कक्षा ५ हिंदी अध्याय 7 बातचीत के लिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
लेखक को रामलीला की तैयारियों में कौन-कौन से काम सबसे अधिक उत्साहित करते होंगे?
उत्तर

सबसे अधिक उत्साह उन्हें पात्रों का रूप-रंग भरते हुए देखने में आता होगा। पाठ में यही बात सबसे साफ़ लिखी है।

पाठ की पंक्तियाँ —
“जिस घर में लीला पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था।”
“दो बजे दिन से पात्रों की सजावट शुरू होने लगती। मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता।”
“जिस उत्साह से दौड़कर छोटे-मोटे काम करता, उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।”

‘रूप-रंग भरना’ का अर्थ है — पात्र का वेश और मेकअप तैयार करना। यानी राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और रावण बनने वाले लोगों को सजाना।

प्रश्न में ‘करते होंगे’ पूछा गया है, इसलिए हमें पाठ के आधार पर अनुमान भी लगाना है। ये काम उन्हें ज़रूर उत्साहित करते होंगे —

कामइसमें उत्साह क्यों आता होगा
पात्रों का रंग-रोगन और वेशभूषा देखनाआँखों के सामने एक साधारण आदमी धीरे-धीरे राम या हनुमान बन जाता था। यह किसी जादू से कम नहीं लगता।
मुकुट, धनुष-बाण, गदा जैसे सामान उठाकर लाना-ले जानाये चीज़ें कहानी की चीज़ें थीं। इन्हें हाथ में पकड़ लेना ही बड़ी बात लगती होगी।
रंग की कटोरियाँ, कपड़े, दाढ़ी-मूँछ पकड़ानाइससे वे तैयारी का हिस्सा बन जाते थे, केवल देखने वाले नहीं रहते थे।
मंच सजाना, परदा और बत्ती लगवानामैदान धीरे-धीरे रामलीला का मंच बनता दिखता था।
पात्रों को पानी पिलाना, इधर-उधर का संदेश पहुँचानाबड़े लोग उन्हें काम कहते थे — इससे अपने बड़े होने का सुख मिलता होगा।
मैदान में अच्छी जगह घेरकर बैठनासबसे आगे बैठकर लीला देखने का मज़ा ही अलग होता है।
उन्हें इतना उत्साह क्यों आता था: रामलीला का घर उनके घर से बिलकुल मिला हुआ था। यानी सारी तैयारी उनकी आँखों के सामने होती थी। जो चीज़ पास होती है, उससे लगाव जल्दी हो जाता है। दूसरी बात — वहाँ उन्हें छोटे-मोटे काम मिल जाते थे, और अपने काम से किसी बड़े आयोजन का हिस्सा बन जाना बच्चे को बहुत अच्छा लगता है।
ध्यान दीजिए: लेखक ने अपने उत्साह को नापने के लिए बहुत सुंदर तुलना दी है — “उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।” पेंशन यानी अपना पैसा। यानी बचपन का वह उत्साह पैसे से भी बड़ा था।
प्र2.
आपको लेखक के बचपन की कौन-कौन सी बातें सबसे अच्छी लगीं? वे बातें आपको अच्छी क्यों लगीं?
उत्तर

यह आपके अपने मन की बात है, इसलिए उत्तर हर बच्चे का अलग होगा। एक अच्छे उत्तर में दो चीज़ें होनी चाहिए — (1) पाठ की वह बात, और (2) वह आपको अच्छी क्यों लगी।

नमूना उत्तर: मुझे लेखक के बचपन की ये बातें सबसे अच्छी लगीं —

पाठ की बातमुझे यह क्यों अच्छी लगी
“नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना”इसमें कोई रोक-टोक नहीं है। खुली हवा, खेत और पेड़ — यह पढ़कर मुझे भी अपने गाँव-खेत की याद आ गई।
गुल्ली-डंडा — “मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली”खेल का सामान खुद बना लेना मुझे बहुत अच्छा लगा। इसमें पैसे भी नहीं लगते और अपने हाथ से बनाने का सुख अलग ही होता है।
“दो आदमी भी आ गए तो खेल शुरू हो गया”इस खेल के लिए न बड़ी टीम चाहिए, न मैदान बुक करना पड़ता है। जब मन हो, तभी खेल शुरू।
रामलीला की तैयारी में दौड़-दौड़कर छोटे-मोटे काम करनाबच्चे को भी काम मिल जाना बहुत अच्छा लगता है। मुझे भी घर के त्योहारों की तैयारी में हाथ बँटाना अच्छा लगता है।
“अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था, अभिमान की गुंजाइश ही न थी”यह बात मुझे सबसे अच्छी लगी। मैदान में सब बराबर थे। खेल में यही होना भी चाहिए — दोस्ती बड़ी चीज़ है, अमीरी नहीं।
“प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना”सादा, घर का, बिना पैसे वाला नाश्ता। मुझे लगा कि खुशी महँगी चीज़ों से नहीं आती।
इन सब बातों में एक ही बात छिपी है: लेखक के बचपन की खुशियाँ बिना पैसे की खुशियाँ थीं — पेड़, खेत, टहनी की गुल्ली, दोस्तों का साथ। इसीलिए वे आज भी याद हैं। जो खुशी हम खुद बनाते हैं, वह सबसे देर तक याद रहती है।
ऐसे लिखिए: दो-तीन बातें चुनिए, हर बात के आगे “क्योंकि…” लगाकर एक वाक्य लिखिए। बस, आपका उत्तर पूरा हो जाएगा।
प्र3.
खेलते समय चोट न लगे, इसके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर

खेलना बंद करने की ज़रूरत नहीं है। बस थोड़ी सावधानी रखनी है। लेखक ने भी माना है कि चोट लग सकती है — “गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है” — पर साथ ही पूछा है, “तो क्या क्रिकेट से सिर टूट जाने का भय नहीं रहता!” यानी चोट हर खेल में लग सकती है, इसलिए डरना नहीं, सँभलकर खेलना चाहिए।

खेलने से पहले —

  1. मैदान देख लीजिए। पत्थर, काँच, कील, गड्ढा या काँटे हों तो पहले हटा दीजिए।
  2. सड़क पर मत खेलिए। खुले मैदान या पार्क में ही खेलिए। कुएँ, तालाब, नाले और बिजली के खंभे के पास खेलना खतरनाक है।
  3. हाथ-पैर थोड़े ढीले कर लीजिए — दौड़ने से पहले हल्का वार्म-अप कर लेने से मोच नहीं आती।
  4. जूते पहनकर खेलिए और चश्मा या घड़ी जैसी चीज़ें उतार दीजिए।

खेलते समय —

  1. नियम पहले तय कीजिए और सब उनका पालन कीजिए। ज़्यादातर चोट नियम तोड़ने से लगती है।
  2. गुल्ली-डंडा जैसे खेल में दूर खड़े रहिए। मारने से पहले चारों ओर देख लीजिए कि कोई सामने तो नहीं है। यही बात बल्ला, गेंद और पत्थर पर भी लागू है।
  3. धक्का-मुक्की और लड़ाई-झगड़े से बचिए। जीत से बड़ी चीज़ साथी की सुरक्षा है।
  4. थक जाएँ तो रुक जाइए और पानी पीजिए। थका शरीर जल्दी गिरता है।

चोट लग ही जाए तो —

  1. तुरंत खेल रोक दीजिए और किसी बड़े को बताइए।
  2. घाव को साफ़ पानी से धोकर प्राथमिक चिकित्सा पेटी से पट्टी कीजिए। (इसी पाठ में पृष्ठ 82 पर इसी पेटी की बात है।)
  3. ज़्यादा चोट हो, आँख या सिर पर लगी हो, तो देर मत कीजिए — सीधे डॉक्टर के पास जाइए।
सबसे ज़रूरी नियम: जिस खेल में कोई चीज़ हवा में उड़ती है — गुल्ली, गेंद, पत्थर — उसमें आँख सबसे ज़्यादा खतरे में रहती है। इसलिए ऐसे खेलों में खिलाड़ी से दूर खड़े होना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
याद रखिए: लेखक के माथे पर गुल्ली का दाग आज तक है और उनके कुछ दोस्तों को बैसाखी लेनी पड़ी। यानी यह डर सचमुच का है, बनाया हुआ नहीं। सावधानी को डरपोक होना मत समझिए — यह समझदारी है।
प्र4.
लेखक के पिता और घर के अन्य सदस्य चौके में बैठे-बैठे क्या-क्या बातें करते होंगे?
उत्तर

वे सब लेखक के देर तक खेलते रहने की बातें करते होंगे। पाठ में लिखा है — “घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं। न नहाने की सुध है, न खाने की।”

चौका यानी रसोई — जहाँ खाना बनता है और बैठकर खाया जाता है। ‘रोटियों पर क्रोध उतारना’ का अर्थ है — गुस्सा बच्चे पर है, पर वह निकल रहा है रोटी बेलने और थाली रखने पर।

नमूना बातचीत:

पिताजी: दो बज गए! खाना ठंडा हो रहा है और लड़का अभी तक नहीं लौटा।
माँ: सवेरे से गया है। न नहाया, न कुछ खाया। बस डंडा उठाया और चल दिया।
दादी: रहने दो, बच्चा है। मैं रोटी ढककर रख देती हूँ।
चाचा: मैदान से बुलाकर लाऊँ? हलधर भी वहीं होगा।
पिताजी: पढ़ाई का क्या होगा? मौलवी साहब के यहाँ भी ऐसे ही देर से पहुँचता होगा।
माँ: कल गुल्ली माथे पर लग गई थी। कहीं आँख में लग जाती तो?
दादी: हम भी तो बचपन में यही सब खेलते थे। बुला लो, डाँटो मत — बस खा-नहा ले।
वे किस बात की चर्चा करते होंगेपाठ से इसका आधार
खाना ठंडा हो रहा है, लड़का अब तक नहीं आया“पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं।”
न नहाया, न खाया — दिन भर खेल ही खेल“न नहाने की सुध है, न खाने की।”
चोट लग जाने का डर“गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है”; “हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है”
पढ़ाई पिछड़ जाने की चिंतावे दूसरे गाँव में मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे।
रामलीला के मैदान में देर तक बैठे रहना“मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता।”
बड़ों का अपना बचपन याद करना और हँस देनाघर के बड़े भी कभी बच्चे थे — इसीलिए गुस्सा ज़्यादा देर टिकता नहीं।
गुस्से के पीछे प्यार है: घरवाले नाराज़ इसलिए हैं कि बच्चा भूखा है और उसे चोट लग सकती है। यानी यह गुस्सा डाँटने के लिए नहीं, फ़िक्र के कारण है। इसीलिए लेखक ने इसे बुरा नहीं, अपने बचपन की मीठी याद की तरह लिखा है।
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