मल्हार अध्याय 10 अच्छाई और दिखावा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) हर व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुसार स्वयं को अच्छा दिखाने की कोशिश करता है। स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए लोग क्या-क्या करते हैं? (संकेत— मेहनत करना, कसरत करना, साफ़-सुथरे रहना आदि)
उत्तर

लोग दो तरह के काम करते हैं — कुछ ऐसे जो सचमुच अच्छे भी बनाते हैं, और कुछ ऐसे जो केवल ऊपर से अच्छा दिखाते हैं। चर्चा में दोनों को अलग-अलग रखिए।

लोग क्या करते हैंयह किस तरह का काम हैकहानी का उदाहरण
मेहनत करना, समय पर काम पूरा करनासचमुच अच्छा बनाने वालाजानकीनाथ का घायल पाँव लेकर भी गाड़ी निकालना
कसरत करना, जल्दी उठना, टहलनाअच्छा बनाने वाला — पर तभी, जब आदत बन जाएमिस्टर ‘अ’ का बगीचे में टहलकर ऊषा-दर्शन करना (केवल एक महीने के लिए)
साफ़-सुथरे रहना, ढंग के कपड़े पहननाअच्छी आदत, पर इससे स्वभाव नहीं बदलता“रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे… अपनी सज-धज दिखाने लगे”
मीठा बोलना, बड़ों-छोटों से आदर से पेश आनाअच्छा — यदि सबके साथ और हमेशा होमिस्टर ‘द’, ‘स’, ‘ज’ का अचानक नौकरों को ‘आप’ और ‘जनाब’ कहना
किताबें लेकर बैठना, अपनी डिग्रियाँ दिखानाप्रायः दिखावामिस्टर ‘ल’ का ग्रंथों में डूबे रहना, जबकि उन्हें “किताब से घृणा थी”
अपनी उपलब्धियाँ बार-बार सुनाना, शेख़ी बघारनाशुद्ध दिखावाहॉकी खेलकर हुनर दिखाना — “संभव है, कुछ हाथों की सफ़ाई ही काम कर जाए”
दूसरों की मदद करना, बिना बताए काम कर देनासबसे सच्ची अच्छाईकोट उतारकर कीचड़ में उतरना — वहाँ देखने वाला कोई नहीं था
चर्चा का निष्कर्ष: ऊपर की सूची में से जो काम आदमी तब भी करता है जब कोई देख न रहा हो, वह अच्छाई है; जो केवल किसी के देखते समय होता है, वह दिखावा है। कहानी का पूरा महीना यही अंतर परखने में बीता।
प्र2.
(ख) क्या ‘स्वयं को अच्छा दिखाने’ में और ‘स्वयं के अच्छा होने’ में कोई अंतर है? कैसे?
उत्तर

हाँ, बहुत बड़ा अंतर है। ‘अच्छा दिखना’ दूसरों की आँखों के लिए किया जाता है; ‘अच्छा होना’ अपने मन के लिए। पहला कपड़े की तरह है — पहना और उतार दिया; दूसरा स्वभाव की तरह है — साथ ही रहता है।

कसौटीस्वयं को अच्छा दिखानास्वयं का अच्छा होना
कब तक चलता हैजब तक कोई देख रहा होहमेशा, अकेले में भी
किसके लिएदूसरों की वाहवाही के लिएअपने संतोष और दूसरों के भले के लिए
कठिनाई आने परतुरंत उतर जाता हैऔर मज़बूत होकर सामने आता है
कहानी का उदाहरणउम्मीदवार — “एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें”जानकीनाथ — “वह घुटने तक ज़मीन में गड़ गया, लेकिन हिम्मत न हारी”
परिणामपरीक्षा में फेल — आँखों में ईर्ष्या रह गईबिना जाने ही परीक्षा पास — दीवानी मिल गई

सबसे साफ़ प्रमाण — उस रात नाले के किनारे अँधेरा था और कोई परीक्षक दिखाई नहीं दे रहा था। जिनकी अच्छाई ओढ़ी हुई थी, उन्होंने “बंद आँखों से” देखा और चल दिए। जिसकी अच्छाई भीतर की थी, उसने कोट उतार दिया। अँधेरा ही असली परीक्षक है।

अपने लिए सोचिए: एक सरल कसौटी याद रखिए — “अगर यह बात किसी को पता न चले, तब भी क्या मैं यह करूँगा?” जिस काम का उत्तर ‘हाँ’ हो, वह अच्छाई है। इसका अर्थ यह नहीं कि साफ़-सुथरा रहना या ढंग से बोलना बुरा है — बुरा तब है जब वह केवल दिखाने के लिए हो।
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