प्र1.
नीचे दिए गए चित्रों का उनके उपयुक्त विवरण से मिलान कीजिए —
पृष्ठ 78 पर छपे चार चित्र और उनके सामने दिए गए चार विवरण।
| चित्र | विवरण |
|---|---|
| (क) एक समुद्री कीड़े का खोल जिसे पुराने समय में मुद्रा की तरह उपयोग करते थे। | |
| (ख) काठ का चपटे और चौड़े सिरे का डंडा | |
| (ग) भ्रमण करना अथवा इधर-उधर चलना | |
| (घ) चबाकर खाने के लिए भुना हुआ अनाज |
उत्तर
चारों जोड़े इस प्रकार बनेंगे —
| चित्र (ऊपर से नीचे) | चित्र में क्या है | सही विवरण | वह शब्द जो पाठ में आया है |
|---|---|---|---|
| पहला चित्र | माता-पिता और दो बच्चे सड़क पर टहलने निकले हैं | (ग) भ्रमण करना अथवा इधर-उधर चलना | घूमना — “नंगे पाँव खेतों में घूमना” |
| दूसरा चित्र | कटोरे में भरे हुए भुने दाने और मुरमुरे | (घ) चबाकर खाने के लिए भुना हुआ अनाज | चबेना — “प्रातःकाल मटर और जौ का चबेना लेते थे” |
| तीसरा चित्र | लकड़ी का चौड़ा, चपटा डंडा (कपड़े धोने वाला) | (ख) काठ का चपटे और चौड़े सिरे का डंडा | थापी — “न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न थापी की” |
| चौथा चित्र | बीच में लंबी दरार वाले चमकीले सीप जैसे खोल | (क) एक समुद्री कीड़े का खोल जिसे पुराने समय में मुद्रा की तरह उपयोग करते थे। | कौड़ी — “जो बिना दाम, कौड़ी के खेले जाते हैं” |
अब हर शब्द को थोड़ा और समझ लीजिए —
- घूमना — यहाँ इसका अर्थ है बिना किसी काम के इधर-उधर चलना, टहलना। लेखक खेतों में यही करते थे।
- चबेना — भूनकर तैयार किया हुआ अनाज, जो चलते-फिरते चबाया जा सके। इसे बनाने में तेल-मसाला बहुत कम लगता है, इसलिए यह सस्ता भी है और सेहत के लिए अच्छा भी।
- थापी — कपड़े धोने का चौड़ा लकड़ी का डंडा। पाठ में लेखक कहते हैं कि गुल्ली-डंडा खेलने के लिए थापी तक की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- कौड़ी — समुद्री कीड़े का खोल। बहुत पुराने समय में लोग इसी से खरीद-बिक्री करते थे, यानी यह उस समय का सिक्का थी। इसीलिए “बिना दाम-कौड़ी के” का अर्थ हुआ — बिना एक पैसा खर्च किए।
मिलान करने का आसान तरीका: पहले विवरण में से एक पहचान वाला शब्द ढूँढ़िए। जैसे — “समुद्री कीड़े का खोल” सुनते ही सीप जैसी चीज़ ध्यान में आती है, और “भुना हुआ अनाज” सुनते ही कटोरे वाले दाने। इस तरह जोड़ी अपने आप बन जाती है।
ध्यान दीजिए: तीसरा चित्र देखने में क्रिकेट के बल्ले जैसा लगता है, पर विवरण साफ़ कहता है — “काठ का चपटे और चौड़े सिरे का डंडा”, यानी थापी। पाठ की ‘समझ और अनुभव’ वाली प्रश्न-संख्या 3 भी यही बताती है कि बच्चे थापी को बल्ले की तरह उपयोग कर लेते हैं।