कक्षा ५ हिंदी अध्याय 3 कविता का सरल अर्थ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
“हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, / ‘सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला। / सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ, / ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ। / आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का, / न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।’” — इन पंक्तियों का सरल अर्थ और भाव लिखिए।
उत्तर

इन छह पंक्तियों में चाँद अपनी माँ से ज़िद कर रहा है। वह ठंड से परेशान है और गरम कपड़ा माँग रहा है।

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,
“सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”

पहले कठिन शब्द समझ लीजिए —

शब्दअर्थ
हठ करनाज़िद करना, अपनी बात पर अड़ जाना
झिंगोलाढीला-ढाला लंबा कुरता या चोगा
सन-सनतेज़ हवा चलने की आवाज़
जाड़ासर्दी, ठंड का मौसम
ठिठुरनाठंड से काँपना
सफरयात्रा
भाड़े काकिराए का, कुछ दिन के लिए लिया हुआ

अब पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ देखिए —

पंक्तिसरल अर्थ
“हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,”एक दिन चाँद ज़िद पकड़कर बैठ गया और अपनी माँ से यह बात कही।
“सिलवा दो माँ, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।”माँ, मेरे लिए ऊन का एक मोटा और ढीला कुरता सिलवा दो।
“सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,”रात भर सन-सन करती ठंडी हवा चलती रहती है। मैं ठंड से मरा जा रहा हूँ।
“ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।”ठंड से काँपते-काँपते मैं जैसे-तैसे अपनी रात भर की यात्रा पूरी करता हूँ।
“आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,”ऊपर से मेरा सफर खुले आसमान का है, और वह भी जाड़े के मौसम में।
“न हो अगर तो ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।”अगर नया न सिलवा सको तो किराए का ही कोई कुरता ला दो।
भाव: यहाँ चाँद बिलकुल एक छोटे बच्चे जैसा लगता है। उसे ठंड लग रही है, इसलिए वह माँ के पास जाकर ज़िद कर बैठता है। सबसे मन को छू लेने वाली पंक्ति आखिरी है — “ला दो कुरता ही कोई भाड़े का।” बच्चा जानता है कि नया कपड़ा सिलवाने में ख़र्च होता है, इसलिए वह किराए के कपड़े पर भी राज़ी हो जाता है। इससे पता चलता है कि उसे ठंड कितनी सता रही है और वह अपनी माँ को कितना समझता भी है।
ध्यान दीजिए: “सन-सन” और “ठिठुर-ठिठुरकर” — ये दो शब्द ठंड को सुनाई और दिखाई दे जाने वाला बना देते हैं। ‘सन-सन’ से हवा की आवाज़ कानों में आ जाती है और ‘ठिठुर-ठिठुरकर’ से काँपता हुआ चाँद आँखों के सामने आ जाता है।
प्र2.
“बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘अरे सलोने! / कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने। / जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ, / एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।’” — इन पंक्तियों का सरल अर्थ और भाव लिखिए।
उत्तर

इन चार पंक्तियों में माँ अपना उत्तर देना शुरू करती है। वह पहले प्यार जताती है, फिर असली समस्या बताती है।

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, “अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।
शब्दअर्थ
सलोनेसुंदर, प्यारे (प्यार से पुकारने का शब्द)
कुशलभला, ख़ैरियत, अच्छा हाल
जादू-टोनेटोना-टोटका; किसी की बुरी नज़र
नापमाप, किसी चीज़ का आकार जो नापकर लिया जाए
पंक्तिसरल अर्थ
“बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘अरे सलोने!’”अपने बच्चे की बात सुनकर माँ ने कहा — अरे मेरे प्यारे, सुंदर बेटे!
“कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।”भगवान तुझे सदा भला रखें। तुझे किसी की बुरी नज़र न लगे।
“जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,”ठंड लगने वाली तेरी बात तो बिलकुल सही है, पर मुझे एक डर है।
“एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।”मैंने तुझे कभी एक ही नाप का नहीं देखा। तेरा आकार तो बदलता ही रहता है।
भाव: यह पूरी कविता का मोड़ है। माँ बेटे की माँग को मना नहीं करती — वह तो कहती है “जाड़े की तो बात ठीक है”, यानी तेरी बात जायज़ है। समस्या माँ की मरज़ी की नहीं, नाप की है। कोई भी दर्ज़ी कपड़ा तभी सी सकता है जब नाप एक ही रहे। और चाँद का नाप तो रोज़ बदलता है।
माँ का प्यार देखिए: बात चाहे कैसी भी हो, माँ पहले “अरे सलोने!” कहती है और भगवान से बेटे की कुशल माँगती है। कोई भी माँ बच्चे की तकलीफ़ सुनकर पहले यही करती है — पहले प्यार, फिर समझाना
प्र3.
“कभी एक अंगुल-भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा, / बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा। / घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है, / नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है। / अब तू ही तो बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ, / सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?” — इन पंक्तियों का सरल अर्थ और भाव लिखिए।
उत्तर

इन आखिरी छह पंक्तियों में माँ बताती है कि चाँद का नाप रोज़ क्यों बदलता है — और इसीलिए कुरता सिलवाना क्यों मुश्किल है।

कभी एक अंगुल-भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।
घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही तो बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?”
पंक्तिसरल अर्थ
“कभी एक अंगुल-भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,”तू कभी एक उँगली जितना पतला दिखता है, तो कभी एक फुट जितना मोटा।
“बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।”किसी दिन तू बड़ा हो जाता है और किसी दिन छोटा रह जाता है।
“घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,”तू रोज़ थोड़ा-थोड़ा घटता और बढ़ता रहता है। किसी दिन तो तू ऐसा भी कर देता है —
“नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।”— कि किसी को भी दिखाई ही नहीं देता। यानी उस दिन तू आसमान से गायब ही हो जाता है।
“अब तू ही तो बता, नाप तेरी किस रोज लिवाएँ,”अब तू ही बता, तेरा नाप किस दिन का लिया जाए?
“सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?”और ऐसा कौन-सा झिंगोला सिलवाएँ जो तेरे बदन पर हर रोज़ ठीक बैठ जाए?

यह बात आप आसमान में देख सकते हैं। किसी एक शाम चाँद को देखिए, फिर रोज़ उसी समय देखिए। आप पाएँगे कि उसका आकार रोज़ थोड़ा-थोड़ा बदल रहा है —

बढ़ता चाँद — दूज से पूर्णिमा तक (लगभग 15 दिन) अमावस्या दूज आधा चाँद पूर्णिमा घटता चाँद — पूर्णिमा से अमावस्या तक (लगभग 15 दिन) घटता हुआ आधा चाँद पतली रेखा फिर अमावस्या
चाँद के बदलते रूप। पीला भाग वही है जो हमें रात में चमकता दिखाई देता है।
भाव: कवि ने विज्ञान की एक बड़ी बात को कुरता सिलवाने की छोटी-सी कहानी में कह दिया है। चाँद रोज़ घटता-बढ़ता है — इसे चाँद की कलाएँ कहते हैं। इसीलिए उसके लिए एक ही नाप का कुरता बनाना असंभव है। कविता हमें हँसाते-हँसाते आसमान की एक सच्ची बात सिखा जाती है।
ऐसा होता क्यों है? चाँद के पास अपनी रोशनी नहीं है। उस पर सूरज की रोशनी पड़ती है और वही चमक हमें दिखती है। चाँद धरती के चारों ओर घूमता रहता है, इसलिए हर रात हमें उसका चमकता हुआ हिस्सा अलग-अलग मात्रा में दिखाई देता है। जिस रात चमकता हिस्सा हमारी ओर होता ही नहीं, उस रात चाँद दिखाई नहीं देता — उसे अमावस्या कहते हैं।
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