सबसे अधिक उत्साह उन्हें पात्रों का रूप-रंग भरते हुए देखने में आता होगा। पाठ में यही बात सबसे साफ़ लिखी है।
“जिस घर में लीला पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था।”
“दो बजे दिन से पात्रों की सजावट शुरू होने लगती। मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता।”
“जिस उत्साह से दौड़कर छोटे-मोटे काम करता, उस उत्साह से तो आज अपनी पेंशन लेने भी नहीं जाता।”
‘रूप-रंग भरना’ का अर्थ है — पात्र का वेश और मेकअप तैयार करना। यानी राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और रावण बनने वाले लोगों को सजाना।
प्रश्न में ‘करते होंगे’ पूछा गया है, इसलिए हमें पाठ के आधार पर अनुमान भी लगाना है। ये काम उन्हें ज़रूर उत्साहित करते होंगे —
| काम | इसमें उत्साह क्यों आता होगा |
|---|---|
| पात्रों का रंग-रोगन और वेशभूषा देखना | आँखों के सामने एक साधारण आदमी धीरे-धीरे राम या हनुमान बन जाता था। यह किसी जादू से कम नहीं लगता। |
| मुकुट, धनुष-बाण, गदा जैसे सामान उठाकर लाना-ले जाना | ये चीज़ें कहानी की चीज़ें थीं। इन्हें हाथ में पकड़ लेना ही बड़ी बात लगती होगी। |
| रंग की कटोरियाँ, कपड़े, दाढ़ी-मूँछ पकड़ाना | इससे वे तैयारी का हिस्सा बन जाते थे, केवल देखने वाले नहीं रहते थे। |
| मंच सजाना, परदा और बत्ती लगवाना | मैदान धीरे-धीरे रामलीला का मंच बनता दिखता था। |
| पात्रों को पानी पिलाना, इधर-उधर का संदेश पहुँचाना | बड़े लोग उन्हें काम कहते थे — इससे अपने बड़े होने का सुख मिलता होगा। |
| मैदान में अच्छी जगह घेरकर बैठना | सबसे आगे बैठकर लीला देखने का मज़ा ही अलग होता है। |