कक्षा ५ हिंदी अध्याय 9 सोचिए और लिखिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
हंस को घायल देखकर सिद्धार्थ ने क्या किया?
उत्तर

हंस को घायल देखकर सिद्धार्थ ने उसे बचाया। उन्होंने उसे गोद में लेकर तीर निकाला, मरहम लगवाया और अंत तक उसकी रक्षा की। उन्होंने जो-जो किया, वह क्रम से यह है —

  1. दौड़कर आगे बढ़े और उसे सँभाला। — “सिद्धार्थ आगे बढ़ते हैं। हंस उनकी गोदी में आ गिरता है… कुमार करुणा से भरकर उसे सँभालते हैं।”
  2. दुख और गुस्सा प्रकट किया। — “किस निर्दयी ने इस भोले-भाले पक्षी को घायल किया है? इसने किसी का क्या बिगाड़ा था?”
  3. शरीर में लगा तीर निकाला। — “(तीर निकालते हुए)…” तीर निकलते ही हंस को चैन मिला और वह अनुराग से उनकी गोदी में चिपक गया। अनुराग यानी प्रेम।
  4. स्नेह से हाथ फेरा, ताकि पक्षी का डर कम हो — “कुमार स्नेह से उसके शरीर पर हाथ फेरते हैं।”
  5. दवा मँगवाई। — “तुम दौड़कर राजवैद्य से मरहम तो ले आओ।” सखा मरहम लाया और हंस को लगाया। इसके बाद हंस शांत हो गया।
  6. देवदत्त को हंस देने से मना कर दिया। — “तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है… इसलिए यह हंस मेरा है। मैं तुम्हें नहीं दूँगा।”
  7. न्याय के लिए महाराज की सभा में गए और वहाँ भी हंस को गोद में लिए रहे — “राजकुमार सिद्धार्थ हंस को गोद में लिए वहाँ प्रवेश करते हैं।”
  8. आसन पर बैठाते समय उसे ढाढ़स दिया। — “डरो नहीं मित्र! तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। मैं यहीं हूँ।”
इससे सिद्धार्थ के बारे में क्या पता चलता है: उनके मन में करुणा है — यानी दूसरे का दुख देखकर उठने वाला दर्द। वे केवल दुख जताकर रुके नहीं, काम भी किया। और उन्होंने पक्षी को “मित्र” कहकर बुलाया, वस्तु की तरह नहीं समझा। यही आगे चलकर गौतम बुद्ध बनने वाले राजकुमार की पहचान है।
ध्यान देने की बात: सिद्धार्थ ने सखा से यह भी कहा — “कोई भी व्यक्ति, जिसके पास हृदय है, इन निर्दोष पक्षियों को नहीं मार सकेगा।” यानी दया कोई विशेष गुण नहीं, हर उस व्यक्ति में होनी चाहिए जिसके पास हृदय है।
प्र2.
अंततः हंस सिद्धार्थ को ही क्यों मिला?
उत्तर

हंस सिद्धार्थ को इसलिए मिला क्योंकि हंस ने स्वयं सिद्धार्थ को चुना। मंत्री ने उसे आसन पर बैठाकर दोनों राजकुमारों से बुलवाया। देवदत्त के बुलाने पर वह डरकर चीखा और सिद्धार्थ के बुलाने पर उड़कर उनकी गोद में आ चिपका।

मंत्री का निर्णय —
“देखिए महाराज! पक्षी ने अपने आप इस प्रश्न का निर्णय कर दिया है।
वह राजकुमार सिद्धार्थ के पास रहना चाहता है। वह उन्हीं को मिले।”


महाराज का आदेश —
“मंत्रिवर! हमें तुम्हारा निर्णय स्वीकार है। हम आज्ञा देते हैं कि
हंस राजकुमार सिद्धार्थ के पास रहे।”

अब देखिए कि इस फ़ैसले से पहले दोनों पक्षों ने क्या-क्या कहा था —

बातदेवदत्त का पक्षसिद्धार्थ का पक्ष
दावे का आधार“मैंने इसे मारा है। इसके शरीर में मेरा तीर लगा है।”“तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है।”
बड़ा कौन“मैंने पहले हंस को मारा है इसलिए वह मेरा है।”“बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है।”
वीरता का नियममहाराज ने कहा — “वीर अपना आखेट नहीं छोड़ सकता।”“वीर शरणागत को भी नहीं छोड़ सकता। हंस मेरी शरण में आ चुका है।”
पक्षी का व्यवहारबुलाने पर पक्षी “डरकर फड़फड़ाता और चीखता है।”बुलाते ही “हंस एकदम उड़कर उनकी गोद में आ चिपकता है।”

इसलिए तीन कारण बनते हैं —

  1. हंस की अपनी पसंद। जिसने डर दिया उसके पास वह नहीं गया; जिसने जान बचाई उसी के पास गया।
  2. बचाना मारने से बड़ा है। देवदत्त ने केवल निशाना साधा था; सिद्धार्थ ने तीर निकाला, मरहम लगवाया और जान बचाई।
  3. शरणागत की रक्षा। हंस अपनी जान बचाने के लिए सिद्धार्थ की गोद में गिरा था। जो शरण में आ जाए, उसे लौटाया नहीं जाता।
मंत्री का उपाय इतना अच्छा क्यों था: दोनों राजकुमार थे, दोनों के पास तर्क थे। किसी एक की बात मान लेने पर दूसरे को लगता कि पक्षपात हुआ। इसलिए मंत्री ने फ़ैसला उस पर छोड़ दिया जिसकी जान का सवाल था — हंस पर। इसी को सच्चा न्याय कहते हैं।
प्र3.
कहानी को अपने ढंग से प्रवाह चार्ट के रूप में लिखिए— (पुस्तक में आठ खाने बने हैं; पहले दो भरे हुए हैं — “सिद्धार्थ व उसके सखा का प्रकृति को निहारना।” और “तीर लगे पक्षी का घायल होकर गिरना।” शेष छह खाने भरने हैं।)
उत्तर

प्रवाह चार्ट यानी वह चित्र जिसमें घटनाएँ क्रम से एक खाने से दूसरे खाने की ओर तीर बनाकर लिखी जाती हैं। पुस्तक में आठ खाने हैं — बाईं ओर चार, दाईं ओर चार। पहले दो खाने छपे हुए हैं। बाकी छह इस तरह भरिए —

खानाक्या लिखेंयह किस पृष्ठ की बात है
1 (छपा हुआ)सिद्धार्थ व उसके सखा का प्रकृति को निहारना।पृष्ठ 99–100
2 (छपा हुआ)तीर लगे पक्षी का घायल होकर गिरना।पृष्ठ 101
3सिद्धार्थ का हंस को गोद में लेकर तीर निकालना और सखा से मरहम मँगवाना।पृष्ठ 101–102
4देवदत्त का आना और यह कहकर हंस माँगना कि तीर उसका है।पृष्ठ 102–103
5सिद्धार्थ का मना करना और दोनों में झगड़ा बढ़ना।पृष्ठ 103–104
6सखा के सुझाव पर सबका महाराज शुद्धोदन की सभा में जाना और दोनों पक्षों का सुना जाना।पृष्ठ 104–107
7मंत्री का उपाय — हंस को आसन पर बैठाकर दोनों राजकुमारों से बारी-बारी बुलवाना।पृष्ठ 107–108
8हंस का सिद्धार्थ की गोद में जा चिपकना और महाराज का आदेश — हंस सिद्धार्थ के पास रहे।पृष्ठ 108–109

यही बात तीर के चिह्नों के साथ इस तरह दिखती है —

1. सिद्धार्थ व सखा का प्रकृति को निहारना। 2. तीर लगे पक्षी का घायल होकर गिरना। 3. हंस को गोद में लेकर तीर निकालना और मरहम मँगवाना। 4. देवदत्त का आकर हंस माँगना — “तीर मेरा है।” 5. सिद्धार्थ का मना करना, झगड़ा बढ़ना। 6. महाराज की सभा में जाना, दोनों पक्षों का सुना जाना। 7. मंत्री का उपाय — हंस को आसन पर बैठाकर दोनों से बुलवाना। 8. हंस का सिद्धार्थ की गोद में जाना; हंस सिद्धार्थ को मिला। बाईं ओर के चार खाने ऊपर से नीचे, फिर दाईं ओर के चार खाने ऊपर से नीचे।
‘न्याय’ नाटक की कहानी का प्रवाह चार्ट — आठ खानों में पूरी घटना-शृंखला।
प्रवाह चार्ट बनाने का तरीका: (1) पहले कहानी की मुख्य घटनाएँ अलग काग़ज़ पर लिख लीजिए। (2) उन्हें समय के क्रम में जमाइए — जो पहले हुआ, वह पहले। (3) हर खाने में केवल एक घटना लिखिए, एक ही वाक्य में। (4) दो खानों के बीच तीर बनाइए, जो यह दिखाता है कि “इसके बाद यह हुआ”।
क्या यह उपयोगी रहा?