लिए कभी ज़बरदस्ती नहीं करतीं। वे पहले कारण बताती हैं कि वह काम क्यों ज़रूरी है। जब मुझे पढ़ने का मन नहीं होता तो वे मेरे पास आकर बैठ जाती हैं और कहती हैं — “बस आधा घंटा पढ़ लो, फिर खेलने चले जाना।” कभी-कभी वे काम को खेल बना देती हैं और कहती हैं कि देखते हैं कौन पहले अपना काम पूरा करता है। जब मैं काम कर लेता हूँ तो वे शाबाशी देती हैं। इसी तरीके से मैं आसानी से मान जाता हूँ।

ध्यान दीजिए: प्रश्न 1 में आप माँ को मनाते हैं और प्रश्न 2 में माँ आपको मनाती हैं। दोनों में एक बात एक जैसी है — जो प्यार से और कारण बताकर कहता है, उसकी बात मान ली जाती है
प्र3.
गरमी, सर्दी या वर्षा से बचने के लिए आपकी माँ आपको क्या कहती अथवा क्या-क्या करती हैं?
उत्तर

माँ हर मौसम के हिसाब से हमारे खाने, कपड़ों और आदतों को बदल देती हैं। नीचे तीनों मौसमों की बात अलग-अलग दी गई है।

मौसममाँ क्या कहती हैंमाँ क्या करती हैं
गरमी“धूप में टोपी लगाकर जाना।” “पानी खूब पीना।” “बाहर का कटा फल मत खाना।”पतले सूती कपड़े निकालती हैं, बस्ते में पानी की बोतल रखती हैं, नींबू-पानी, छाछ, आम का पना और सत्तू पिलाती हैं, दोपहर में बाहर नहीं जाने देतीं और खिड़कियों पर परदा डाल देती हैं।
सर्दी“स्वेटर पहने बिना बाहर मत निकलना।” “कान ढककर रखो।” “ठंडा पानी मत पीना।”ऊनी कपड़े, मोज़े, टोपी और दस्ताने पहनाती हैं, रात में रजाई ओढ़ा देती हैं, गरम दूध, हलवा, गजक और मूँगफली देती हैं, सुबह की धूप में बैठाती हैं और सरसों के तेल की मालिश करती हैं।
वर्षा“छाता लेकर जाओ।” “पानी में भीगकर मत आना।” “गंदे पानी में पैर मत डालना।”बस्ते में छाता या बरसाती रखती हैं, भीगकर आने पर तुरंत सिर पोंछकर कपड़े बदलवाती हैं, उबला पानी पिलाती हैं, गरम चाय या अदरक वाला काढ़ा देती हैं और घर के आस-पास पानी जमा नहीं होने देतीं।

नमूना उत्तर: मेरी माँ हर मौसम में मेरा बहुत ध्यान रखती हैं। गरमी में वे मुझे पतले सूती कपड़े पहनाती हैं, बस्ते में पानी की बोतल रख देती हैं और कहती हैं कि धूप में टोपी लगाकर ही निकलना। वे मुझे नींबू-पानी और छाछ पिलाती हैं। सर्दी में वे स्वेटर, मोज़े और टोपी पहनाकर भेजती हैं और रात में रजाई ओढ़ा देती हैं। वे गरम दूध और गजक देती हैं और सुबह की धूप में बैठने को कहती हैं। बरसात में वे मेरे बस्ते में छाता रख देती हैं और भीगकर आने पर तुरंत कपड़े बदलवाती हैं। मुझे लगता है कि माँ को हमारी चिंता ठीक वैसे ही रहती है जैसे कविता में चाँद की माँ को थी।

कविता से जोड़िए: कविता में चाँद ठंड की शिकायत करता है और माँ तुरंत उपाय सोचने लगती है। आपके घर में भी यही होता है। मौसम बदलते ही सबसे पहले माँ के काम बदल जाते हैं — कपड़े, खाना और नियम, सब बदल जाते हैं।
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