मल्हार अध्याय 10 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) नौकरी की चाह में आए लोगों ने नौकरी पाने के लिए कौन-कौन से प्रयत्न किए?
उत्तर

उम्मीदवारों ने असल में सुधरने के बजाय एक महीने तक अच्छा दिखने के प्रयत्न किए। कहानी उनकी पोल एक-एक करके खोलती है —

किसनेपहले क्या थापरीक्षा के महीने में क्या करने लगा
मिस्टर ‘अ’नौ बजे दिन तक सोया करते थेसुबह-सुबह बगीचे में टहलकर ऊषा (भोर) का दर्शन करने लगे
मिस्टर ‘द’, ‘स’ और ‘ज’घरों पर नौकरों की नाक में दम रहता थानौकरों से भी ‘आप’ और ‘जनाब’ कहकर बात करने लगे
मिस्टर ‘ल’किताब से घृणा थीबड़े-बड़े ग्रंथ देखने-पढ़ने में डूबे रहने लगे
सभी उम्मीदवारसाधारण बोल-चाल“जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम देता था।”

इनके अलावा —

  • वेश-भूषा से प्रभाव डालने की कोशिश — “रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज-धज दिखाने लगे।”
  • डिग्री का सहारा — विज्ञापन में ग्रेजुएट होने की शर्त नहीं थी, फिर भी सबसे अधिक संख्या ग्रेजुएटों की थी, “क्योंकि सनद की कैद न होने पर भी सनद से परदा तो ढका रहता है।”
  • खेल के बहाने हुनर दिखाना — नए फैशनवालों ने हॉकी का खेल रखवाया — “यह भी तो आखिर एक विद्या है। इसे क्यों छिपा रखें। संभव है, कुछ हाथों की सफ़ाई ही काम कर जाए।”
पर ये सब प्रयत्न विफल क्यों हुए: क्योंकि ये सब बाहरी थे और थोड़े दिन के लिए ओढ़े हुए थे। उनकी अपनी सोच यही थी — “एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें, कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है?” जिस दिन असली परीक्षा आई — कीचड़ में फँसी गाड़ी — उस दिन कोई ग्रंथ, चोगा या हॉकी काम न आई।
प्र2.
(ख) “उसे किसान की सूरत देखते ही सब बातें ज्ञात हो गईं।” खिलाड़ी को कौन-कौन सी बातें पता चल गईं?
उत्तर

युवक ने किसान का चेहरा देखते ही बिना एक शब्द पूछे यह सब समझ लिया —

  • किसान की अनाज से भरी गाड़ी नाले की चढ़ाई पर फँसी है और वह अपने-आप ऊपर नहीं चढ़ पा रही;
  • नाले में कीचड़ है, चढ़ाई ऊँची है, बोझ अधिक और बैल कमज़ोर हैं — इसलिए गाड़ी बार-बार खिसककर नीचे आ जाती है;
  • किसान बहुत देर से अकेला जूझ रहा है और थक चुका है — इसीलिए युवक कहता है, “मालूम होता है, तुम यहाँ बड़ी देर से फँसे हो”;
  • वहाँ कोई सहायक नहीं है और गाड़ी छोड़कर वह मदद खोजने भी नहीं जा सकता;
  • किसान घबराया और निराश है, फिर भी संकोच के कारण मदद माँग नहीं पा रहा — “किसान ने उनकी तरफ़ सहमी हुई आँखों से देखा; परंतु किसी से मदद माँगने का साहस न हुआ।”
यह पंक्ति क्यों महत्त्वपूर्ण है: बाक़ी खिलाड़ियों ने भी किसान को देखा था — “खिलाड़ियों ने भी उसको देखा मगर बंद आँखों से, जिनमें सहानुभूति न थी।” यानी देखना सबने देखा, पर समझा केवल उसी ने जिसके हृदय में दया थी। ‘सब बातें ज्ञात हो गईं’ आँखों की नहीं, संवेदनशील मन की देन है।
Did you know? ‘बंद आँखों से देखना’ प्रेमचंद का बड़ा तीखा वाक्य है — आँखें खुली थीं, पर मन बंद था। यही इस कहानी का असली अंतर है।
प्र3.
(ग) “मगर उन आँखों में सत्कार था, इन आँखों में ईर्ष्या।” किनकी आँखों में सत्कार था और किनकी आँखों में ईर्ष्या थी? क्यों?
उत्तर

सत्कार था — रियासत के कर्मचारियों और रईसों की आँखों में। ईर्ष्या थी — दीवानी के उम्मीदवारों की आँखों में।

कौनआँखों में क्याक्यों
रियासत के कर्मचारी और रईससत्कार (आदर)उनका इस पद से कोई स्वार्थ नहीं था। उन्हें इतना ही देखना था कि रियासत को योग्य दीवान मिला या नहीं — और जानकीनाथ का चुनाव सुनकर वे संतुष्ट थे। जिसे अपना कुछ नहीं खोना पड़ता, वह दूसरे की सफलता पर सहज ही आदर करता है।
दीवानी के उम्मीदवारईर्ष्या (जलन)वे पूरा महीना इसी पद के लिए मेहनत, दिखावा और प्रतीक्षा करते रहे — “उम्मीदवारों के कलेजे धड़क रहे थे।” जिस पद को हर एक अपना मान रहा था, वह किसी और को मिल गया, इसलिए आदर की जगह जलन आ गई।
वाक्य की बनावट देखिए: प्रेमचंद ने ‘उन’ और ‘इन’ का प्रयोग करके दोनों समूहों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है — एक ही ख़बर, पर दो बिलकुल उलटी प्रतिक्रियाएँ। इससे पता चलता है कि किसी की सफलता पर हमारी आँखें क्या कहती हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें हमारा अपना स्वार्थ जुड़ा था या नहीं।
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