कक्षा ५ हिंदी अध्याय 9 भाषा की बात के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
पाठ में हंस और हँस शब्द आए हैं। हंस में अनुस्वार ( ं ) का प्रयोग हुआ है और हँस में चंद्रबिंदु ( ँ ) का प्रयोग हुआ है। अब आप इस पाठ में आए अनुस्वार एवं चंद्रबिंदु वाले शब्दों को खोजिए और अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। उनका वाक्यों में भी प्रयोग कीजिए।
उत्तर

पहले दोनों चिह्न पहचान लीजिए।

  • अनुस्वार ( ं ) — केवल एक बिंदु, अक्षर के ऊपर। इसे बोलते समय नाक के साथ-साथ एक हल्का व्यंजन भी सुनाई देता है, जैसे हंस में ‘न्’ जैसा।
  • चंद्रबिंदु ( ँ ) — आधा चाँद और उसके ऊपर बिंदु। इसे बोलते समय आवाज़ केवल नाक से निकलती है, कोई अलग व्यंजन नहीं सुनाई देता, जैसे हँस में।
हंस = पक्षी (जो पानी पर तैरता है)  |  हँस = हँसने वाली क्रिया
“हंस उनकी गोद में चिपक जाता है।”  बनाम  “सिद्धार्थ – (हँसकर) सच मित्र!”

पाठ में आए अनुस्वार ( ं ) वाले शब्द —

शब्दपाठ की पंक्तिअपने वाक्य में प्रयोग
हंस“हंस उनकी गोदी में आ गिरता है।”तालाब में एक सफ़ेद हंस तैर रहा था।
रंगमंच“रंगमंच पर राज-उद्यान का एक दृश्य।”हमारा नाटक विद्यालय के रंगमंच पर हुआ।
मंच“मंच पर लालिमा।”मुख्य अतिथि मंच पर आकर बैठ गए।
संध्याकाल“संध्याकाल। मंच पर लालिमा।”संध्याकाल में मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं।
शांति“कैसा सुहावना समय है! कैसी शांति है!”पुस्तकालय में पूरी शांति रहती है।
सुंदर“ऊपर तो देखो, कैसे सुंदर पक्षी हैं।”दादी ने मेरी कॉपी पर सुंदर चित्र बनाया।
प्रसन्न“राजकुमार सिद्धार्थ प्रसन्न मन एक वेदी पर बैठे हैं।”परिणाम सुनकर पिता जी बहुत प्रसन्न हुए।
परंतु“तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है।”मैंने बुलाया, परंतु वह नहीं आया।
मंत्री“मंत्री जी! समस्या जटिल है।”मंत्री ने गाँव में नया विद्यालय खुलवाया।
शांत“(शांत स्वर) ठीक है देवदत्त, मैं विवश हूँ।”शोर सुनकर शिक्षक ने कक्षा को शांत कराया।
स्तंभित“सब लोग स्तंभित होकर एक-दूसरे को देखते हैं।”यह समाचार सुनकर सब स्तंभित रह गए।
कंठ“सिद्धार्थ के कंठ से स्नेहपूरित शब्द निकलते ही…”गाते-गाते उसका कंठ सूख गया।

पाठ में आए चंद्रबिंदु ( ँ ) वाले शब्द —

शब्दपाठ की पंक्तिअपने वाक्य में प्रयोग
हँसकर“(हँसकर) सच मित्र! तुम तो बहुत बातें जानते हो।”भाई ने हँसकर मेरी बात टाल दी।
सँभालते“कुमार करुणा से भरकर उसे सँभालते हैं।”गिरते हुए घड़े को माँ ने सँभाल लिया।
काँपता“(काँपता-सा) कुमार…”ठंड से मेरा हाथ काँपने लगा।
साँस“(साँस खींचकर) नहीं कुमार! मैं इसको नहीं मार सकूँगा।”दौड़ने के बाद मेरी साँस तेज़ चलने लगी।
आँखें“देखो तो, इसकी आँखें कितनी भोली हैं!”नींद में उसकी आँखें बंद हो गईं।
मुँह“देवदत्त मुँह लटकाए पीछे हटते हैं।”खाना खाने से पहले मुँह-हाथ धो लो।
रँभाने“गायों के बछड़े-बछियों के रँभाने के स्वर उठते हैं।”शाम को गाय के रँभाने की आवाज़ आई।
दूँगा“मैं यह हंस तुमको कभी नहीं दूँगा।”मैं तुम्हें अपनी नई पेंसिल दूँगा।
पूछूँगा“मैं गुरुजी से पूछूँगा, योगी किसे कहते हैं…”यह सवाल मैं दीदी से पूछूँगा।
सकूँगा“मैं इसको नहीं मार सकूँगा।”इतना भारी बस्ता मैं नहीं उठा सकूँगा।
लौटाऊँगा“हंस मेरी शरण में आ चुका है। मैं उसे नहीं लौटाऊँगा।”तुम्हारी किताब मैं कल लौटाऊँगा।
कहाँ / यहाँ / वहाँ“कुमार अब कहाँ हैं?”, “हंस यहाँ आसन पर बैठा है।”, “वहाँ प्रवेश करते हैं।”तुम कहाँ थे? मैं यहाँ हूँ, वहाँ मत ढूँढ़ो।
चिह्न पहचानने का आसान तरीका: शब्द को ज़ोर से बोलिए। यदि नाक की आवाज़ के साथ कोई और अक्षर भी सुनाई दे (न्, म्, ङ् जैसा) तो अनुस्वार लगेगा — जैसे हंस, मंच, कंठ। यदि केवल नाक की गूँज सुनाई दे और कोई अलग अक्षर न आए तो चंद्रबिंदु लगेगा — जैसे हँस, साँस, आँख
सावधानी: चिह्न बदलने से अर्थ भी बदल जाता है — हंस (पक्षी) और हँस (हँसना), अंगना (आँगन/स्त्री) और अँगना। इसलिए लिखते समय बिंदु और चंद्रबिंदु का ध्यान रखिए।
प्र2.
रेखांकित शब्दों के विपरीत अर्थ वाले शब्दों से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए — (क) सूर्य का उदय पूर्व दिशा में और ____ पश्चिम दिशा में होता है।
उत्तर

रिक्त स्थान में आएगा — अस्त

सूर्य का उदय पूर्व दिशा में और अस्त पश्चिम दिशा में होता है।

उदय यानी निकलना, ऊपर आना। इसका उल्टा है अस्त — यानी डूबना, छिप जाना। सूरज सुबह पूरब में उदय होता है और शाम को पश्चिम में अस्त हो जाता है।

यही बात नाटक में सखा ने कही थी —

“देखो न, सूरज रोज सवेरे पूरब से निकलता है और शाम को पश्चिम में छिप जाता है।”
जोड़ी याद रखिए: उदय × अस्त, पूर्व × पश्चिम, सवेरा × शाम — इस एक वाक्य में विपरीत शब्दों की तीन जोड़ियाँ छिपी हैं।
प्र3.
(ख) उसने मारा है परंतु मैंने ____ है।
उत्तर

रिक्त स्थान में आएगा — बचाया

उसने मारा है परंतु मैंने बचाया है।

मारना यानी चोट पहुँचाना या जान लेना। इसका उल्टा है बचाना — यानी जान की रक्षा करना।

यह वाक्य नाटक से ही लिया गया है। पृष्ठ 103 पर सिद्धार्थ ने कहा था —

“तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है… इसलिए यह हंस मेरा है। मैं तुम्हें नहीं दूँगा।”
यही पूरे नाटक की जान है: सिद्धार्थ ने आगे कहा — “बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है।” इसी वाक्य पर सभा में हर्ष-ध्वनि हुई थी, यानी लोगों ने खुश होकर आवाज़ की थी।
प्र4.
(ग) इस निर्दोष पक्षी को मारने वाला ____ है।
उत्तर

रिक्त स्थान में आएगा — दोषी

इस निर्दोष पक्षी को मारने वाला दोषी है।

निर्दोष यानी जिसका कोई दोष न हो, जिसने कुछ गलत न किया हो। इसका उल्टा है दोषी — यानी जिससे गलती हुई हो, जो अपराध का ज़िम्मेदार हो। (‘अपराधी’ भी लिखा जा सकता है, पर दोषी ही सीधा उल्टा शब्द है, क्योंकि दोनों में ‘दोष’ शब्द है।)

ध्यान दीजिए — निर् जोड़ देने से शब्द का अर्थ उलट जाता है: दोष → निर्दोष, बल → निर्बल, भय → निर्भय, धन → निर्धन।

यह वाक्य भी पाठ से जुड़ा है। सिद्धार्थ ने देवदत्त से कहा था —

“तुमने एक निर्दोष पक्षी को मारने का प्रयास किया है। इसका प्रमाण यह हंस है।”
प्र5.
(घ) इस जटिल समस्या का हल बहुत ____ है।
उत्तर

रिक्त स्थान में आएगा — सरल (या आसान)।

इस जटिल समस्या का हल बहुत सरल है।

जटिल यानी उलझा हुआ, कठिन। इसका उल्टा है सरल — यानी आसान, सीधा।

यह वाक्य सीधे नाटक के दूसरे दृश्य से बना है। वहाँ दोनों शब्द आमने-सामने आए हैं —

महाराज – “मंत्री जी! समस्या जटिल है। आप कुछ रास्ता सुझा सकते हैं?”
मंत्री – “महाराज! समस्या बड़ी आसान है। मुझे आज्ञा दें तो मैं अभी इसका निर्णय किए देता हूँ।”
दोनों शब्द क्यों चलेंगे: ‘सरल’ और ‘आसान’ — दोनों का अर्थ एक ही है। पुस्तक के इसी पाठ में मंत्री ने ‘आसान’ शब्द बोला है, इसलिए वह भी ठीक है। परीक्षा में कोई एक लिख देना काफ़ी है।
इस पाठ से विपरीत शब्दों की और जोड़ियाँ: मारना × बचाना, निर्दोष × दोषी, जटिल × सरल, उदय × अस्त, हर्ष × शोक, शांत × क्रोधित, प्रश्न × उत्तर, आगे × पीछे।
प्र6.
नीचे दिए गए चित्रों और शब्दों को जोड़कर मुहावरे/लोकोक्ति बनाइए —
चित्र पहेली (क) (क) के बहाना।
पृष्ठ 112 पर दी गई चित्र पहेली (क)।
उत्तर

चित्र में मगरमच्छ है और उसके आगे एक आँख है जिससे आँसू बह रहा है। दोनों को जोड़ने पर मुहावरा बनता है —

मगरमच्छ के आँसू बहाना

अर्थ — झूठा दुख दिखाना। यानी दुख हो नहीं, पर ऊपर से रोने का नाटक करना।

वाक्य — पौधा उखाड़ने के बाद वह मगरमच्छ के आँसू बहाने लगा, जबकि तोड़ा उसी ने था।

यह मुहावरा बना कैसे: कहते हैं कि मगरमच्छ जब शिकार खाता है तब उसकी आँखों से पानी बहता है। दुख से नहीं, अपने आप। इसी से यह कहावत चली कि जो सचमुच दुखी न हो और फिर भी रोने का दिखावा करे, वह ‘मगरमच्छ के आँसू’ बहा रहा है।
प्र7.
(ख) [आँख] मिचौनी खेलना।
उत्तर

चित्र में एक आँख है। शब्द के साथ जोड़ने पर बनता है —

आँख-मिचौनी खेलना

अर्थ — कभी सामने आना, कभी छिप जाना; सामने आने से बचते रहना।

वाक्य — सावन के महीने में सूरज बादलों से दिन भर आँख-मिचौनी खेलता रहा।

यह भी जानिए: ‘आँख-मिचौनी’ बच्चों का एक खेल भी है, जिसमें एक बच्चा आँखें बंद करता है और बाकी छिप जाते हैं। इसी खेल से यह मुहावरा बना।
प्र8.
(ग) [१] और [१] ग्यारह।
उत्तर

चित्र में लाल रंग के दो (एक) के अंक बने हैं और बीच में ‘और’ लिखा है। दोनों ‘एक’ पास-पास आकर ११ (ग्यारह) बन जाते हैं। इससे लोकोक्ति बनती है —

एक और एक ग्यारह (होते हैं)

अर्थ — मिलकर काम करने से शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। अकेले जितना हो सकता है, साथ मिलकर उससे कहीं ज़्यादा होता है।

वाक्य — दोनों भाइयों ने साथ मिलकर खेत सँभाला और सचमुच एक और एक ग्यारह हो गए।

अंकों का खेल समझिए: जोड़ में 1 + 1 = 2 होता है। पर जब दोनों ‘1’ अगल-बगल रख दिए जाएँ तो ‘11’ बन जाता है। यही चित्र का मज़ा है — दो का जोड़ नहीं, दो का साथ
प्र9.
(घ) अक्ल बड़ी या [भैंस]।
उत्तर

चित्र में भैंस है। शब्दों के साथ जोड़ने पर लोकोक्ति बनती है —

अक्ल बड़ी या भैंस

अर्थ — शरीर की ताकत से बुद्धि बड़ी होती है। काम ज़ोर से नहीं, समझ से बनता है।

वाक्य — पत्थर हटाने के लिए सबने ज़ोर लगाया, पर मोहन ने लकड़ी लगाकर उसे सरका दिया — सच है, अक्ल बड़ी या भैंस!

इस नाटक से इसका सीधा नाता है: देवदत्त के पास धनुष-बाण और ज़ोर था, पर झगड़ा उससे नहीं सुलझा। मंत्री ने केवल एक बुद्धि से भरा उपाय निकाला — हंस को खुद चुनने दो — और बात हल हो गई।
प्र10.
(ङ) [बंदर] क्या जाने [अदरक] का स्वाद!
उत्तर

चित्र में एक ओर बंदर है और दूसरी ओर अदरक। लोकोक्ति बनती है —

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!

अर्थ — जिसे किसी चीज़ की परख या समझ ही न हो, वह उसका मोल नहीं जान सकता।

वाक्य — उसने वीणा को कोने में डाल दिया — बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद!

ध्यान दीजिए: यह कहावत किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं बोलनी चाहिए। इसका असली मतलब यह है कि हर चीज़ की क़दर वही कर पाता है जो उसे समझता हो।
प्र11.
(च) [९] [२] [११] होना।
उत्तर

चित्र में चार अंक बने हैं — नीले रंग में और , फिर लाल रंग में दो , यानी ११। इन्हें पढ़िए — नौ, दो, ग्यारह। मुहावरा बनता है —

नौ दो ग्यारह होना

अर्थ — चुपचाप भाग जाना, फ़ौरन गायब हो जाना।

वाक्य — शोर सुनते ही खेत से बंदर नौ दो ग्यारह हो गए।

रंगों से पढ़ने में आसानी: दो अंक नीले हैं — ९ और २। दो अंक लाल हैं — १ और १, जो मिलकर ११ बनते हैं। इसीलिए यह “नौ – दो – ग्यारह” पढ़ा जाता है।
पाठ से जोड़िए: तीर लगते ही “बाकी पक्षी कैसे प्राण लेकर भाग रहे हैं!” — यानी बाकी हंस नौ दो ग्यारह हो गए।
प्र12.
(छ) [लाल छींटा] [पीला छींटा] होना।
उत्तर

चित्र में रंग के दो छींटे हैं — एक लाल और एक पीला। मुहावरा बनता है —

लाल-पीला होना

अर्थ — बहुत गुस्सा करना। गुस्से में चेहरा तमतमा जाना।

वाक्य — अपनी कॉपी फटी देखकर वह लाल-पीला हो गया।

यह नाटक में कहाँ दिखता है: देवदत्त बार-बार गुस्से में आता है — “(क्रोध से) मैं अभी महाराज के पास जाता हूँ” और “(तिलमिलाकर) कुमार…”। यही लाल-पीला होना है। तिलमिलाना यानी गुस्से और खीझ से बेचैन हो उठना।
प्र13.
(ज) [दाँत] तले [उँगली] दबाना।
उत्तर

चित्र में एक ओर खुले हुए दाँत हैं और दूसरी ओर एक उँगली। मुहावरा बनता है —

दाँतों तले उँगली दबाना

अर्थ — बहुत हैरान रह जाना, अचरज से चुप रह जाना।

वाक्य — छोटी-सी बच्ची को इतनी तेज़ गिनती सुनाते देख सबने दाँतों तले उँगली दबा ली।

पाठ से मिलाइए: जब हंस अपने आप उड़कर सिद्धार्थ की गोद में जा चिपका, तब सभा का यही हाल था — “सब लोग स्तंभित होकर एक-दूसरे को देखते हैं।” स्तंभित होना और दाँतों तले उँगली दबाना — दोनों का भाव एक ही है।
प्र14.
(झ) [पेट] में [चूहे] कूदना।
उत्तर

चित्र में एक ओर पेट दिखाया गया है (तीर उसी की ओर है) और दूसरी ओर दौड़ते हुए चूहे। मुहावरा बनता है —

पेट में चूहे कूदना

अर्थ — बहुत ज़ोर की भूख लगना।

वाक्य — खेल के मैदान से लौटते-लौटते मेरे पेट में चूहे कूदने लगे।

इसी अर्थ का दूसरा रूप: “पेट में चूहे दौड़ना” भी बोला जाता है। दोनों ठीक हैं।
पाठ से जोड़िए: सिद्धार्थ ने पहले ही दृश्य में कहा था — “जब भोजन का समय होता है तो हमें अपने आप भूख लग आती है।” भूख का यही अपने आप लगना इस मुहावरे में मज़ेदार ढंग से कहा गया है।
प्र15.
(ञ) [सूरज] को [दीपक] दिखाना।
उत्तर

चित्र में एक ओर चमकता सूरज है और दूसरी ओर जलता हुआ दीपक। मुहावरा बनता है —

सूरज को दीपक दिखाना

अर्थ — किसी बहुत बड़े या प्रसिद्ध को अपनी छोटी-सी चीज़ से बड़ा दिखाने की कोशिश करना; ऐसा काम करना जिसकी कोई ज़रूरत ही न हो।

वाक्य — इतने बड़े गायक के सामने गाना गाकर उसे सिखाना तो सूरज को दीपक दिखाना है।

बात समझिए: सूरज अपने आप में सबसे बड़ा प्रकाश है। उसके सामने दीपक की रोशनी कुछ भी नहीं। इसलिए यह मुहावरा उस काम के लिए बोला जाता है जो बेकार हो।
प्र16.
साथ ही अपनी रुचि के किन्हीं पाँच मुहावरों और लोकोक्तियों का वाक्यों में प्रयोग भी कीजिए —
उत्तर

ऊपर के दस में से कोई भी पाँच चुनिए। नीचे पाँच चुने हुए दिए गए हैं, हर एक का अर्थ और नया वाक्य —

क्रममुहावरा / लोकोक्तिअर्थवाक्य में प्रयोग
1मगरमच्छ के आँसू बहाना (मुहावरा)झूठा दुख दिखानागिलहरी को डराने के बाद वह मगरमच्छ के आँसू बहाने लगा।
2दाँतों तले उँगली दबाना (मुहावरा)बहुत हैरान रह जानाहंस को सिद्धार्थ की गोद में जाते देख पूरी सभा ने दाँतों तले उँगली दबा ली।
3नौ दो ग्यारह होना (मुहावरा)भाग जानाघंटी बजते ही सारे बच्चे मैदान से नौ दो ग्यारह हो गए।
4एक और एक ग्यारह (लोकोक्ति)मिलकर काम करने से शक्ति बढ़ जाती हैदोनों बहनों ने मिलकर पूरा बगीचा साफ़ कर दिया — एक और एक ग्यारह!
5अक्ल बड़ी या भैंस (लोकोक्ति)ताकत से बुद्धि बड़ी होती हैमंत्री ने बिना झगड़े के फ़ैसला करा दिया — सच ही कहा है, अक्ल बड़ी या भैंस।
मुहावरा और लोकोक्ति में अंतर: मुहावरा पूरा वाक्य नहीं होता — उसे वाक्य में जोड़ना पड़ता है, जैसे “वह नौ दो ग्यारह हो गया।” लोकोक्ति (कहावत) अपने आप में एक पूरी बात होती है, जैसे “अक्ल बड़ी या भैंस।” उसे जैसा है वैसा ही बोल दिया जाता है।
लिखने का तरीका: मुहावरे को वाक्य में उसी रूप में रखिए जिस रूप में वह बोला जाता है। जैसे “उसने दाँतों तले उँगली दबाई” ठीक है, पर “उसने दाँत के नीचे उँगली रखी” गलत — इससे मुहावरा टूट जाता है।
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