कक्षा ५ हिंदी अध्याय 4 होली आई, होली आई के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
‘होली आई, होली आई’ कविता का सरल अर्थ लिखिए। इसमें कठिन शब्दों के अर्थ भी बताइए।
उत्तर

यह कविता भवानी प्रसाद मिश्र की लिखी हुई है। इसमें कवि बताते हैं कि होली आने पर चारों ओर क्या-क्या बदल जाता है — खेत, पेड़, हवा, पक्षी, गलियाँ और लोग, सब।

होली आई, होली आई
देखो तो यह क्या-क्या लाई?

खेतों में लाई है सोना,
चमक उठा उनका हर कोना।
सरसों फूली, गेहूँ लहका,
अमराई का आँगन महका॥

हवा नई होकर लहराई,
होली आई, होली आई,

कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे,
पत्ते झूमे चिकने कौरे।
फूल गया टेसू जंगल में,
डूब गई दुनिया मंगल में॥

सूरज चंदा सब सुखदाई,
होली आई, होली आई,

इस आँगन में मंजीरे खनके,
उस आँगन में नूपुर रनके।
ढोलक ठनकी राह-राह में,
बालक, बूढ़े सब उछाह में॥

गली-गली में ‘फागें’ गाईं,
होली आई, होली आई,

जली ‘होलिका’ चौराहों पर
लोग मिल रहे हैं राहों पर।
जहाँ देखिए वहीं प्यार है,
रंग और रस की बहार है॥

नाचो, गाओ, झूमो भाई,
होली आई, होली आई।

— भवानी प्रसाद मिश्र

पहले कठिन शब्द समझ लीजिए —

शब्दअर्थ
सोनायहाँ सोना असली सोना नहीं है — पकी हुई पीली फ़सल को सोना कहा गया है।
लहकालहलहाया, हवा में लहराया
अमराईआमों का बगीचा
महकासुगंध से भर गया
कुहकीकोयल का मीठी आवाज़ में बोलना
भौंरेभ्रमर — फूलों पर मँडराने वाले काले कीट
कौरेकोरे, नए-नए निकले हुए (यहाँ — नए, चिकने पत्ते)
टेसूपलाश का चटक लाल-नारंगी फूल, जिससे पहले होली का रंग बनाया जाता था
मंगलखुशी, शुभ और भला समय
सुखदाईसुख देने वाले
मंजीरेहाथ में बजाया जाने वाला छोटा ताल-वाद्य
नूपुरपायल, घुँघरू
रनके / खनके / ठनकीबजने की आवाज़ें — पायल रुनझुन, मंजीरे खनखन, ढोलक ठन-ठन
उछाहउत्साह, उमंग
फागहोली के दिनों में गाया जाने वाला लोकगीत
होलिकाहोली से एक दिन पहले जलाई जाने वाली लकड़ियों की ढेरी (होलिका दहन)
बहाररौनक, छटा, खिली हुई शोभा

अब भाग-दर-भाग अर्थ देखिए —

पंक्तियाँसरल अर्थ
“होली आई, होली आई / देखो तो यह क्या-क्या लाई?”होली आ गई है। ज़रा देखो तो, वह अपने साथ क्या-क्या लेकर आई है!
“खेतों में लाई है सोना, / चमक उठा उनका हर कोना।”खेतों में फ़सल पक गई है। पीली फ़सल सोने जैसी चमक रही है, इसलिए खेत का कोना-कोना चमक उठा है।
“सरसों फूली, गेहूँ लहका, / अमराई का आँगन महका॥”सरसों में पीले फूल आ गए हैं, गेहूँ की बालियाँ हवा में लहरा रही हैं और आम के बगीचे में बौर की सुगंध फैल गई है।
“हवा नई होकर लहराई,”सर्दी बीत गई और हवा बदल गई है। अब वह ठंडी नहीं, हलकी और सुहानी है।
“कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे, / पत्ते झूमे चिकने कौरे।”कोयल मीठी आवाज़ में बोल रही है, भौंरे गुनगुना रहे हैं और पेड़ों पर नए-नए चिकने पत्ते झूम रहे हैं।
“फूल गया टेसू जंगल में, / डूब गई दुनिया मंगल में॥”जंगल में पलाश (टेसू) के लाल फूल खिल गए हैं। सारी दुनिया मानो खुशी में डूब गई है।
“सूरज चंदा सब सुखदाई,”अब न धूप चुभती है, न रात ठंडी लगती है। सूरज और चाँद — दोनों सुख देने वाले लगते हैं।
“इस आँगन में मंजीरे खनके, / उस आँगन में नूपुर रनके।”एक घर के आँगन में मंजीरे बज रहे हैं तो दूसरे घर के आँगन में पायल छनक रही है।
“ढोलक ठनकी राह-राह में, / बालक, बूढ़े सब उछाह में॥”हर रास्ते पर ढोलक बज रही है। बच्चे हों या बूढ़े — सब उमंग से भरे हैं।
“गली-गली में ‘फागें’ गाईं,”हर गली में होली के लोकगीत ‘फाग’ गाए जा रहे हैं।
“जली ‘होलिका’ चौराहों पर / लोग मिल रहे हैं राहों पर।”चौराहों पर होलिका जलाई गई है और रास्तों पर लोग एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं।
“जहाँ देखिए वहीं प्यार है, / रंग और रस की बहार है॥”जिधर देखो उधर प्रेम ही प्रेम है। चारों ओर रंगों की और आनंद की छटा छाई है।
“नाचो, गाओ, झूमो भाई, / होली आई, होली आई।”कवि सबको बुला रहे हैं — आओ, नाचो, गाओ, झूमो; क्योंकि होली आ गई है।
कविता का भाव: होली केवल रंग खेलने का दिन नहीं है। यह उस समय आती है जब सर्दी जाती है, फ़सल पकती है और प्रकृति नए सिरे से खिल उठती है। इसीलिए कवि पहले खेत, हवा, कोयल और टेसू की बात करते हैं और उसके बाद ढोलक, फाग और गले मिलने की। प्रकृति की खुशी और मनुष्य की खुशी — दोनों एक ही हैं।
प्र2.
कवि कहता है — “देखो तो यह क्या-क्या लाई?” कविता के अनुसार होली अपने साथ क्या-क्या लेकर आई है?
उत्तर

कविता के अनुसार होली अपने साथ प्रकृति की सुंदरता, आवाज़ों की खनक और लोगों का प्रेम — तीनों लेकर आई है। पूरी सूची यह रही —

क्या लाईकविता की पंक्ति
खेतों में पकी सुनहरी फ़सल“खेतों में लाई है सोना, चमक उठा उनका हर कोना।”
फूली हुई सरसों और लहराता गेहूँ“सरसों फूली, गेहूँ लहका,”
आम के बगीचे की सुगंध“अमराई का आँगन महका॥”
बदली हुई नई हवा“हवा नई होकर लहराई,”
कोयल की कूक और भौंरों की गूँज“कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे,”
पेड़ों पर नए चिकने पत्ते“पत्ते झूमे चिकने कौरे।”
जंगल में खिले टेसू के फूल“फूल गया टेसू जंगल में,”
मंजीरे, पायल और ढोलक की आवाज़ें“इस आँगन में मंजीरे खनके, उस आँगन में नूपुर रनके। ढोलक ठनकी राह-राह में,”
बच्चों और बूढ़ों की उमंग“बालक, बूढ़े सब उछाह में॥”
गली-गली में गाए जाते फाग“गली-गली में ‘फागें’ गाईं,”
होलिका दहन और लोगों का मिलना“जली ‘होलिका’ चौराहों पर, लोग मिल रहे हैं राहों पर।”
चारों ओर प्रेम और रंगों की बहार“जहाँ देखिए वहीं प्यार है, रंग और रस की बहार है॥”
ध्यान दीजिए: कवि ने रंग और गुलाल की बात सबसे बाद में की है। सबसे पहले उन्होंने खेत और पेड़ की बात कही। इससे पता चलता है कि उनके लिए होली का असली रंग प्रकृति का रंग है।
प्र3.
इस कविता में कौन-कौन सी आवाज़ें सुनाई देती हैं? इन शब्दों से कविता में क्या असर पैदा होता है?
उत्तर

कविता आँखों से पढ़ी जाती है, पर इसमें कान से सुनाई देने वाले इतने शब्द हैं कि पूरा गाँव कानों में बजने लगता है।

शब्दकिसकी आवाज़कैसी आवाज़
कुहकीकोयलमीठी, लंबी कूक
गूँजेभौंरेधीमी गुनगुनाहट
खनकेमंजीरेधातु की खनखन
रनकेनूपुर (पायल)छन-छन, रुनझुन
ठनकीढोलकठन-ठन, ताल की चोट
गाईंगलियों में लोगफाग गीतों की सामूहिक आवाज़

इनसे क्या असर होता है?

  1. कविता सुनाई देने लगती है। पढ़ते समय लगता है कि सचमुच कहीं ढोलक बज रही है।
  2. त्योहार का उत्साह बढ़ जाता है — जहाँ इतनी आवाज़ें हों, वहाँ सन्नाटा हो ही नहीं सकता।
  3. ‘खनके–रनके’ और ‘लहराई–आई–गाईं’ जैसे शब्दों की तुक मिलती है, इसलिए कविता गाने जैसी लगती है और जल्दी याद हो जाती है।
  4. पूरा गाँव एक साथ दिखाई देता है — एक आँगन, दूसरा आँगन, हर राह, हर गली।
एक सुंदर बात देखिए: कवि ने कहा — “इस आँगन में मंजीरे खनके, उस आँगन में नूपुर रनके।” ‘इस’ और ‘उस’ लगाकर उन्होंने बता दिया कि खुशी किसी एक घर की नहीं है, वह घर-घर पहुँची है।
प्र4.
‘साङ्केन’ पाठ और ‘होली आई, होली आई’ कविता — दोनों में क्या-क्या समानता है? इन दोनों को एक ही पाठ में क्यों रखा गया होगा?
उत्तर

दोनों रचनाएँ नए वर्ष और नए मौसम की खुशी की बात करती हैं। एक कहानी अरुणाचल प्रदेश की है और एक कविता उत्तर भारत की होली की — पर भाव दोनों का एक ही है।

बातसाङ्केन (कहानी)होली आई, होली आई (कविता)
विधाकहानी (गद्य)कविता (पद्य)
रचनाकारपुस्तक में नाम नहीं दिया गयाभवानी प्रसाद मिश्र
कहाँ का त्योहारअरुणाचल प्रदेश का चौखामपूरे उत्तर भारत की होली
नया वर्ष“आज से हमारा नया वर्ष आरंभ होता है।”होली भी नए वर्ष और नई फ़सल के समय आती है।
पानी और रंगलोग बालटियों से पानी डालते हैं और चावल का आटा लगाते हैं।“रंग और रस की बहार है॥”
आवाज़ और नाच-गानाशोभायात्रा में लोग नाचते-गाते चलते हैं।मंजीरे, नूपुर, ढोलक और फाग।
मेल-मिलापताऊजी के घर जाना, प्रणाम करना, आशीर्वाद लेना।“लोग मिल रहे हैं राहों पर। जहाँ देखिए वहीं प्यार है,”
प्रकृति“जिधर देखो, हरियाली ही हरियाली और फूल ही फूल।”सरसों, गेहूँ, अमराई, कोयल, भौंरे, टेसू।

दोनों को एक साथ क्यों रखा गया होगा?

  1. ताकि आप देख सकें कि भारत के दो कोनों के त्योहार अलग-अलग नामों से मनाए जाते हैं, पर उनका मन एक ही है — पानी, रंग, मीठा, गीत और मिलना-जुलना।
  2. कहानी में वल्लरी को स्वयं होली की याद आती है। कविता उसी याद को आगे बढ़ा देती है।
  3. एक ही बात को गद्य और पद्य — दोनों रूपों में पढ़कर आप दोनों का अंतर भी समझ जाते हैं। कहानी घटना बताती है, कविता भाव जगाती है।
करने का काम: अपनी लेखन-पुस्तिका में दो कॉलम बनाइए — एक में साङ्केन, दूसरे में अपने प्रदेश का कोई त्योहार। दोनों में पाँच समानताएँ और दो अंतर लिखिए।
क्या यह उपयोगी रहा?