शाम होते ही प्रकृति में कई बदलाव दिखाई देते हैं। आकाश लाल-सुनहरा हो जाता है, सूरज पश्चिम की ओर ढल जाता है, पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं और गायें वन से गाँव की ओर आती हैं। धीरे-धीरे उजाला कम होता है और ठंडी हवा चलने लगती है।
यही चित्र नाटक के पहले दृश्य में भी है। वहाँ लिखा है —
किरणें चित्र बनाती हैं। पुष्प झूमते हैं। दूर नेपथ्य में वन से लौटती गायों का
स्वर उठता हुआ। पक्षी विदा का गान गाते हैं।)”
संध्याकाल यानी शाम का समय। लालिमा यानी लाल रंग की आभा, जो डूबते सूरज से आकाश और मंच पर फैल जाती है।
| किसमें परिवर्तन | शाम को क्या होता है | नाटक में इसका संकेत |
|---|---|---|
| आकाश | नीला आकाश लाल, नारंगी और सुनहरा हो जाता है। | “मंच पर लालिमा। किरणें चित्र बनाती हैं।” |
| सूरज | सूरज पश्चिम दिशा में ढलकर छिप जाता है। | “सूरज रोज सवेरे पूरब से निकलता है और शाम को पश्चिम में छिप जाता है।” |
| पक्षी | झुंड बनाकर अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं और खूब चहचहाते हैं। | “पक्षी विदा का गान गाते हैं।” / “पक्षी लौट रहे हैं।” |
| पशु | गायें-भैंसें वन या चरागाह से गाँव लौटती हैं, बछड़े रँभाते हैं। | “दूर नेपथ्य में वन से लौटती गायों का स्वर उठता हुआ।” |
| फूल | कई फूल बंद होने लगते हैं; हवा से पौधे झूमते हैं। | “पुष्प झूमते हैं।” |
| हवा और उजाला | हवा ठंडी हो जाती है और उजाला धीरे-धीरे कम होने लगता है। | “संध्याकाल… कैसा सुहावना समय है! कैसी शांति है!” |
| आवाज़ें | दिन के जीव चुप होने लगते हैं और झींगुर बोलने लगते हैं। | “कैसी शांति है!” |