प्र1.
आपने ‘सुंदरिया’ कहानी पढ़ी। इस कहानी को नाटक के रूप में बदलकर कक्षा में अपने समूह के साथ नाटक-मंचन कीजिए।
उत्तर
यह करने वाला काम है। नीचे पूरा तरीका और एक छोटा नमूना नाटक दिया गया है, जिसे आप कक्षा में वैसे ही खेल सकते हैं।
चरण 1 — पात्र बाँटिए। हीरासिंह · सेठ जी · घोसी · जवाहरसिंह · सुंदरिया (गाय) · सूत्रधार (जो बीच-बीच में कहानी बताए)।
चरण 2 — कहानी को चार दृश्यों में बाँटिए।
| दृश्य | जगह | क्या होता है |
|---|---|---|
| 1 | हरियाणा का गाँव | गरीबी। हीरासिंह गाय बेचने की सोचता है। जवाहरसिंह मना करता है। |
| 2 | दिल्ली — सेठ का घर | सेठ गाय माँगता है। सौदा दो सौ पाँच रुपए में तय होता है। हीरासिंह सच बता देता है। |
| 3 | सेठ की ड्योढ़ी | गाय आती है। घोसी को दूध नहीं देती। सेठ नाराज़ होता है। हीरासिंह खुद दुहता है। |
| 4 | रात और अगला सवेरा | सुंदरिया दरवाज़े पर आती है। हीरासिंह विह्वल हो जाता है और गाय को लेकर गाँव चल देता है। |
चरण 3 — सामान जुटाइए। हीरासिंह के लिए पगड़ी और अंगोछा · सेठ के लिए कुरता और चश्मा · दूध के लिए एक बालटी · गाय के लिए कागज़ के दो सींग और गले में घंटी।
चरण 4 — नमूना संवाद (दृश्य 3 का एक हिस्सा):
सेठ जी: हीरासिंह! तुमने मुझे धोखे में क्यों रखा? गाय से सवेरे पाँच सेर दूध भी तो नहीं उतरा।
हीरासिंह: (सिर झुकाकर) सेठ जी, मैंने खुद पंद्रह सेर से ऊपर दूध दुहकर आपको दिया था।
सेठ जी: तो जाकर गाय को देखो।
(हीरासिंह गाय के पास जाता है, पुचकारता है)
हीरासिंह: सुंदरिया, मेरी रुसवाई क्यों कराती है?
(गाय मुँह ऊपर उठाती है)
हीरासिंह: (घोसी से) बालटी लाओ।
घोसी: मैं तो पहले ही दुह चुका हूँ।
हीरासिंह: पर तुम बालटी तो लाओ।
हीरासिंह: (सिर झुकाकर) सेठ जी, मैंने खुद पंद्रह सेर से ऊपर दूध दुहकर आपको दिया था।
सेठ जी: तो जाकर गाय को देखो।
(हीरासिंह गाय के पास जाता है, पुचकारता है)
हीरासिंह: सुंदरिया, मेरी रुसवाई क्यों कराती है?
(गाय मुँह ऊपर उठाती है)
हीरासिंह: (घोसी से) बालटी लाओ।
घोसी: मैं तो पहले ही दुह चुका हूँ।
हीरासिंह: पर तुम बालटी तो लाओ।
अभिनय की सलाह: गाय का पात्र बोलेगा नहीं। वह सिर हिलाकर, मुँह ऊपर उठाकर और आँखों से ही अपनी बात कहेगा — ठीक जैसे कहानी में है। सूत्रधार बीच-बीच में बता देगा कि गाय क्या कहना चाह रही है।