मल्हार अध्याय 10 समस्या और समाधान

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) महाराज के सामने क्या समस्या थी? उन्होंने इसका क्या समाधान खोजा?
उत्तर

समस्या — उनके अनुभवी और नीतिकुशल दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हो चुके थे और नौकरी छोड़ना चाहते थे। महाराज ने “बहुत समझाया”, पर वे नहीं माने। ऐसे में डर यह था कि रियासत ऐसे योग्य दीवान से वंचित हो जाएगी और नया दीवान कहाँ से आए।

समाधान — महाराज ने बड़ी चतुराई से दोनों बातें साध लीं —

“हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली; पर शर्त यह लगा दी कि रियासत के लिए नया दीवान आप ही को खोजना पड़ेगा।
  • दीवान साहब की इच्छा का आदर भी हो गया — उन्हें छुट्टी मिल गई;
  • और रियासत को योग्य उत्तराधिकारी भी मिल गया — क्योंकि चुनने का काम उसी के हाथ में गया जो सबसे अच्छी परख रखता था।
यह समाधान बुद्धिमानी क्यों है: महाराज ने अपना ही कोई आदमी नहीं थोपा। उन्होंने सोचा कि जौहरी ही हीरा पहचानता है — चालीस साल राज-काज चलाने वाला व्यक्ति ही जानता है कि इस पद पर किन गुणों की ज़रूरत है। यही कारण है कि आगे चलकर परीक्षा भी इतनी असाधारण हुई।
प्र2.
(ख) दीवान के सामने क्या समस्या थी? उन्होंने इसका क्या समाधान खोजा?
उत्तर

समस्या — दीवान साहब को ऐसा उत्तराधिकारी खोजना था जिसमें दया और आत्मबल दोनों हों। कठिनाई यह थी कि ये गुण न किसी डिग्री से नापे जा सकते हैं, न बातचीत से — क्योंकि हर उम्मीदवार साक्षात्कार के समय अच्छा ही बोलता है।

समाधान — उन्होंने तीन चरणों की एक अनोखी परीक्षा रची —

  1. विज्ञापन में ही शर्तें बदल दीं — “यह ज़रूरी नहीं है कि वे ग्रेजुएट हों, मगर हृष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है… विद्या का कम, परंतु कर्तव्य का अधिक विचार किया जायेगा।” यानी परीक्षा किताब की नहीं, आचरण की होगी।
  2. एक महीने की छिपी हुई निगरानी — “एक महीने तक उम्मीदवारों के रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जाएगी।” वे स्वयं आड़ में बैठकर देखते रहे — “इन बगुलों में हंस कहाँ छिपा हुआ है।”
  3. वेश बदलकर आख़िरी परचा — उन्होंने किसान का रूप धरा और अँधेरे में गाड़ी को नाले में फँसा दिखाया। जो उम्मीदवार वहाँ से बंद आँखों से निकल गए, वे फेल हो गए; जो घायल पाँव लेकर भी कीचड़ में उतरा, वह पास हो गया।
Check it yourself: ध्यान दीजिए, उन्होंने किसी से एक भी प्रश्न नहीं पूछा। उन्होंने उम्मीदवारों को ऐसी परिस्थिति में डाल दिया जहाँ आदमी अपना असली रूप दिखा ही देता है। यही इस परीक्षा की सबसे बड़ी विशेषता है।
प्र3.
(ग) नौकरी के लिए आए लोगों के सामने क्या समस्या थी? उन्होंने इसका क्या समाधान खोजा?
उत्तर

समस्या — सैकड़ों उम्मीदवार थे और पद केवल एक। ऊपर से यह भी साफ़ नहीं था कि परखा क्या जाएगा — न कोई प्रश्न-पत्र, न साक्षात्कार की तारीख़, बस इतना कि “रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जाएगी।” यानी पूरे एक महीने, हर घड़ी, ख़ुद को योग्य सिद्ध करना था

उन्होंने जो समाधान खोजा — उन्होंने अच्छा बनने के बजाय अच्छा दिखने का रास्ता चुना:

  • दिनचर्या बदल ली — मिस्टर ‘अ’ नौ बजे तक सोने के बजाय भोर में टहलने लगे;
  • व्यवहार बदल लिया — जो नौकरों की नाक में दम रखते थे, वे ‘आप’ और ‘जनाब’ कहने लगे;
  • आदतें ओढ़ लीं — किताब से घृणा करने वाले मिस्टर ‘ल’ मोटे-मोटे ग्रंथों में डूबे रहने लगे;
  • सज-धज और सनद का सहारा लिया, और हॉकी खेलकर हुनर दिखाना चाहा।
यह समाधान ग़लत क्यों था: उन्होंने समस्या को एक महीने का नाटक समझ लिया — “एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें।” पर परीक्षा का असली प्रश्न वहाँ आया जहाँ कोई देख नहीं रहा था — अँधेरे नाले के पास। ओढ़ा हुआ सदाचार वहीं उतर गया, क्योंकि दिखावा उतना ही टिकता है जितनी देर कोई देख रहा हो। सच्चा गुण तभी काम आता है जब कोई न देख रहा हो — जानकीनाथ के साथ यही हुआ।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ