कक्षा ५ हिंदी अध्याय 7 पाठ से के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
लेखक के चचेरे भाई हलधर की आयु कितनी थी?
उत्तर

हलधर की आयु दस साल थी।

पाठ की पंक्ति —
“मेरी उम्र आठ साल थी, हलधर मुझसे दो साल जेठे थे।”

लेखक की उम्र = 8 साल
हलधर लेखक से बड़े थे = 2 साल
हलधर की उम्र = 8 + 2 = 10 साल

जेठा शब्द का अर्थ है — उम्र में बड़ा। इसलिए ‘दो साल जेठे’ का अर्थ हुआ ‘दो साल बड़े’।

यहाँ गलती कहाँ हो सकती है: कुछ बच्चे 8 में से 2 घटा देते हैं और 6 साल लिख देते हैं। घटाना तब होता, जब हलधर छोटे होते। पर वे जेठे यानी बड़े थे, इसलिए यहाँ जोड़ना है।
एक बात और: हलधर लेखक के चचेरे भाई थे, यानी चाचा के बेटे। दोनों साथ-साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे।
प्र2.
लेखक ने अपने घरवालों के क्रोध का कारण क्या बताया है?
उत्तर

घरवालों के क्रोध का कारण यह था कि लेखक खेल में इतने डूब जाते थे कि उन्हें न नहाने का ध्यान रहता था, न खाने का

पाठ की पंक्तियाँ —
“घरवाले बिगड़ रहे हैं, पिताजी चौके पर बैठे रोटियों पर अपना क्रोध उतार रहे हैं।
न नहाने की सुध है, न खाने की।”

यहाँ दो शब्द समझ लीजिए —

  • सुध = ध्यान, होश। ‘नहाने की सुध न होना’ यानी नहाने की बात याद ही न रहना।
  • चौका = रसोई, जहाँ खाना बनता और खाया जाता है।

‘रोटियों पर क्रोध उतारना’ का अर्थ है — गुस्सा बच्चे पर है, पर वह निकल रहा है रोटी बेलने-सेंकने पर। यह कहने का बहुत सुंदर ढंग है।

घरवाले नाराज़ क्यों होते थे: दोपहर हो चुकी है, खाना तैयार है और बच्चा मैदान में है। खाना ठंडा हो रहा है, नहाना रह गया है, और गुल्ली से चोट लगने का डर अलग। यानी यह गुस्सा असल में फ़िक्र है। पर बच्चे को उस समय गुल्ली के आगे कुछ सूझता ही नहीं — “गुल्ली है जरा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा है।”
प्र3.
लेखक के अनुसार, गुल्ली-डंडा और विलायती खेलों में क्या अंतर है?
उत्तर

सबसे बड़ा अंतर खर्च का है। गुल्ली-डंडा बिना पैसे के खेला जाता है, जबकि विलायती यानी विदेशी खेलों का सामान महँगा होता है।

पाठ की पंक्तियाँ —
“न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न थापी की, मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ गए तो खेल शुरू हो गया।”
“विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उनके सामान महँगे होते हैं।”
“भारतीय खेल खिलाएँ जो बिना दाम, कौड़ी के खेले जाते हैं।”
बातगुल्ली-डंडाविलायती खेल
सामानपेड़ से एक टहनी काटकर खुद बना लीजिएतैयार सामान बाज़ार से खरीदना पड़ता है
खर्चबिना दाम-कौड़ी के, यानी कुछ भी खर्च नहींसामान महँगा — यही लेखक के अनुसार उनका सबसे बड़ा ऐब (दोष) है
मैदानन लॉन चाहिए, न कोर्ट — कोई भी खाली जगह चलेगीबना-बनाया लॉन या कोर्ट चाहिए
कितने खिलाड़ीदो लोग हो जाएँ तो खेल शुरूपूरी टीम और तय संख्या चाहिए
फीसकोई फीस नहीं“हमारे स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रुपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है।”
कौन खेल सकता हैहर कोई — “अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था”जिसके पास पैसा हो, वही सामान जुटा सकता है
चोट का डरगुल्ली से आँख फूटने का डरक्रिकेट से सिर टूटने का डर — यानी डर दोनों में है
लेखक की राय“गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है।”“हम अंग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई है।”
लेखक कहना क्या चाहते हैं: वे विदेशी खेलों को बुरा नहीं कह रहे। वे यह कह रहे हैं कि हमने अपने खेलों को बेकार समझना शुरू कर दिया है। जो खेल बिना पैसे के खेला जा सके, वह हर बच्चे तक पहुँच सकता है — गरीब के बच्चे तक भी। इसीलिए वे पूछते हैं कि स्कूलों में भारतीय खेल क्यों नहीं खिलाए जाते।
चोट वाली दलील समझिए: लोग कहते हैं कि गुल्ली से आँख फूट सकती है। लेखक उत्तर देते हैं — क्रिकेट से भी तो सिर टूट सकता है। यानी चोट के डर से किसी एक खेल को ही खराब कहना ठीक नहीं। सावधानी हर खेल में चाहिए।
प्र4.
इस पाठ में लेखक ने अपने बचपन के किन-किन अनुभवों को याद किया है?
उत्तर

लेखक ने अपने बचपन की चार बड़ी यादें लिखी हैं — गाँव और घर, पढ़ने जाना, रामलीला, और गुल्ली-डंडा।

  1. गाँव, घर और खुलापन — “वह कच्चा टूटा घर, वह पयाल का बिछौना, वह नंगे बदन, नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना।” (पयाल यानी धान की सूखी डंठल, जिसे बिछाकर सोते थे।)
  2. पढ़ने जाना — वे अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाते थे। तब उनकी उम्र आठ साल थी और हलधर दस साल के थे। दोनों सवेरे मटर और जौ का चबेना लेते थे।
  3. रामलीला — घर से थोड़ी दूर रामलीला मैदान था और पात्रों का रूप-रंग भरने वाला घर बिलकुल सटा हुआ था। वे दोपहर से ही वहाँ जा बैठते और दौड़-दौड़कर छोटे-मोटे काम करते थे।
  4. गुल्ली-डंडा — “गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है।” सवेरे घर से निकल जाना, पेड़ पर चढ़कर टहनी काटना और अपनी गुल्ली-डंडा बनाना। खिलाड़ियों का जमघट, लड़ाई-झगड़े, और सबका सरल स्वभाव।
अनुभवपाठ की पंक्तिउस याद का भाव
कच्चा टूटा घर, पयाल का बिछौना“वह कच्चा टूटा घर, वह पयाल का बिछौना”घर छोटा और सादा था, पर उसकी याद मीठी है।
नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ पर चढ़ना“नंगे पाँव खेतों में घूमना, आम के पेड़ों पर चढ़ना”खुली हवा और पूरी आज़ादी।
हलधर के साथ पढ़ने जाना“मैं अपने चचेरे भाई हलधर के साथ दूसरे गाँव में एक मौलवी साहब के यहाँ पढ़ने जाया करता था।”भाई का साथ और रोज़ का लंबा रास्ता।
मटर और जौ का चबेना“हम दोनों प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना लेते थे।”सादा, घर का, बिना पैसे का नाश्ता।
रामलीला की तैयारी“दो बजे दिन से पात्रों की सजावट शुरू होने लगती। मैं दोपहर से ही वहाँ जा बैठता।”काम करने का ऐसा उत्साह, जो अब नहीं रहा।
गुल्ली-डंडा बनाना और खेलना“प्रातःकाल घर से निकल जाना, पेड़ पर चढ़कर टहनियाँ काटना और गुल्ली-डंडा बनाना।”अपने हाथ से खेल बना लेने का सुख।
चोट और उसका दाग“अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है”चोट भी अब एक प्यारी निशानी बन गई है।
सबका बराबर होना“अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था, अभिमान की गुंजाइश ही न थी।”यही उस बचपन की सबसे बड़ी सुंदरता है।
घरवालों की डाँट“न नहाने की सुध है, न खाने की।”डाँट भी अब मीठी याद बन गई है।
इन सब यादों में एक बात साझा है: इनमें से किसी में पैसा नहीं लगा। खेत, पेड़, टहनी, चबेना, दोस्त, रामलीला का मैदान — सब मुफ़्त थे। इसीलिए पाठ के अंत में लेखक कहते हैं — “गुल्ली है जरा-सी, पर उसमें दुनिया भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा है।”
क्या यह उपयोगी रहा?