कक्षा ५ हिंदी अध्याय 9 अनुमान और कल्पना के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
जिस समय आकाश में हंस को तीर लगा उस समय उसके अन्य साथियों ने आपस में क्या बातें की होंगी?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका अपना होगा। पर कल्पना भी पाठ के अनुसार होनी चाहिए। पाठ में उस समय के बारे में तीन बातें लिखी हैं —

  • हंस “किस तेजी से धरती पर गिर रहा है”।
  • “उसकी चीख तो सुनो…”
  • “और बाकी पक्षी कैसे प्राण लेकर भाग रहे हैं!” — प्राण लेकर भागना यानी जान बचाकर भागना।

यानी बाकी हंस डर गए थे और तेज़ी से उड़ गए थे। उनकी बातचीत ऐसी रही होगी —

नमूना उत्तर (कल्पित संवाद):

कौनक्या कहा होगा
पहला हंस“भागो! नीचे से कुछ आया है… हमारा साथी गिर गया!”
दूसरा हंस“मैंने उसकी चीख सुनी। उसके पंख में कुछ चुभा है। ऊपर उठो, और ऊपर!”
तीसरा हंस (बूढ़ा)“यह तीर है, बच्चो। नीचे मनुष्य हैं। हम आकाश में उड़ रहे थे, किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा था… फिर यह क्यों?”
पहला हंस“क्या हम लौटकर उसे देखें? वह अकेला रह गया है।”
बूढ़ा हंस“अभी नहीं। लौटे तो हम सब मारे जाएँगे। पर हम इस उद्यान के ऊपर चक्कर लगाते रहेंगे और देखते रहेंगे।”
एक छोटा हंस“देखो! नीचे एक लड़के ने उसे उठा लिया है। वह उसे मार नहीं रहा… वह तो उसका तीर निकाल रहा है!”
दूसरा हंस“तब वह बच जाएगा। कुछ मनुष्य मारते हैं और कुछ बचाते भी हैं।”
ऐसी कल्पना ही ठीक क्यों है: क्योंकि यह पाठ से मेल खाती है। पाठ कहता है कि बाकी पक्षी डरकर भागे, इसलिए संवाद में डर होना चाहिए। और पाठ यह भी दिखाता है कि नीचे एक मनुष्य ऐसा भी था जो बचा रहा था — इसलिए अंत में आशा की बात रखी गई है।
लिखने का तरीका: संवाद लिखते समय बाईं ओर बोलने वाले का नाम, फिर छोटी रेखा (–), फिर उसकी बात — ठीक वैसे ही जैसे इस पाठ में “सिद्धार्थ – …” और “सखा – …” लिखा है।
प्र2.
हंस देवदत्त के पास उड़कर क्यों नहीं गया?
उत्तर

हंस देवदत्त के पास इसलिए नहीं गया क्योंकि देवदत्त ने ही उसे तीर मारा था और वह उससे डरता था। सभा में जब देवदत्त ने उसे पुचकारकर बुलाया, तब पाठ में लिखा है —

देवदत्त – (पुचकारकर) आओ… मेरे पास आओ।
(पक्षी डरकर फड़फड़ाता और चीखता है।)


मंत्री – “कुमार देवदत्त! हंस तुम्हारे पास नहीं आना चाहता।

पुचकारना यानी प्यार से आवाज़ करके बुलाना। देवदत्त ने शब्द तो प्यार के कहे, पर हंस को उसके शब्द नहीं, उसका किया हुआ याद था।

इसके तीन कारण हैं —

  1. डर। उसी व्यक्ति ने उसे तीर मारा था। पशु-पक्षी उसे नहीं भूलते जिसने उन्हें चोट पहुँचाई हो। पहले भी, जब सिद्धार्थ ने हंस को आगे बढ़ाया था, तब “वह सहसा देवदत्त को देखकर चीखता है और सिद्धार्थ की गोद में दुबक जाता है।”
  2. प्यार का न होना। देवदत्त के मन में हंस के लिए प्रेम नहीं था। उसके लिए हंस उसकी जीत की निशानी था — “मेरा लक्ष्य अब पूरी तरह सध गया है।” पशु-पक्षी मन का भाव पहचान लेते हैं।
  3. दूसरी ओर भरोसा। सिद्धार्थ ने उसका तीर निकाला, मरहम लगवाया और कहा — “डरो नहीं मित्र! तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। मैं यहीं हूँ।” इसलिए सिद्धार्थ के बुलाते ही “हंस एकदम उड़कर उनकी गोद में आ चिपकता है।”
इससे नाटक की सबसे बड़ी बात निकलती है: डर से कोई पास नहीं आता, प्रेम से आता है। देवदत्त के पास तीर था, सिद्धार्थ के पास मरहम। हंस ने मरहम वाले को चुना।
प्र3.
राजा शुद्धोदन ने निर्णय के बाद सिद्धार्थ से क्या कहा होगा?
उत्तर

यह भी कल्पना का प्रश्न है। पर पाठ से संकेत मिलता है कि महाराज उस समय क्या महसूस कर रहे थे —

  • “महाराज की आँखों में स्नेहपूरित गर्व है।” — यानी प्यार से भरा हुआ गर्व। उन्हें अपने बेटे पर गर्व हो रहा था।
  • “महाराज के नेत्र सजल हो जाते हैं।” — सजल यानी आँसुओं से भरे हुए।
  • “महाराज और मंत्री हर्ष से मुस्कुराते हैं।”

इसलिए उनकी बात प्रेम, गर्व और आशीर्वाद से भरी रही होगी।

नमूना उत्तर:

“आओ सिद्धार्थ, मेरे पास आओ।
आज तुमने मुझे एक बात सिखा दी है, पुत्र।
मैं समझता था कि वीरता तीर चलाने में है।
तुमने दिखा दिया कि सच्ची वीरता जान बचाने में है।
तुमने कहा — बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है।
यह बात मैं जीवन भर याद रखूँगा।
इस हंस को अपने पास रखो। इसका घाव पूरा भरने तक इसकी सेवा करो।
और देवदत्त से बैर मत रखना — वह अभी छोटा है, वह भी सीख जाएगा।
जिस दिन तुम राजा बनोगे, कपिलवस्तु का न्याय ऐसा ही होगा।”
यह उत्तर पाठ के अनुसार क्यों है: महाराज ने पहले सिद्धार्थ से यह भी कहा था — “वीर अपना आखेट नहीं छोड़ सकता।” यानी शुरू में वे पुरानी रीत की ओर थे। पर सिद्धार्थ के उत्तर के बाद उनकी आँखों में गर्व आया। इसलिए उनकी बात में यह मान लेना होना चाहिए कि बेटे ने उन्हें कुछ नया सिखाया।
अपना उत्तर लिखते समय: तीन बातें रखिए — (1) महाराज की खुशी, (2) सिद्धार्थ की किस बात पर गर्व, (3) आगे के लिए कोई आशीर्वाद या सीख। यही तीन बातें आपके उत्तर को पूरा बना देंगी।
प्र4.
एक रात सिद्धार्थ मीठी नींद सो रहे हैं। उनके सपने में हंस आता है और सिद्धार्थ के साथ न्याय वाले दिन का अपना अनुभव सुनाता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि हंस ने सिद्धार्थ से क्या-क्या बातें की होंगी?
उत्तर

यह प्रश्न बड़ा सुंदर है — इसमें हंस बोलता है। सोचिए कि उस दिन हंस पर क्या-क्या बीता था: आकाश में उड़ना, तीर लगना, गिरना, तीर निकाला जाना, मरहम, फिर सभा, फिर आसन पर अकेले बैठना, दो आवाज़ें और अंत में गोद।

नमूना उत्तर (सपने का संवाद):

कौनबात
हंस“कुमार, सो रहे हो? मैं हूँ — वही हंस।”
सिद्धार्थ“मित्र! तुम बोल भी लेते हो?”
हंस“सपने में सब बोल लेते हैं। मुझे उस दिन की बात कहनी है। उस दिन मैं अपने झुंड के साथ उड़ रहा था। नीचे हरा-भरा उद्यान था। मुझे लगा जैसे मैं हवा में तैर रहा हूँ। तभी कुछ चुभा और मेरा एक पंख काम करना बंद कर गया।”
सिद्धार्थ“तुम मेरी गोद में आ गिरे थे।”
हंस“हाँ। मैं गिर रहा था और सोच रहा था कि अब अंत है। पर मैं जिस गोद में गिरा, वह गरम थी और काँप रही थी — डर से नहीं, दया से। जब तुमने तीर खींचा तो बहुत दर्द हुआ, पर उसके बाद साँस लौट आई।”
सिद्धार्थ“और सभा में? वहाँ तुम बहुत डरे हुए थे।”
हंस“बहुत। इतने बड़े-बड़े लोग, ऊँचा आसन, और मैं अकेला। पर तुमने कहा था — ‘डरो नहीं मित्र! मैं यहीं हूँ।’ बस उसी वाक्य के सहारे मैं बैठा रहा।”
सिद्धार्थ“फिर देवदत्त ने बुलाया।”
हंस“उसकी आवाज़ मीठी थी, पर उसकी गंध वही थी जो तीर के साथ आई थी। मेरा शरीर अपने आप चीख पड़ा। और जब तुमने बुलाया, तो मुझे सोचना ही नहीं पड़ा — पंख अपने आप तुम्हारी ओर उड़ चले।”
सिद्धार्थ“मुझे उस दिन बहुत डर था कि तुम मुझसे छीन लिए जाओगे।”
हंस“कुमार, एक बात याद रखना — जो जान बचाता है, उसे कोई पहचान-पत्र नहीं चाहिए। हम जीव जान लेते हैं कि कौन अपना है। मेरा घाव भर गया है। अब मैं अपने झुंड के पास लौट जाऊँगा, पर हर साल इसी उद्यान के ऊपर से उड़ूँगा।”
सिद्धार्थ“तो मैं हर शाम आकाश की ओर देखा करूँगा, मित्र।”
अपना संवाद लिखते समय: कम-से-कम चार बातें रखिए — (1) उड़ते समय क्या हुआ, (2) गिरने और बचाए जाने का अनुभव, (3) सभा में कैसा डर लगा, (4) दोनों के बुलाने पर मन ने क्या किया। हर बात दो-तीन छोटे वाक्यों में। अंत में हंस का धन्यवाद ज़रूर लिखिए।
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