मल्हार अध्याय 10 आगे की कहानी

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘परीक्षा’ कहानी जहाँ समाप्त होती है, उसके आगे क्या हुआ होगा। आगे की कहानी अपनी कल्पना से बनाइए।
उत्तर

कहानी वहाँ रुकती है जहाँ सरदार सुजानसिंह दरबार में जानकीनाथ के चुनाव का कारण बता रहे हैं। आगे की कहानी बनाते समय पात्रों का स्वभाव वही रखिए जो प्रेमचंद ने गढ़ा है — तभी आपकी कहानी असली लगेगी।

1. आगे बढ़ाने के लिए तीन सूत्र आपके पास पहले से हैं —

  • जानकीनाथ अब भी नहीं जानते कि किसान ही सुजानसिंह थे — यह भेद खुलना बाक़ी है;
  • उम्मीदवारों की आँखों में ईर्ष्या थी — वे चुपचाप नहीं जाएँगे;
  • सुजानसिंह की भविष्यवाणी — “ऐसा आदमी ग़रीबों को कभी न सतावेगा… वह चाहे धोखा खा जाए, परंतु दया और धर्म से कभी न हटेगा।” आगे की कहानी को इसी कसौटी पर उतरना चाहिए।

2. नमूना उत्तर (आगे की कहानी) —

दरबार समाप्त होते ही जानकीनाथ सरदार सुजानसिंह के पास गए और झुककर बोले, “महाराज, कल रात नाले के किनारे जो किसान मिला था, कहीं वह आप ही तो नहीं थे?” सुजानसिंह मुसकराए और वही पंक्ति दोहरा दी — “गहरे पानी में पैठने से ही मोती मिलता है।” जानकीनाथ की आँखें भर आईं; उन्हें लगा कि उन्होंने उस रात कोई एहसान नहीं किया था, बल्कि अपनी परीक्षा दी थी और उन्हें इसका पता तक नहीं चला।

दीवानी सँभालते ही जानकीनाथ ने पहला काम यह किया कि उस नाले पर पक्का पुल बनवाया, ताकि किसी और किसान की गाड़ी रात भर कीचड़ में न फँसे। फिर उन्होंने गाँव-गाँव जाकर देखना शुरू किया कि लगान वसूलने वाले कर्मचारी किसानों से कैसा व्यवहार करते हैं। कुछ पुराने कर्मचारी, जो पहले उम्मीदवार रह चुके थे, नाराज़ हुए और महाराज के कान भरने लगे — “यह दीवान बहुत नरम है, रियासत की आमदनी घट जाएगी।”

एक दिन ऐसा भी आया जब जानकीनाथ धोखा खा गए — एक कर्मचारी ने झूठा हिसाब दिखाकर अनाज बेच खाया। पर जानकीनाथ ने न ग़ुस्से में किसी को दंड दिया, न डरकर काम छोड़ा; उन्होंने शांति से जाँच करवाई, दोषी को हटाया और किसानों का अनाज लौटवा दिया। बरसों बाद, जब देवगढ़ में सूखा पड़ा, उन्होंने राजकोष खोलकर बीज और अनाज बँटवाया। लोग कहने लगे — “यह दीवान वही है जो एक रात कीचड़ में उतरकर किसान की गाड़ी निकाल लाया था।” बूढ़े सुजानसिंह ने यह सुना तो चैन से आँखें मूँद लीं; उनकी परीक्षा का परिणाम आख़िरकार सही निकला था।

Tip: अपनी कहानी लिखते समय एक समस्या ज़रूर रखिए — बिना समस्या के कहानी नहीं बनती। और अंत ऐसा रखिए जो मूल कहानी के संदेश से मेल खाए — यानी दया और आत्मबल की जीत हो, वह भी बिना उपदेश दिए।
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