हीरासिंह इसलिए चल दिया, क्योंकि उसका मन पूरी तरह बदल चुका था। अब वह कोई बहस नहीं चाहता था और कोई नया कारण भी नहीं सुनना चाहता था। उसने तय कर लिया था कि गाय आज ही गाँव जाएगी।
उससे पहले वह सेठ से कह चुका था —
“आप मुझसे जितने महीने चाहें कसकर चाकरी करवाएँ,
पर गाय आज ही यहाँ से गाँव चली जाएगी।
रुपए जब आपके चुकता हो जाएँ, मुझसे कह दीजिएगा।”
उसका मन क्यों बदला: उससे पिछली रात सुंदरिया खूँटा तुड़ाकर उसके दरवाज़े पर आ खड़ी हुई थी। वह उसे अपराधी की आँखों से देख रही थी, मानो कह रही हो — “मैं अपराधिनी हूँ। लेकिन मुझे क्षमा कर देना। मैं बड़ी दुखिया हूँ।” यह देखकर हीरासिंह विह्वल हो उठा और गाय की गर्दन से लिपटकर देर तक सिसकता रहा। उसी रात उसने समझ लिया कि गाय यहाँ जीवित नहीं रह पाएगी।
‘चाकरी’ यानी नौकरी। हीरासिंह ने अपना घाटा मंज़ूर कर लिया — रुपए तनख्वाह से कटते रहें, वह बरसों काम करता रहे, पर गाय आज़ाद हो जाए। सेठ शायद फिर कोई सौदा करना चाहते, इसलिए हीरासिंह ने उन्हें बोलने का मौका ही नहीं दिया।
कहानी का अंत यही कहता है: कुछ रिश्ते रुपयों से बड़े होते हैं।