प्र1.
हंस को घायल देखकर सिद्धार्थ ने क्या किया?
उत्तर
हंस को घायल देखकर सिद्धार्थ ने उसे बचाया। उन्होंने उसे गोद में लेकर तीर निकाला, मरहम लगवाया और अंत तक उसकी रक्षा की। उन्होंने जो-जो किया, वह क्रम से यह है —
- दौड़कर आगे बढ़े और उसे सँभाला। — “सिद्धार्थ आगे बढ़ते हैं। हंस उनकी गोदी में आ गिरता है… कुमार करुणा से भरकर उसे सँभालते हैं।”
- दुख और गुस्सा प्रकट किया। — “किस निर्दयी ने इस भोले-भाले पक्षी को घायल किया है? इसने किसी का क्या बिगाड़ा था?”
- शरीर में लगा तीर निकाला। — “(तीर निकालते हुए)…” तीर निकलते ही हंस को चैन मिला और वह अनुराग से उनकी गोदी में चिपक गया। अनुराग यानी प्रेम।
- स्नेह से हाथ फेरा, ताकि पक्षी का डर कम हो — “कुमार स्नेह से उसके शरीर पर हाथ फेरते हैं।”
- दवा मँगवाई। — “तुम दौड़कर राजवैद्य से मरहम तो ले आओ।” सखा मरहम लाया और हंस को लगाया। इसके बाद हंस शांत हो गया।
- देवदत्त को हंस देने से मना कर दिया। — “तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है… इसलिए यह हंस मेरा है। मैं तुम्हें नहीं दूँगा।”
- न्याय के लिए महाराज की सभा में गए और वहाँ भी हंस को गोद में लिए रहे — “राजकुमार सिद्धार्थ हंस को गोद में लिए वहाँ प्रवेश करते हैं।”
- आसन पर बैठाते समय उसे ढाढ़स दिया। — “डरो नहीं मित्र! तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। मैं यहीं हूँ।”
इससे सिद्धार्थ के बारे में क्या पता चलता है: उनके मन में करुणा है — यानी दूसरे का दुख देखकर उठने वाला दर्द। वे केवल दुख जताकर रुके नहीं, काम भी किया। और उन्होंने पक्षी को “मित्र” कहकर बुलाया, वस्तु की तरह नहीं समझा। यही आगे चलकर गौतम बुद्ध बनने वाले राजकुमार की पहचान है।
ध्यान देने की बात: सिद्धार्थ ने सखा से यह भी कहा — “कोई भी व्यक्ति, जिसके पास हृदय है, इन निर्दोष पक्षियों को नहीं मार सकेगा।” यानी दया कोई विशेष गुण नहीं, हर उस व्यक्ति में होनी चाहिए जिसके पास हृदय है।