कक्षा ५ हिंदी अध्याय 9 बातचीत के लिए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
जब शाम होती है तो आपको प्रकृति में क्या-क्या परिवर्तन दिखाई देते हैं?
उत्तर

शाम होते ही प्रकृति में कई बदलाव दिखाई देते हैं। आकाश लाल-सुनहरा हो जाता है, सूरज पश्चिम की ओर ढल जाता है, पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं और गायें वन से गाँव की ओर आती हैं। धीरे-धीरे उजाला कम होता है और ठंडी हवा चलने लगती है।

यही चित्र नाटक के पहले दृश्य में भी है। वहाँ लिखा है —

“(रंगमंच पर राज-उद्यान का एक दृश्य। संध्याकाल। मंच पर लालिमा
किरणें चित्र बनाती हैं। पुष्प झूमते हैं। दूर नेपथ्य में वन से लौटती गायों का
स्वर उठता हुआ। पक्षी विदा का गान गाते हैं।)”

संध्याकाल यानी शाम का समय। लालिमा यानी लाल रंग की आभा, जो डूबते सूरज से आकाश और मंच पर फैल जाती है।

किसमें परिवर्तनशाम को क्या होता हैनाटक में इसका संकेत
आकाशनीला आकाश लाल, नारंगी और सुनहरा हो जाता है।“मंच पर लालिमा। किरणें चित्र बनाती हैं।”
सूरजसूरज पश्चिम दिशा में ढलकर छिप जाता है।“सूरज रोज सवेरे पूरब से निकलता है और शाम को पश्चिम में छिप जाता है।”
पक्षीझुंड बनाकर अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं और खूब चहचहाते हैं।“पक्षी विदा का गान गाते हैं।” / “पक्षी लौट रहे हैं।”
पशुगायें-भैंसें वन या चरागाह से गाँव लौटती हैं, बछड़े रँभाते हैं।“दूर नेपथ्य में वन से लौटती गायों का स्वर उठता हुआ।”
फूलकई फूल बंद होने लगते हैं; हवा से पौधे झूमते हैं।“पुष्प झूमते हैं।”
हवा और उजालाहवा ठंडी हो जाती है और उजाला धीरे-धीरे कम होने लगता है।“संध्याकाल… कैसा सुहावना समय है! कैसी शांति है!”
आवाज़ेंदिन के जीव चुप होने लगते हैं और झींगुर बोलने लगते हैं।“कैसी शांति है!”
ऐसा क्यों होता है: सूरज ढलने पर धूप और गरमी घटती है। इसी से पशु-पक्षी समझ जाते हैं कि लौटने का समय हो गया। नाटक में सिद्धार्थ और सखा इसी पर बात करते हैं कि हर वस्तु का एक स्वभाव होता है — भूख अपने आप लगती है, नींद अपने आप आती है, और सूरज रोज़ अपने समय पर निकलता-छिपता है।
ऐसे बताइए: कक्षा में बोलते समय जो आपने सचमुच देखा है, वही बताइए — जैसे “हमारी छत से शाम को तोतों का झुंड नीम के पेड़ पर आता है।” अपनी देखी हुई बात सबसे अच्छी लगती है।
प्र2.
क्या आपने कभी किसी पशु-पक्षी को बचाया है? उनसे जुड़ा कोई अनुभव साझा कीजिए।
उत्तर

यह आपके अपने जीवन का प्रश्न है, इसलिए उत्तर हर बच्चे का अलग होगा। जो आपने सचमुच किया हो, वही बताइए। यदि आपने किसी को बचाया न हो, तो साफ़ कह दीजिए — और यह बताइए कि आगे मौका मिले तो आप क्या करेंगे। सच्चा उत्तर ही अच्छा उत्तर है।

अच्छे उत्तर में ये चार बातें होनी चाहिए —

  1. कौन-सा पशु या पक्षी था और वह किस मुसीबत में था।
  2. आपने क्या-क्या किया — कदम-दर-कदम।
  3. किसकी मदद ली — बड़ों की, या पशु-चिकित्सक की।
  4. उस समय आपको कैसा लगा।

नमूना उत्तर:

पिछली गरमी की बात है। दोपहर में मैंने देखा कि हमारे आँगन में एक छोटी गौरैया ज़मीन पर पड़ी है। वह उड़ नहीं पा रही थी और उसकी साँस तेज़ चल रही थी। मैंने पहले एक कपड़े के टुकड़े से उसे धीरे-से उठाया, क्योंकि सीधे हाथ से पकड़ने पर पक्षी और डर जाता है। फिर उसे छाया में एक टोकरी में रखा। माँ ने कहा कि पहले पानी दो। मैंने ढक्कन में थोड़ा पानी रखकर उसके पास सरका दिया। उसने दो-तीन बूँद पी। लगभग आधे घंटे बाद वह अपने आप फुदकी और फिर उड़कर नीम की डाल पर जा बैठी।

उस समय मुझे बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे धन्यवाद कहा हो। उसी दिन से हमने छत पर एक मिट्टी का सकोरा रख दिया है और उसमें रोज़ पानी भरते हैं। अब वहाँ रोज़ गौरैया, कबूतर और कभी-कभी बुलबुल भी आती हैं।

इस प्रश्न का नाटक से नाता: सिद्धार्थ ने भी यही किया था। उन्होंने घायल हंस को गोद में लिया, तीर निकाला और मरहम मँगवाया। बचाना कोई बड़ा काम नहीं होता — बस समय पर की गई थोड़ी-सी दया होती है।
ध्यान रखिए: घायल पशु-पक्षी को अकेले न सँभालें। पहले किसी बड़े को बुलाइए। पक्षी को ज़ोर से न पकड़िए, चोंच में ज़बरदस्ती पानी न डालिए और कुत्ते-बंदर जैसे बड़े जानवर के पास बिना बड़ों के मत जाइए।
प्र3.
यदि आप मंत्री के स्थान पर होते तो न्याय कैसे करते?
उत्तर

पहले यह देख लीजिए कि झगड़ा था क्या। दोनों पक्षों की बात नाटक में साफ़ लिखी है —

पक्षदावा क्या हैनाटक की पंक्ति
देवदत्तहंस मेरा है, क्योंकि तीर मैंने मारा था। जो शिकार करता है, शिकार उसी का होता है।“मैंने पहले हंस को मारा है इसलिए वह मेरा है।”
सिद्धार्थहंस मेरा है, क्योंकि जान मैंने बचाई। बचाने वाला मारने वाले से बड़ा होता है, और शरण में आए को छोड़ा नहीं जाता।“तुमने मारा है परंतु मैंने बचाया है… इसलिए यह हंस मेरा है।”

दोनों अपनी-अपनी जगह तर्क दे रहे थे, इसलिए महाराज ने कहा — “समस्या जटिल है।” जटिल यानी उलझी हुई।

मंत्री ने असल में क्या किया: उन्होंने किसी की बात नहीं मानी। उन्होंने हंस से ही पूछ लिया। हंस को आसन पर बैठाया और दोनों से बारी-बारी बुलवाया। देवदत्त के बुलाने पर पक्षी डरकर चीखा; सिद्धार्थ के बुलाने पर उड़कर उनकी गोद में आ चिपका। मंत्री ने कहा — “पक्षी ने अपने आप इस प्रश्न का निर्णय कर दिया है।”

नमूना उत्तर: यदि मैं मंत्री के स्थान पर होता, तो मैं भी न्याय इसी तरह करता — पर इन चार चरणों में:

  1. दोनों की पूरी बात सुनता। बीच में न रोकता। न्याय की पहली शर्त यही है कि दोनों पक्ष कह लें।
  2. देखता कि इस झगड़े में सबसे ज़्यादा किस पर बीत रही है। यहाँ वह हंस था — घायल और डरा हुआ।
  3. हंस को ही चुनने देता। उसे बीच में बैठाकर दोनों से बुलवाता। जो जीव जिसके पास खुशी से जाए, वह उसी के पास सुरक्षित है।
  4. निर्णय के साथ कारण भी बताता। देवदत्त से कहता — “तुम्हारा निशाना ठीक था, पर निशाना लगाने का हक़ किसी की जान पर नहीं बनता। हंस जीवित प्राणी है, कोई वस्तु नहीं।”
यह तरीका सबसे अच्छा क्यों है: झगड़ा दो लोगों का था, पर जान तीसरे की थी। जब न्याय करना हो तो सबसे पहले उसकी सुननी चाहिए जिस पर बीत रही है। मंत्री ने न किसी राजकुमार का पक्ष लिया, न रोब देखा — इसीलिए उनके निर्णय पर सभा ने जय-जयकार की और महाराज की आँखें भर आईं।
यह भी सोचिए: यदि हंस देवदत्त के पास चला जाता तो? तब भी मैं यह शर्त रखता कि पहले उसका घाव पूरा भरे। घायल जीव को उसी के पास रहने देना चाहिए जो उसका इलाज कर सकता हो।
प्र4.
इस नाटक में सभी पात्र पुरुष हैं। यदि किन्हीं दो पात्रों को महिला पात्र के रूप में प्रस्तुत करना हो तो आप किन्हें बदलकर प्रस्तुत करना चाहेंगे और क्यों?
उत्तर

यह बात सही है — नाटक के छहों पात्र पुरुष हैं: सिद्धार्थ, शुद्धोदन (महाराज), सखा, देवदत्त, मंत्री और प्रतिहारी। इनमें से किन्हीं दो को महिला पात्र बनाया जा सकता है।

नमूना उत्तर: मैं सखा और मंत्री को महिला पात्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहूँगा/चाहूँगी।

पात्रनया रूपक्योंकहानी पर असर
सखासखी — सिद्धार्थ की मित्रसखा का काम है साथ देना, प्रकृति की बातें करना, हंस को मरहम लगाना और सही समय पर सुझाव देना — “हमें महाराज के पास चलना चाहिए।” यह काम कोई भी कर सकता है। मित्रता लड़का-लड़की देखकर नहीं होती।कहानी बिलकुल नहीं बदलेगी। बस संवाद बदलेंगे — “अभी जाता हूँ” की जगह “अभी जाती हूँ”।
मंत्रीमंत्री महोदया — महाराज की मंत्रीमंत्री ने वह उपाय निकाला जिससे न्याय हुआ। समझदारी और सूझबूझ पर किसी एक का हक़ नहीं है। मंच पर एक स्त्री को न्याय करते देखना बच्चों को यह भी सिखाएगा कि निर्णय लेने की जगह पर स्त्रियाँ भी होती हैं।निर्णय वैसा ही रहेगा — हंस को आसन पर बैठाकर दोनों से बुलवाना।

दूसरा भी सोचा जा सकता है: महाराज शुद्धोदन की जगह महारानी और प्रतिहारी की जगह प्रतिहारिणी। पर सिद्धार्थ और देवदत्त को न बदलना ही ठीक है, क्योंकि ये दोनों नाम इतिहास से जुड़े हैं — सिद्धार्थ आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए।

मंचन के समय ध्यान रखिए: पात्र बदलने पर तीन चीज़ें बदलनी पड़ेंगी — (1) संबोधन, जैसे “कुमार” की जगह “कुमारी” या “सखी”; (2) क्रिया के रूप, जैसे “कहता हूँ” की जगह “कहती हूँ”; (3) वेशभूषा। बाकी संवाद और कहानी ज्यों की त्यों रहेगी।
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