प्र1.
“आपस में हॉकी का खेल हो जाए। यह भी तो आखिर एक विद्या है।” क्या हॉकी जैसा खेल भी विद्या है? इस विषय पर कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। (सुझाव— कक्षा में पहले कुछ समूह बनाएँ, पर्ची निकालकर तय कीजिए कि कौन पक्ष में बोलेगा, कौन विपक्ष में; आधे समूह पक्ष में तर्क दें, आधे विपक्ष में; सभी समूहों को 5-5 मिनट का समय; प्रत्येक सदस्य भाग अवश्य ले।)
उत्तर
यह कक्षा में करने की गतिविधि है। नीचे दोनों ओर के तर्क दिए गए हैं — पर्ची में जो पक्ष मिले, उसी स्तंभ से तर्क उठाइए। वाद-विवाद में अपनी राय नहीं, अपने पक्ष की बात रखनी होती है।
| पक्ष में — “हाँ, खेल भी विद्या है” | विपक्ष में — “नहीं, खेल विद्या नहीं है” |
|---|---|
| हर विद्या सीखी और अभ्यास से माँजी जाती है — कहानी में भी खिलाड़ी “हॉकी के मँजे हुए खिलाड़ी” कहे गए हैं। बिना गुरु और अभ्यास के हॉकी नहीं आती। | विद्या का अर्थ है ज्ञान, जो पढ़ने-सोचने से मिलता है और जीवन भर काम आता है। खेल शरीर का कौशल है, ज्ञान नहीं। |
| खेल से अनुशासन, नियम-पालन, टीम-भावना और हार-जीत को सहना सीखा जाता है — ये जीवन भर काम आते हैं। | शरीर की शक्ति उम्र के साथ घट जाती है; विद्या नहीं घटती। इसलिए दोनों बराबर नहीं। |
| खेल में तुरंत निर्णय लेना पड़ता है — यह बुद्धि का ही काम है। कहानी में गेंद रोकने वाले खिलाड़ी “मानो लोहे की दीवार” बन जाते थे, यह सोच-समझकर बनाई गई रणनीति थी। | कहानी में उम्मीदवारों ने खेल का सहारा इसीलिए लिया था कि “कुछ हाथों की सफ़ाई ही काम कर जाए” — यानी वहाँ खेल विद्या नहीं, दिखावे का साधन था। |
| आज खेल एक पूरा विषय है — शारीरिक शिक्षा पढ़ाई जाती है, खेल-विश्वविद्यालय हैं और खिलाड़ी देश का नाम रोशन करते हैं। | पूरे दिन खेलने से पढ़ाई का समय चला जाता है; कहानी के खिलाड़ी दिन भर खेलकर “हाँफते-हाँफते बेदम” हो गए, पर एक ग़रीब की मदद तक न कर सके। |
| सबसे बड़ा तर्क — जानकीनाथ भी उसी हॉकी के मैदान से लौट रहा था; खेल से मिली शक्ति ही उसके काम आई। | पर उसकी असली परीक्षा हॉकी नहीं थी — दया थी। यानी खेल अपने-आप में योग्यता का प्रमाण नहीं। |
वाद-विवाद कैसे कीजिए —
- पर्ची से पक्ष तय कीजिए; तैयारी में हर सदस्य एक-एक तर्क ले और उसी पर बोले, ताकि सबकी भागीदारी हो।
- हर तर्क के साथ एक प्रमाण दीजिए — कहानी की पंक्ति, कोई खिलाड़ी का उदाहरण, या अपना अनुभव।
- पाँच मिनट में तीन से अधिक तर्क मत रखिए; कम बातें, गहरी बातें।
- दूसरे पक्ष की बात ध्यान से सुनिए और अपनी बारी में उसका उत्तर दीजिए — यही अच्छे वाद-विवाद की पहचान है।
- व्यक्ति पर नहीं, बात पर बोलिए। हँसी उड़ाना या शोर मचाना अंक घटाता है।
निष्कर्ष (अंत में शिक्षक जो कहलवाना चाहेंगे): खेल भी एक विद्या है, पर अकेली विद्या नहीं। शरीर की विद्या, किताब की विद्या और मन की विद्या — तीनों मिलकर पूरा मनुष्य बनाती हैं। कहानी यही सिखाती है: जानकीनाथ के पास बल भी था और दया भी, इसीलिए वह चुना गया।
Tip: वाद-विवाद जीतने का सबसे आसान तरीक़ा है — दूसरे पक्ष का सबसे मज़बूत तर्क पहले ख़ुद बोलिए और फिर उसका उत्तर दीजिए। इससे लगता है कि आपने पूरी बात सोची है।