जिस प्रयोग की बात हो रही है, उसे अतिशयोक्ति कहते हैं — यानी किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहना, ताकि पढ़ने वाले के मन पर उसका असर गहरा हो जाए। सचमुच लगाम हवा से नहीं हिलती और घोड़ा उड़ता भी नहीं; पर ऐसा कहने से चेतक की फुर्ती जितनी साफ़ दिखती है, उतनी ‘चेतक बहुत तेज़ दौड़ता था’ कहने से कभी नहीं दिखती।
कविता में आए ऐसे प्रयोग —
| पंक्ति | बढ़ा-चढ़ाकर क्या कहा गया | असर |
|---|---|---|
| “पड़ गया हवा को पाला था।” | घोड़े का मुक़ाबला सीधे हवा से हो गया | चेतक हवा जितना तेज़ है — यह बात एक ही शब्द ‘पाला’ में आ जाती है। |
| “गिरता न कभी चेतक-तन पर / राणा प्रताप का कोड़ा था।” | चाबुक कभी उसकी पीठ तक पहुँचा ही नहीं | वह मारने से नहीं, अपनी मर्ज़ी से दौड़ता था — स्वामिभक्ति का संकेत। |
| “या आसमान पर घोड़ा था।” | घोड़ा ज़मीन पर नहीं, आसमान पर दौड़ रहा है | गति इतनी कि पैर ज़मीन छूते ही नहीं दिखते। |
| “राणा की पुतली फिरी नहीं / तब तक चेतक मुड़ जाता था।” | आँख घूमने से भी पहले घोड़ा मुड़ जाता है | स्वामी और घोड़े के बीच बिना बोले तालमेल। |
| “है यहीं रहा, अब यहाँ नहीं / वह वहीं रहा है वहाँ नहीं।” | वह एक ही समय में हर जगह है और कहीं नहीं | शत्रु उसे पकड़ ही नहीं पाता — गति का चरम चित्र। |
| “थी जगह न कोई जहाँ नहीं।” | पूरे रणक्षेत्र में एक भी जगह ऐसी नहीं बची जहाँ वह न गया हो | अकेला घोड़ा पूरे मैदान पर छा गया। |
| “उड़ गया भयानक भालों में।” | भालों के बीच से उड़ जाना | निडरता और गति, दोनों एक साथ। |
इनके अलावा कविता में उपमाएँ भी हैं — ‘सा’ लगाकर तुलना करना उपमा कहलाता है:
- “बढ़ते नद-सा वह लहर गया” — बढ़ती नदी से तुलना;
- “विकराल बज्र-मय बादल-सा अरि की सेना पर घहर गया” — गरजते बादल से तुलना।
और ध्वनि का एक प्रयोग अनुप्रास भी है — “रण-बीच चौकड़ी भर-भरकर” में ‘र’ की आवृत्ति टापों की आवाज़ जैसी लगती है।