प्रेमचंद ने यह नाम इसलिए रखा क्योंकि पूरी कहानी एक परीक्षा ही है — पर ऐसी परीक्षा जिसमें न प्रश्न-पत्र है, न कमरा, न घंटी। उम्मीदवारों को पता ही नहीं था कि उनकी परीक्षा कब हो रही है।
नाम को सही ठहराने वाले चार कारण —
- विज्ञापन में ही परीक्षा शब्द है — “जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेंगे, वे इस उच्च पद पर सुशोभित होंगे।” यानी लेखक ने शीर्षक कहानी के भीतर से ही उठाया है।
- परीक्षा पूरे एक महीने चली — “एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जाएगी।” जो जाँच किताब से नहीं, आचरण से होती है, उसे ही असली परीक्षा कहते हैं।
- परीक्षक छिपा हुआ था — “मनुष्यों का वह बूढ़ा जौहरी आड़ में बैठा हुआ देख रहा था कि इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।” और अंतिम परचा तो किसान का वेश धरकर स्वयं सुजानसिंह ने लिया।
- परिणाम भी परीक्षा की तरह घोषित हुआ — दरबार सजा, उम्मीदवारों के “कलेजे धड़क रहे थे”, और फिर एक नाम पुकारा गया — पंडित जानकीनाथ।