कक्षा ५ हिंदी अध्याय 6 दो मेंढकों की यात्रा के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
‘दो मेंढकों की यात्रा’ किस बारे में है? इस कहानी को अपने शब्दों में बताइए।
उत्तर

यह एक जापानी लोककथा है। लोककथा वह कहानी होती है जो लोगों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती चली आती है। यह पाठ 6 के बाद, पृष्ठ 72 से 74 तक, बिना क्रमांक के छपी है।

कहानी इस तरह है —

  1. कई वर्ष पहले जापान में दो मेंढक रहते थे। एक ओसाका के पास एक खड्ड — यानी गहरे गड्ढे — में रहता था। दूसरा क्योटो के पास बहने वाली एक नदी में रहता था।
  2. एक दिन दोनों के मन में एक ही विचार आया — “इस जगह पर रहते हुए बहुत दिन हो गए। अब बाहर का संसार भी देखना चाहिए।”
  3. संयोग ऐसा हुआ कि क्योटो वाले मेंढक ने ओसाका जाने का और ओसाका वाले मेंढक ने क्योटो जाने का निश्चय किया।
  4. दोनों शहरों को जोड़ने वाला रास्ता एक ही था। इसलिए रास्ते में दोनों की भेंट हो गई। उन्होंने हाथ मिलाया और बातें करने लगे।
  5. दोनों थक चुके थे, इसलिए एक बड़ी चट्टान की छाया में बैठ गए।
  6. ओसाका के मेंढक ने कहा — “कितना अच्छा होता, अगर हमारा आकार थोड़ा बड़ा होता! तब हम पहाड़ पर चढ़कर उन शहरों को देख लेते, जहाँ हम जा रहे हैं।”
  7. क्योटो के मेंढक ने उपाय बताया — “हम पहाड़ पर चढ़कर, एक-दूसरे का सहारा लेकर, अपने पिछले पैरों पर खड़े हो जाएँ।”
  8. दोनों उछलते-उछलते पहाड़ के शिखर — यानी सबसे ऊँची चोटी — पर पहुँच गए और एक-दूसरे के कंधों पर अगले पैर रखकर खड़े हो गए।
  9. पर उन्होंने एक बात पर ध्यान ही नहीं दिया — उनकी पीठ उन्हीं शहरों की ओर थी, जिन्हें वे देखना चाहते थे।
  10. इसलिए ओसाका से आया मेंढक ओसाका को ही देख रहा था और क्योटो का मेंढक क्योटो को ही।
  11. दोनों को लगा कि दोनों शहर एक जैसे ही हैं। ओसाका के मेंढक ने कहा — “लगता है, मैंने यहाँ तक आकर अपना समय ही नष्ट किया है।”
  12. निराश होकर दोनों मेंढक अपने-अपने घर लौट गए।
कहानी हँसाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है: दोनों मेंढक इतनी दूर चलकर आए, पहाड़ पर भी चढ़े — पर गलत दिशा में देखने के कारण कुछ नया देख ही नहीं पाए। मेहनत पूरी की, पर दिशा गलत थी।
प्र2.
दोनों मेंढक पहाड़ की चोटी पर एक-दूसरे के कंधों पर पैर रखकर क्यों खड़े हुए? उनसे कौन-सी गलती हो गई?
उत्तर

वे इसलिए खड़े हुए, ताकि ऊँचाई मिल जाए और वे दूर के शहर देख सकें। मेंढक का शरीर छोटा होता है, इसलिए बैठे-बैठे उन्हें कुछ दिखता नहीं था।

कहानी की पंक्ति —
“यदि हम पास के पहाड़ पर चढ़कर एक-दूसरे का सहारा लेते हुए अपने पिछले पैरों पर खड़े हो जाएँ तो फिर हम आसानी से उन शहरों को देख सकेंगे, जहाँ हम जाना चाहते हैं।”

गलती यह हुई —

उन्होंने क्या सोचाअसल में क्या हुआ
ऊँचे खड़े हो जाएँगे तो सामने का शहर दिख जाएगा।ऊँचाई तो मिल गई, पर वे एक-दूसरे की ओर मुँह करके खड़े हुए थे।
दोनों को नया शहर दिखेगा।दोनों की पीठ उसी शहर की ओर हो गई, जिसे वे देखना चाहते थे।
यात्रा सफल हो जाएगी।दोनों ने अपना ही पुराना शहर देखा और निराश होकर लौट गए।
कहानी के अपने शब्द —
“लेकिन उन दोनों ने एक बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया था। उन्होंने अपनी पीठ उन्हीं शहरों की ओर कर रखी थी, जिन्हें वे देखना चाहते थे।”
एक और छिपी हुई बात: मेंढक की आँखें सिर के ऊपर होती हैं। जब वह पिछले पैरों पर सीधा खड़ा होता है, तो उसका सिर पीछे की ओर झुक जाता है और आँखें पीछे की ओर देखने लगती हैं। इसीलिए दोनों को अपना ही शहर दिखा।
प्र3.
दोनों मेंढकों को क्योटो और ओसाका एक जैसे क्यों दिखाई दिए?
उत्तर

वे एक जैसे इसलिए दिखे, क्योंकि दोनों ने नया शहर देखा ही नहीं — दोनों ने अपना ही पुराना शहर देखा।

मेंढकवह देखना क्या चाहता थाउसे दिखा क्या
ओसाका का मेंढकक्योटोओसाका (अपना ही शहर)
क्योटो का मेंढकओसाकाक्योटो (अपना ही शहर)

इसीलिए ओसाका के मेंढक को लगा कि “क्योटो तो बिलकुल ओसाका की तरह ही दिखता है” और क्योटो के मेंढक को लगा कि “ओसाका भी क्योटो की तरह ही है”।

ओसाका क्योटो ओसाका की ओर देख रहा है क्योटो की ओर देख रहा है दोनों की पीठ अपनी मंज़िल की ओर थी।
पहाड़ की चोटी पर दोनों मेंढक आमने-सामने खड़े थे। इसलिए ओसाका से आया मेंढक ओसाका की ओर और क्योटो से आया मेंढक क्योटो की ओर देख रहा था।
सच्चाई क्या थी: क्योटो और ओसाका सचमुच एक जैसे नहीं हैं। पर मेंढकों को यह पता ही नहीं चला, क्योंकि उन्होंने गलत दिशा में देखा। यानी उनकी बात गलत नहीं थी — उनकी देखने की दिशा गलत थी।
करके देखिए: किसी साथी के सामने खड़े होकर उसके कंधों पर हाथ रखिए। अब बिना मुड़े बताइए कि आपके पीछे क्या है — दिख ही नहीं रहा न? यही मेंढकों के साथ हुआ।
प्र4.
‘दो मेंढकों की यात्रा’ से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर

सबसे बड़ी सीख यह है — सिर्फ़ मेहनत करना काफ़ी नहीं, सही दिशा में देखना भी ज़रूरी है।

सीखकहानी में कहाँ से मिली
मेहनत के साथ सही दिशा भी चाहिए।दोनों मेंढक इतनी लंबी यात्रा करके पहाड़ की चोटी तक पहुँचे, पर उलटी दिशा में देखने के कारण कुछ नया देख ही न पाए।
किसी जगह या व्यक्ति के बारे में बिना ठीक से देखे राय मत बनाइए।दोनों ने एक झलक देखकर मान लिया कि दोनों शहर एक जैसे हैं और लौट गए।
काम शुरू करने से पहले उसे ठीक से जाँच लीजिए।उन्होंने चढ़ने से पहले यह सोचा ही नहीं कि खड़े होने पर उनका मुँह किस ओर होगा।
बीच में हार मत मानिए। थोड़ा और प्रयास करने से बात बन जाती है।अगर वे बस घूमकर खड़े हो जाते, तो दोनों को नया शहर दिख जाता। इतनी छोटी-सी बात ने पूरी यात्रा बेकार कर दी।
जो हम देखना चाहते हैं, अकसर वही दिख जाता है। इसलिए जाँच ज़रूरी है।दोनों ने अपने ही शहर को दूसरा शहर मान लिया।
अपने जीवन से जोड़िए: मान लीजिए आप गणित का अभ्यास घंटों करते हैं, पर गलत तरीका दोहराते रहते हैं। मेहनत पूरी है, पर दिशा गलत है — इसलिए उत्तर सही नहीं आएगा। इसीलिए बीच-बीच में रुककर जाँच लेना चाहिए कि हम सही रास्ते पर हैं या नहीं।
यह कहानी हँसाती भी है: दो मेंढकों का पिछले पैरों पर खड़े होकर एक-दूसरे को घूरना सोचिए — कितना मज़ेदार दृश्य है! अच्छी लोककथाएँ ऐसी ही होती हैं। वे हँसाते-हँसाते सिखा जाती हैं।
प्र5.
‘दो मेंढकों की यात्रा’ का ‘चतुर चित्रकार’ पाठ से क्या संबंध है?
उत्तर

दोनों रचनाएँ एक ही बात के दो पहलू दिखाती हैं — सोच-समझकर काम करने का महत्त्व। कविता में यह बात जीतकर सिखाई गई है, लोककथा में हारकर।

बातचतुर चित्रकारदो मेंढकों की यात्रा
विधाकविता — तुकबंदी वाली, कहानी की तरह चलती हुईलोककथा — गद्य में लिखी छोटी कहानी (जापान की)
मुख्य पात्रएक चित्रकार और एक शेरदो मेंढक
पशु की भूमिकाशेर बिना सोचे पीठ फेर लेता है और ठगा जाता हैदोनों मेंढक बिना सोचे खड़े हो जाते हैं और यात्रा बेकार कर लेते हैं
‘पीठ’ का खेलशेर की पीठ चित्रकार की ओर हो जाती है — और चित्रकार बच जाता हैमेंढकों की पीठ उनकी मंज़िल की ओर हो जाती है — और यात्रा बेकार हो जाती है
जो सोचकर काम करता हैचित्रकार — वह जीत जाता हैकोई नहीं — इसीलिए दोनों निराश लौटते हैं
संदेशताकत से बड़ी चीज़ सूझ-बूझ हैमेहनत से बड़ी चीज़ सही दिशा है
सबसे सुंदर जोड़: दोनों रचनाओं में सब कुछ एक ही बात पर टिका है — कौन किस दिशा में मुँह किए हुए है। चित्रकार ने दिशा का सही उपयोग किया, इसलिए बच गया। मेंढकों ने दिशा पर ध्यान ही नहीं दिया, इसलिए खाली हाथ लौटे। इसीलिए यह लोककथा ठीक इसी पाठ के बाद रखी गई है।
सोचिए: अगर चित्रकार मेंढकों के साथ पहाड़ पर होता, तो शायद कहता — “मित्रो, ज़रा घूमकर खड़े हो जाइए!”
क्या यह उपयोगी रहा?