प्र1.
(क) नौकरी की चाह में आए लोगों ने नौकरी पाने के लिए कौन-कौन से प्रयत्न किए?
उत्तर
उम्मीदवारों ने असल में सुधरने के बजाय एक महीने तक अच्छा दिखने के प्रयत्न किए। कहानी उनकी पोल एक-एक करके खोलती है —
| किसने | पहले क्या था | परीक्षा के महीने में क्या करने लगा |
|---|---|---|
| मिस्टर ‘अ’ | नौ बजे दिन तक सोया करते थे | सुबह-सुबह बगीचे में टहलकर ऊषा (भोर) का दर्शन करने लगे |
| मिस्टर ‘द’, ‘स’ और ‘ज’ | घरों पर नौकरों की नाक में दम रहता था | नौकरों से भी ‘आप’ और ‘जनाब’ कहकर बात करने लगे |
| मिस्टर ‘ल’ | किताब से घृणा थी | बड़े-बड़े ग्रंथ देखने-पढ़ने में डूबे रहने लगे |
| सभी उम्मीदवार | साधारण बोल-चाल | “जिससे बात कीजिए, वह नम्रता और सदाचार का देवता बना मालूम देता था।” |
इनके अलावा —
- वेश-भूषा से प्रभाव डालने की कोशिश — “रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज-धज दिखाने लगे।”
- डिग्री का सहारा — विज्ञापन में ग्रेजुएट होने की शर्त नहीं थी, फिर भी सबसे अधिक संख्या ग्रेजुएटों की थी, “क्योंकि सनद की कैद न होने पर भी सनद से परदा तो ढका रहता है।”
- खेल के बहाने हुनर दिखाना — नए फैशनवालों ने हॉकी का खेल रखवाया — “यह भी तो आखिर एक विद्या है। इसे क्यों छिपा रखें। संभव है, कुछ हाथों की सफ़ाई ही काम कर जाए।”
पर ये सब प्रयत्न विफल क्यों हुए: क्योंकि ये सब बाहरी थे और थोड़े दिन के लिए ओढ़े हुए थे। उनकी अपनी सोच यही थी — “एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें, कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है?” जिस दिन असली परीक्षा आई — कीचड़ में फँसी गाड़ी — उस दिन कोई ग्रंथ, चोगा या हॉकी काम न आई।