समस्या — सैकड़ों उम्मीदवार थे और पद केवल एक। ऊपर से यह भी साफ़ नहीं था कि परखा क्या जाएगा — न कोई प्रश्न-पत्र, न साक्षात्कार की तारीख़, बस इतना कि “रहन-सहन, आचार-विचार की देखभाल की जाएगी।” यानी पूरे एक महीने, हर घड़ी, ख़ुद को योग्य सिद्ध करना था।
उन्होंने जो समाधान खोजा — उन्होंने अच्छा बनने के बजाय अच्छा दिखने का रास्ता चुना:
- दिनचर्या बदल ली — मिस्टर ‘अ’ नौ बजे तक सोने के बजाय भोर में टहलने लगे;
- व्यवहार बदल लिया — जो नौकरों की नाक में दम रखते थे, वे ‘आप’ और ‘जनाब’ कहने लगे;
- आदतें ओढ़ लीं — किताब से घृणा करने वाले मिस्टर ‘ल’ मोटे-मोटे ग्रंथों में डूबे रहने लगे;
- सज-धज और सनद का सहारा लिया, और हॉकी खेलकर हुनर दिखाना चाहा।
यह समाधान ग़लत क्यों था: उन्होंने समस्या को एक महीने का नाटक समझ लिया — “एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें।” पर परीक्षा का असली प्रश्न वहाँ आया जहाँ कोई देख नहीं रहा था — अँधेरे नाले के पास। ओढ़ा हुआ सदाचार वहीं उतर गया, क्योंकि दिखावा उतना ही टिकता है जितनी देर कोई देख रहा हो। सच्चा गुण तभी काम आता है जब कोई न देख रहा हो — जानकीनाथ के साथ यही हुआ।