यह आपकी अपनी सोच का प्रश्न है, इसलिए हर विद्यार्थी का उत्तर अलग होगा। पर अच्छे उत्तर में तीन बातें होनी चाहिए — (1) आप कौन-से गुण देखना चाहेंगे, (2) उन्हें परखने का आपका तरीक़ा क्या होगा, और (3) वह तरीक़ा न्यायपूर्ण क्यों है।
सोचने में मदद करने वाले बिंदु —
- केवल बातचीत से मत चुनिए — इंटरव्यू में हर आदमी अच्छा ही बोलता है, जैसे कहानी में सब “नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम” देते थे।
- काम देकर परखिए — कोई सचमुच का काम सौंपिए और देखिए कि वह कैसे करता है।
- बिना बताए देखिए — असली स्वभाव तब दिखता है जब आदमी को लगे कि कोई देख नहीं रहा।
- कमज़ोर के साथ व्यवहार देखिए — यह सबसे भरोसेमंद कसौटी है।
- एक ही मौक़े पर फ़ैसला मत कीजिए — कई दिन, कई परिस्थितियाँ देखिए।
नमूना उत्तर: “यदि मैं दीवान साहब की जगह होता तो मैं भी लिखित परीक्षा या डिग्री को सबसे ऊपर न रखता, क्योंकि पढ़ाई से यह पता नहीं चलता कि आदमी का दिल कैसा है। मैं चार तरह से परखता —
- पहले सचमुच का काम — हर उम्मीदवार को एक-एक गाँव भेजता और कहता कि वहाँ की एक समस्या का हल निकालकर लाओ। जो सुनकर लौट आए और जो सचमुच कुछ करके आए, दोनों में फ़र्क़ अपने-आप दिख जाता।
- फिर कमज़ोर के साथ व्यवहार — मैं देखता कि वे अपने नौकरों, चपरासियों और ग़रीब किसानों से कैसे बात करते हैं। जो अपने से छोटे से भी आदर से बोले, वही बड़े पद के लायक़ है।
- फिर धैर्य की जाँच — किसी काम में जान-बूझकर देर करवाता और देखता कि कौन झुँझलाकर चिल्लाने लगता है और कौन शांत रहकर रास्ता खोजता है।
- अंत में ईमानदारी — हिसाब में जान-बूझकर कुछ रुपये अधिक रख देता और देखता कि कौन लौटाता है।
इन चारों में जो खरा उतरता, उसे मैं चुनता — क्योंकि दीवान का काम आदेश देना नहीं, लोगों की देखभाल करना है।”