चित्रकार ने शेर को ‘जंगल के सरदार’ इसलिए कहा, ताकि शेर खुश हो जाए और उसकी बात मान ले। सरदार का अर्थ है — मुखिया, सबसे बड़ा।
“अब मुँह आप उधर तो करिए, जंगल के सरदार।”
- यह बात सच भी है। शेर को जंगल का राजा माना ही जाता है। सच्ची तारीफ़ जल्दी असर करती है।
- तारीफ़ सुनकर मन नरम पड़ जाता है। जिसकी बड़ाई हो रही हो, वह गुस्सा भूल जाता है। शेर भी बड़ाई सुनकर खुश हो गया और बिना सोचे पीठ फेर ली।
- आदर दिखाने से भरोसा बनता है। चित्रकार ने पूरे समय ‘आप’ कहकर बात की — “बैठ जाइए आप”, “मुँह आप उधर तो करिए”। इससे शेर को लगा कि यह आदमी उसका सम्मान कर रहा है, डरा नहीं रहा।
यानी ‘जंगल के सरदार’ कहना भी चित्रकार की चतुराई का ही एक हिस्सा था। उसने बिना ताकत लगाए, सिर्फ़ मीठे शब्दों से शेर को अपनी बात मनवा ली।