कक्षा ५ हिंदी अध्याय 7 इन्हें भी जानिए तथा पता लगाइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
‘इन्हें भी जानिए’ (पृष्ठ 84) में मुरलीकांत राजाराम पेटकर के बारे में क्या-क्या बताया गया है?
उत्तर

मुरलीकांत राजाराम पेटकर भारत के एक प्रसिद्ध पैरालंपिक तैराक हैं। बक्से में उनके जीवन की ये बातें दी गई हैं —

बातपुस्तक में क्या लिखा है
जन्मसन् 1944 में, महाराष्ट्र में
पहचानभारत के एक प्रसिद्ध पैरालंपिक तैराक
पहले क्या करते थेवे भारतीय सेना के एक जवान थे
जीवन का मोड़सन् 1965 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय कई गोलियाँ लगने के कारण वे लकवाग्रस्त हो गए
तैराकी कैसे शुरू हुईउन्होंने चिकित्सकों की सलाह पर तैराकी शुरू कर दी
बचपन की रुचिकुश्ती, हॉकी आदि खेलों में बचपन से ही रुचि रखते थे
सफलता कैसे मिलीअपनी लगन और परिश्रम से कुछ ही समय में तैराकी में प्रवीणता प्राप्त कर ली
सबसे बड़ी उपलब्धिवे 1972 के हाइडिलबर्ग पैरालंपिक में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाले दिव्यांग तैराक बने
सम्मानतत्पश्चात सन् 2018 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया

तीन शब्द समझ लीजिए —

  • पैरालंपिक — बक्से के अनुसार, “दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए समय-समय पर आयोजित होने वाला ओलंपिक खेलों का कार्यक्रम है।”
  • लकवाग्रस्त — जिसे लकवा मार गया हो, यानी शरीर का कोई भाग काम करना बंद कर दे।
  • प्रवीणता — किसी काम में पूरी पकड़, निपुणता।
इस कहानी की सबसे बड़ी बात: जिस चोट ने उनका शरीर कमज़ोर किया, उसी के इलाज के लिए शुरू की गई तैराकी ने उन्हें देश का पहला पैरालंपिक स्वर्ण पदक दिला दिया। यानी मुश्किल को उन्होंने रास्ता बना लिया। ध्यान दीजिए — पुस्तक कहती है कि यह “लगन और परिश्रम” से हुआ, किसी चमत्कार से नहीं।
पाठ से जोड़िए: लेखक ने लिखा है कि खेल के मैदान में “अमीर-गरीब का बिलकुल भेद न था।” पेटकर की कहानी उसी बात को आगे बढ़ाती है — मैदान में शरीर का भेद भी नहीं होना चाहिए। सबको खेलने का अवसर मिलना चाहिए।
प्र2.
अब आप चित्र में दिखाई गई प्रसिद्ध पैरालंपिक महिला खिलाड़ी के बारे में पता लगाइए।
पृष्ठ 84 पर छपा छायाचित्र — यहाँ केवल उसका वर्णन दिया गया है; मूल छायाचित्र पाठ्यपुस्तक में देखिए।

चित्र में एक युवा महिला खिलाड़ी तीरंदाज़ी (धनुष-बाण) की प्रतियोगिता में निशाना लगा रही है। उसके बाल पीछे चोटी में बँधे हैं और सिर पर पतला हेयरबैंड है। वह नीली-सफ़ेद जर्सी और नीली पतलून पहने है; सीने पर एक पट्टा (हार्नेस) बँधा है और ठोड़ी के पास डोरी खींचने वाला छोटा हुक लगा है। उसके दोनों हाथ नहीं हैं। वह अपना दाहिना पैर ऊपर उठाकर उसी से धनुष को थामे हुए है; बाण धनुष पर चढ़ा है और डोरी खिंची हुई है। उसकी दृष्टि सामने निशाने पर टिकी है। पीछे खुला नीला आकाश है और पास ही एक और खिलाड़ी खड़ा है।

इसके लिए आप अपने अभिभावकों, शिक्षकों अथवा अन्य स्रोतों की सहायता ले सकते हैं।
उत्तर

यह पता लगाने वाला काम है। पहले चित्र को ध्यान से देखिए, फिर खोजिए।

चित्र में क्या दिख रहा है: एक युवा खिलाड़ी तीरंदाज़ी कर रही है। उसके हाथ नहीं हैं। वह धनुष को पैर से सँभालकर, ठोड़ी और कंधे की मदद से डोरी खींचकर निशाना लगा रही है। यह पैरा-तीरंदाज़ी का दृश्य है।

पता लगाने का तरीका —

  1. चरण 1: चित्र में जो दिखता है, उसे कागज़ पर लिखिए — खेल कौन-सा है, खिलाड़ी क्या कर रही है, वेश कैसा है।
  2. चरण 2: घर के बड़ों और अपने खेल-शिक्षक से पूछिए — “भारत की पैरा-तीरंदाज़ी में कौन-सी महिला खिलाड़ी प्रसिद्ध हैं?”
  3. चरण 3: पुस्तकालय में खेल-पत्रिका और पुराने समाचार-पत्र देखिए। पैरालंपिक और एशियाई पैरा खेलों के पन्ने सबसे उपयोगी होंगे।
  4. चरण 4: जो नाम मिले, उसे कम-से-कम दो जगह मिलाकर देखिए। एक ही जगह पढ़कर मान लेना ठीक नहीं।
  5. चरण 5: अब एक छोटा परिचय-पत्र बनाइए — नाम, राज्य, खेल, बड़ी उपलब्धि, और एक बात जो आपको सबसे अच्छी लगी।

नमूना उत्तर: चित्र में जिस तरह की खिलाड़ी दिखाई गई है, वैसी भारत की सबसे प्रसिद्ध पैरा-तीरंदाज़ शीतल देवी हैं। वे जम्मू-कश्मीर की रहने वाली हैं। उनके जन्म से ही दोनों हाथ नहीं हैं, फिर भी वे पैर से धनुष सँभालकर तीर चलाती हैं और अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीत चुकी हैं। उन्होंने एशियाई पैरा खेलों में स्वर्ण पदक जीता और पैरालंपिक में भी भारत के लिए पदक जीता है। उनकी सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपनी कमी को कभी रुकावट नहीं माना — रोज़ के अभ्यास से उन्होंने अपने पैरों को इतना सधा लिया कि निशाना कभी नहीं चूकता।

ईमानदारी की बात: पुस्तक ने इस खिलाड़ी का नाम नहीं छापा है — केवल चित्र दिया है। इसलिए नाम अपने शिक्षक या अभिभावक से पूछकर पक्का कर लीजिए, और उसी नाम पर अपना परिचय-पत्र बनाइए। किसी की उपलब्धि लिखते समय तारीख़ और प्रतियोगिता का नाम जाँच लेना बहुत ज़रूरी है।
ऐसे काम क्यों दिए जाते हैं: इनमें उत्तर किताब में नहीं होता — उत्तर आपको खुद खोजना होता है। पूछना, ढूँढ़ना और मिलाकर देखना — यही तीनों मिलकर ‘पता लगाना’ कहलाते हैं। यह आदत आगे हर विषय में काम आएगी।
क्या यह उपयोगी रहा?