हाँ, पशु-पक्षी हमारी भावनाएँ समझते हैं। वे हमारी बात शब्दों से नहीं, हमारी आवाज़, छूने के तरीके और चेहरे से समझते हैं।
घोसी के हाथ में गाय ने पाँच सेर दूध भी नहीं दिया।
हीरासिंह के पुचकारने पर उसी गाय ने साढ़े तेरह सेर दूध दे दिया।
दूध वही था, गाय वही थी — फ़र्क़ सिर्फ़ प्यार का था।
नमूना उत्तर (अपना अनुभव): हमारे घर के बाहर एक कुत्ता रहता है, जिसका नाम हमने मोती रखा है। जिस दिन मेरी परीक्षा खराब गई थी, मैं चुपचाप सीढ़ी पर बैठा था। मोती आकर मेरे पैरों के पास बैठ गया और मुझे देखता रहा। वह उस दिन भौंका भी नहीं। जब मैं हँसकर उठा, तब वह दुम हिलाता हुआ मेरे साथ दौड़ने लगा। मुझे लगा कि उसे मेरा दुख समझ आ गया था।