कक्षा ५ हिंदी अध्याय 9 मैं भी सिद्धार्थ के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
नीचे कुछ चित्र दिए गए हैं जो सहायता, समझदारी और करुणा से संबंधित हैं। कक्षा में अपने समूह में इन पर संवाद कीजिए एवं किसी एक चित्र पर कुछ पंक्तियाँ भी लिखिए।
पृष्ठ 115 पर दिए गए चार चित्र
पृष्ठ 115 पर दिए गए चार चित्र।
उत्तर

पृष्ठ 115 पर चार चित्र छपे हैं। हर चित्र में कोई-न-कोई किसी की मदद कर रहा है। पहले चारों को पहचान लीजिए —

चित्रचित्र में क्या हो रहा हैकौन-सा गुण दिखता है
ऊपर बाएँपेड़ के नीचे दीवार पर एक चौड़ा बरतन रखा है, जिसमें पानी भरा है। उस पर तीन चिड़ियाँ बैठी पानी पी रही हैं। एक उड़कर आ रही है।करुणा — बेज़ुबान पक्षियों की प्यास का ध्यान रखना।
ऊपर दाएँव्यस्त सड़क पर ज़ेब्रा क्रॉसिंग है। एक लड़का और एक लड़की हाथ थामकर एक बुज़ुर्ग को, जिनके हाथ में छड़ी है, सड़क पार करा रहे हैं। पीछे बस खड़ी है और सिग्नल लाल है।सहायता — बड़ों का सहारा बनना।
नीचे बाएँ‘पेयजल’ लिखी एक सार्वजनिक पानी की टंकी है। एक लड़का और एक लड़की उसकी टोंटी से पानी पी रहे हैं। पीछे घर और हरियाली है।समझदारी — साफ़ पानी का मिल-बाँटकर उपयोग करना, पानी बहाना नहीं।
नीचे दाएँएक लड़की खेत के पास खड़ी है और दो गायों को अपने हाथ से रोटी खिला रही है।करुणा — पशुओं को भोजन देना।

समूह में संवाद के लिए तीन प्रश्न: (1) इस चित्र में कौन किसकी मदद कर रहा है? (2) यदि यह मदद न होती तो क्या होता? (3) ऐसा काम आप कब-कब कर सकते हैं?

नमूना उत्तर — पहले चित्र (पक्षियों का पानी) पर कुछ पंक्तियाँ:

गरमी की दोपहर थी। धूप इतनी तेज़ थी कि पत्ते भी झुक गए थे।
छत की मुँडेर पर किसी ने एक चौड़ा बरतन रखकर उसमें पानी भर दिया था।
पहले एक गौरैया आई। उसने चारों ओर देखा, फिर चोंच डुबोई और सिर ऊपर उठा लिया।
फिर दूसरी आई, फिर तीसरी। एक अभी हवा में ही थी।
वे पानी पीती रहीं और उनके गले की हलचल दूर से दिखाई देती रही।
बरतन रखने वाले ने कुछ बड़ा नहीं किया था — बस एक बरतन और थोड़ा-सा पानी।
पर उस दोपहर में वह थोड़ा-सा पानी चार जानों के बराबर था।
अब मैंने भी अपनी छत पर एक सकोरा रख दिया है।
चारों चित्रों की एक ही बात: मदद करने के लिए बड़ा होना ज़रूरी नहीं है। एक बरतन पानी, एक रोटी, एक हाथ का सहारा — इतना ही काफ़ी है। सिद्धार्थ ने भी कोई बड़ा काम नहीं किया था। उन्होंने बस एक तीर निकाला और मरहम मँगवाया। इसीलिए इस अभ्यास का नाम है — “मैं भी सिद्धार्थ”
पंक्तियाँ लिखते समय: पहले बताइए कि चित्र में क्या दिख रहा है, फिर यह कि वह काम क्यों अच्छा है, और अंत में यह कि आप क्या करेंगे। तीन-चार वाक्य भी काफ़ी हैं, बशर्ते वे आपके अपने हों।
प्र2.
नाटक के प्रथम दृश्य में सिद्धार्थ और उनका सखा राज उद्यान के सौंदर्य का देख-सुनकर आनंद ले रहे हैं। यदि उनका कोई सखा देखने-सुनने में असमर्थ होता तो सिद्धार्थ उसे इस आनंद का अनुभव कैसे करवाते? कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर

पहले याद कीजिए कि पहले दृश्य में आनंद किन चीज़ों से मिल रहा था — शाम की लालिमा, झूमते फूल, लौटती गायों का स्वर, बछड़ों का रँभाना, पक्षियों का गान और आकाश में उड़ते राजहंस।

इनमें से कुछ आँखों से मिलता है और कुछ कानों से। पर उद्यान में और भी बहुत कुछ है, जो छूकर, सूँघकर और महसूस करके जाना जा सकता है। सिद्धार्थ उसी रास्ते से अपने सखा को यह आनंद देते।

यदि सखा देख न पातायदि सखा सुन न पाता
छूकर — उसका हाथ पकड़कर पेड़ के तने पर, घास पर और फूल की पंखुड़ी पर रखते। हंस के मुलायम पंखों पर हाथ फिरवाते।दिखाकर — उँगली से आकाश में उड़ते राजहंसों की कतार दिखाते और डूबते सूरज की लालिमा की ओर उसका मुँह करते।
सुनाकर — कहते — “सुनो, वह बछड़ा अपनी माँ को पुकार रहा है”, और पक्षियों के विदा-गान की ओर उसका ध्यान ले जाते।महसूस कराकर — उसकी हथेली गाय के गले पर रखवाते, ताकि रँभाने की थरथराहट वह हाथ से महसूस कर ले।
सुँघाकर — फूलों के पास ले जाते, गीली मिट्टी और शाम की ठंडी हवा की गंध सुँघाते।संकेतों से — हाथ के इशारों से बताते — पंख फैलाकर उड़ान, हथेली नीचे करके सूरज का ढलना।
शब्दों से चित्र बनाकर — कहते — “आकाश अभी नारंगी है, जैसे किसी ने केसर घोल दिया हो। हंसों की गरदन आगे को निकली है, जैसे वे हवा में तैर रहे हों।”लिखकर — उसकी हथेली पर उँगली से शब्द लिखकर बात कहते।

नमूना उत्तर: सिद्धार्थ अपने सखा का हाथ अपने हाथ में लेते और उसे उद्यान में धीरे-धीरे घुमाते। वे पहले उसका हाथ पेड़ के खुरदरे तने पर रखते, फिर घास पर, फिर फूल की मुलायम पंखुड़ी पर। वे उसे शाम की ठंडी हवा में खड़ा करते, ताकि वह मौसम बदलना महसूस कर सके। जो वे देख रहे होते, उसे शब्दों में इस तरह कहते कि सखा के मन में चित्र बन जाए। और सबसे ज़रूरी — वे उसे अकेला न छोड़ते। नाटक में उन्होंने डरे हुए हंस से भी यही कहा था — “डरो नहीं मित्र! मैं यहीं हूँ।

असली बात यह है: आनंद केवल आँख और कान से नहीं आता। वह मन तक पाँच रास्तों से पहुँचता है — देखना, सुनना, छूना, सूँघना और चखना। यदि एक रास्ता बंद हो, तो बाकी रास्ते और खुल जाते हैं। इसीलिए जो देख या सुन नहीं पाते, वे छूने और सूँघने से बहुत-कुछ पहचान लेते हैं।
चर्चा में यह भी कहिए: ऐसे साथी की मदद करते समय दया नहीं, साथ देना चाहिए। उनसे पूछ लेना चाहिए कि उन्हें किस तरह की मदद चाहिए। बिना पूछे हाथ पकड़ लेना या ज़ोर से बोलना ठीक नहीं। कक्षा में यह भी बताइए कि दृष्टिबाधित साथी उँगलियों से पढ़ने वाली ब्रेल लिपि से पढ़ते हैं और सुनने में असमर्थ साथी सांकेतिक भाषा से बात करते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा?