प्र1.
‘होली आई, होली आई’ कविता का सरल अर्थ लिखिए। इसमें कठिन शब्दों के अर्थ भी बताइए।
उत्तर
यह कविता भवानी प्रसाद मिश्र की लिखी हुई है। इसमें कवि बताते हैं कि होली आने पर चारों ओर क्या-क्या बदल जाता है — खेत, पेड़, हवा, पक्षी, गलियाँ और लोग, सब।
होली आई, होली आई
देखो तो यह क्या-क्या लाई?
खेतों में लाई है सोना,
चमक उठा उनका हर कोना।
सरसों फूली, गेहूँ लहका,
अमराई का आँगन महका॥
हवा नई होकर लहराई,
होली आई, होली आई,
कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे,
पत्ते झूमे चिकने कौरे।
फूल गया टेसू जंगल में,
डूब गई दुनिया मंगल में॥
सूरज चंदा सब सुखदाई,
होली आई, होली आई,
इस आँगन में मंजीरे खनके,
उस आँगन में नूपुर रनके।
ढोलक ठनकी राह-राह में,
बालक, बूढ़े सब उछाह में॥
गली-गली में ‘फागें’ गाईं,
होली आई, होली आई,
जली ‘होलिका’ चौराहों पर
लोग मिल रहे हैं राहों पर।
जहाँ देखिए वहीं प्यार है,
रंग और रस की बहार है॥
नाचो, गाओ, झूमो भाई,
होली आई, होली आई।
— भवानी प्रसाद मिश्र
देखो तो यह क्या-क्या लाई?
खेतों में लाई है सोना,
चमक उठा उनका हर कोना।
सरसों फूली, गेहूँ लहका,
अमराई का आँगन महका॥
हवा नई होकर लहराई,
होली आई, होली आई,
कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे,
पत्ते झूमे चिकने कौरे।
फूल गया टेसू जंगल में,
डूब गई दुनिया मंगल में॥
सूरज चंदा सब सुखदाई,
होली आई, होली आई,
इस आँगन में मंजीरे खनके,
उस आँगन में नूपुर रनके।
ढोलक ठनकी राह-राह में,
बालक, बूढ़े सब उछाह में॥
गली-गली में ‘फागें’ गाईं,
होली आई, होली आई,
जली ‘होलिका’ चौराहों पर
लोग मिल रहे हैं राहों पर।
जहाँ देखिए वहीं प्यार है,
रंग और रस की बहार है॥
नाचो, गाओ, झूमो भाई,
होली आई, होली आई।
— भवानी प्रसाद मिश्र
पहले कठिन शब्द समझ लीजिए —
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सोना | यहाँ सोना असली सोना नहीं है — पकी हुई पीली फ़सल को सोना कहा गया है। |
| लहका | लहलहाया, हवा में लहराया |
| अमराई | आमों का बगीचा |
| महका | सुगंध से भर गया |
| कुहकी | कोयल का मीठी आवाज़ में बोलना |
| भौंरे | भ्रमर — फूलों पर मँडराने वाले काले कीट |
| कौरे | कोरे, नए-नए निकले हुए (यहाँ — नए, चिकने पत्ते) |
| टेसू | पलाश का चटक लाल-नारंगी फूल, जिससे पहले होली का रंग बनाया जाता था |
| मंगल | खुशी, शुभ और भला समय |
| सुखदाई | सुख देने वाले |
| मंजीरे | हाथ में बजाया जाने वाला छोटा ताल-वाद्य |
| नूपुर | पायल, घुँघरू |
| रनके / खनके / ठनकी | बजने की आवाज़ें — पायल रुनझुन, मंजीरे खनखन, ढोलक ठन-ठन |
| उछाह | उत्साह, उमंग |
| फाग | होली के दिनों में गाया जाने वाला लोकगीत |
| होलिका | होली से एक दिन पहले जलाई जाने वाली लकड़ियों की ढेरी (होलिका दहन) |
| बहार | रौनक, छटा, खिली हुई शोभा |
अब भाग-दर-भाग अर्थ देखिए —
| पंक्तियाँ | सरल अर्थ |
|---|---|
| “होली आई, होली आई / देखो तो यह क्या-क्या लाई?” | होली आ गई है। ज़रा देखो तो, वह अपने साथ क्या-क्या लेकर आई है! |
| “खेतों में लाई है सोना, / चमक उठा उनका हर कोना।” | खेतों में फ़सल पक गई है। पीली फ़सल सोने जैसी चमक रही है, इसलिए खेत का कोना-कोना चमक उठा है। |
| “सरसों फूली, गेहूँ लहका, / अमराई का आँगन महका॥” | सरसों में पीले फूल आ गए हैं, गेहूँ की बालियाँ हवा में लहरा रही हैं और आम के बगीचे में बौर की सुगंध फैल गई है। |
| “हवा नई होकर लहराई,” | सर्दी बीत गई और हवा बदल गई है। अब वह ठंडी नहीं, हलकी और सुहानी है। |
| “कोयल कुहकी, गूँजे भौंरे, / पत्ते झूमे चिकने कौरे।” | कोयल मीठी आवाज़ में बोल रही है, भौंरे गुनगुना रहे हैं और पेड़ों पर नए-नए चिकने पत्ते झूम रहे हैं। |
| “फूल गया टेसू जंगल में, / डूब गई दुनिया मंगल में॥” | जंगल में पलाश (टेसू) के लाल फूल खिल गए हैं। सारी दुनिया मानो खुशी में डूब गई है। |
| “सूरज चंदा सब सुखदाई,” | अब न धूप चुभती है, न रात ठंडी लगती है। सूरज और चाँद — दोनों सुख देने वाले लगते हैं। |
| “इस आँगन में मंजीरे खनके, / उस आँगन में नूपुर रनके।” | एक घर के आँगन में मंजीरे बज रहे हैं तो दूसरे घर के आँगन में पायल छनक रही है। |
| “ढोलक ठनकी राह-राह में, / बालक, बूढ़े सब उछाह में॥” | हर रास्ते पर ढोलक बज रही है। बच्चे हों या बूढ़े — सब उमंग से भरे हैं। |
| “गली-गली में ‘फागें’ गाईं,” | हर गली में होली के लोकगीत ‘फाग’ गाए जा रहे हैं। |
| “जली ‘होलिका’ चौराहों पर / लोग मिल रहे हैं राहों पर।” | चौराहों पर होलिका जलाई गई है और रास्तों पर लोग एक-दूसरे से गले मिल रहे हैं। |
| “जहाँ देखिए वहीं प्यार है, / रंग और रस की बहार है॥” | जिधर देखो उधर प्रेम ही प्रेम है। चारों ओर रंगों की और आनंद की छटा छाई है। |
| “नाचो, गाओ, झूमो भाई, / होली आई, होली आई।” | कवि सबको बुला रहे हैं — आओ, नाचो, गाओ, झूमो; क्योंकि होली आ गई है। |
कविता का भाव: होली केवल रंग खेलने का दिन नहीं है। यह उस समय आती है जब सर्दी जाती है, फ़सल पकती है और प्रकृति नए सिरे से खिल उठती है। इसीलिए कवि पहले खेत, हवा, कोयल और टेसू की बात करते हैं और उसके बाद ढोलक, फाग और गले मिलने की। प्रकृति की खुशी और मनुष्य की खुशी — दोनों एक ही हैं।