यह एक जापानी लोककथा है। लोककथा वह कहानी होती है जो लोगों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती चली आती है। यह पाठ 6 के बाद, पृष्ठ 72 से 74 तक, बिना क्रमांक के छपी है।
कहानी इस तरह है —
- कई वर्ष पहले जापान में दो मेंढक रहते थे। एक ओसाका के पास एक खड्ड — यानी गहरे गड्ढे — में रहता था। दूसरा क्योटो के पास बहने वाली एक नदी में रहता था।
- एक दिन दोनों के मन में एक ही विचार आया — “इस जगह पर रहते हुए बहुत दिन हो गए। अब बाहर का संसार भी देखना चाहिए।”
- संयोग ऐसा हुआ कि क्योटो वाले मेंढक ने ओसाका जाने का और ओसाका वाले मेंढक ने क्योटो जाने का निश्चय किया।
- दोनों शहरों को जोड़ने वाला रास्ता एक ही था। इसलिए रास्ते में दोनों की भेंट हो गई। उन्होंने हाथ मिलाया और बातें करने लगे।
- दोनों थक चुके थे, इसलिए एक बड़ी चट्टान की छाया में बैठ गए।
- ओसाका के मेंढक ने कहा — “कितना अच्छा होता, अगर हमारा आकार थोड़ा बड़ा होता! तब हम पहाड़ पर चढ़कर उन शहरों को देख लेते, जहाँ हम जा रहे हैं।”
- क्योटो के मेंढक ने उपाय बताया — “हम पहाड़ पर चढ़कर, एक-दूसरे का सहारा लेकर, अपने पिछले पैरों पर खड़े हो जाएँ।”
- दोनों उछलते-उछलते पहाड़ के शिखर — यानी सबसे ऊँची चोटी — पर पहुँच गए और एक-दूसरे के कंधों पर अगले पैर रखकर खड़े हो गए।
- पर उन्होंने एक बात पर ध्यान ही नहीं दिया — उनकी पीठ उन्हीं शहरों की ओर थी, जिन्हें वे देखना चाहते थे।
- इसलिए ओसाका से आया मेंढक ओसाका को ही देख रहा था और क्योटो का मेंढक क्योटो को ही।
- दोनों को लगा कि दोनों शहर एक जैसे ही हैं। ओसाका के मेंढक ने कहा — “लगता है, मैंने यहाँ तक आकर अपना समय ही नष्ट किया है।”
- निराश होकर दोनों मेंढक अपने-अपने घर लौट गए।