मल्हार अध्याय 12 अनुमान या कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “मॉरिशस वह देश है, जहाँ बनारस भी है, गोकुल भी है और ब्रह्मस्थान भी।” मॉरिशस में लोगों ने गली-मोहल्लों के नाम इस तरह के क्यों रखे होंगे?
उत्तर

क्योंकि नाम ही वह सबसे हल्की चीज़ थी जिसे वे अपने साथ ले जा सकते थे। भारत से गए मज़दूर अपने खेत, घर और गाँव पीछे छोड़ आए थे; वे केवल अपनी यादें और अपनी भाषा साथ ले गए। नई जगह पर उन्होंने अपने पुराने तीर्थों और गाँवों के नाम दोहरा दिए, ताकि परदेस भी अपना-सा लगे।

  • घर की याद जीवित रखने के लिए — जिस गली का नाम ‘काशी’ हो, वहाँ से गुज़रते ही अपना देश याद आ जाता है। पाठ बताता है कि पोर्टलुई की गलियों के नाम भी कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद और बम्बई हैं — ये वही बंदरगाह-शहर हैं जहाँ से जहाज़ चले थे।
  • पहचान बचाए रखने के लिए — मालिक चाहते थे कि वे अपना धर्म बदल लें। नाम रखना बिना झगड़े का, चुपचाप किया जाने वाला विरोध था — “वे अपने धर्म पर डटे रहे।”
  • अगली पीढ़ी को जड़ें बताने के लिए — जो बच्चे मॉरिशस में ही जन्मे, उन्होंने भारत कभी नहीं देखा। पर ‘बनारस’, ‘गोकुल’ और ‘ब्रह्मस्थान’ नाम सुनते-सुनते वे जान गए कि उनके पुरखे कहाँ से आए थे।
  • पूजा-स्थल को नाम देने के लिए — बनारस शिव का, गोकुल कृष्ण का और ब्रह्मस्थान गाँव के देवस्थान का नाम है। जिस मोहल्ले में शिवालय बना, वह ‘बनारस’ हो गया — नाम अपने-आप उस स्थान का काम भी बता देता है।
यह कोई अनोखी बात नहीं है: दुनिया-भर में लोग नई जगह जाकर पुरानी जगह के नाम दोहराते हैं। भारत में भी नए बसे मोहल्लों के नाम नई दिल्ली, नया गाँव, न्यू कॉलोनी रखे जाते हैं। नाम रखना सबसे सस्ता और सबसे मज़बूत तरीका है अपनापन बनाने का।
प्र2.
(ख) “कोई सात-आठ सिंह लेटे या सोए हुए थे और उन्हें घेरकर आठ-दस मोटरें खड़ी थीं।” आपने पढ़ा कि केन्या का राष्ट्रीय पार्क पर्यटकों से भरा रहता है। पर्यटक जंगली जानवरों को घेरे रहते हैं। क्या इसका उन पशुओं पर कोई प्रभाव पड़ता होगा? अपने उत्तर के कारण भी बताइए। (संकेत— राष्ट्रीय पार्क के बंदरों, सिंहों का व्यवहार भी बदल गया है।)
उत्तर

हाँ, ज़रूर पड़ता होगा — और पाठ में उसके दो सबूत साफ़ मौजूद हैं।

पशुपाठ में जो बदलाव दिखास्वाभाविक व्यवहार क्या होना चाहिए था
बंदर और लंगूर“दो मोटरें खड़ी थीं और उन पर तरह-तरह के बंदर और लंगूर चढ़े हुए थे… मोटर के रुकते ही बंदर उसे घेर लेते हैं।जंगली बंदर को पेड़ों से फल-पत्ते ढूँढ़ने चाहिए, न कि मोटर देखते ही दौड़कर भीख माँगनी चाहिए।
सिंह“सिंहों को यह जानने की कोई इच्छा ही नहीं थी कि हमें देखने को आने वाले लोग कौन हैं?… किसी भी सिंह ने नज़र नहीं उठाई।”जंगली सिंह को अनजान गंध और आवाज़ पर चौकन्ना हो जाना चाहिए। मोटरों के इतने आदी हो जाना स्वाभाविक नहीं है।

प्रभाव किस-किस तरह के हो सकते हैं—

  • भोजन खोजना छूट जाना — पर्यटक “कभी-कभी फल या बिस्कुट खाने को दे देते हैं”, इसलिए बंदर मेहनत करना भूल जाते हैं। बिस्कुट जैसा बना-बनाया खाना उनके स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं होता।
  • डर मिट जाना — जो जानवर आदमी से डरना छोड़ देता है, वह पार्क से बाहर निकलकर गाँव-सड़क तक चला आता है। तब उसे और आदमी दोनों को खतरा होता है।
  • शिकार और आराम में बाधा — मोटरों के शोर, धूल और धुएँ से पशु ठीक से आराम नहीं कर पाते और शिकार का मौका चूक सकते हैं।
  • बच्चों के पालन में गड़बड़ी — भीड़ के बीच माँ-जानवर अपने शावकों को खुलकर दूध नहीं पिला पाते या उन्हें बार-बार जगह बदलनी पड़ती है।
दूसरा पक्ष भी देखिए: पर्यटन से जो पैसा आता है, उसी से पार्क की रखवाली होती है और शिकारियों से जानवर बचते हैं। इसलिए सही उत्तर ‘पर्यटन बंद कर दो’ नहीं, बल्कि नियम से पर्यटन है — गाड़ी दूर रोकना, हॉर्न न बजाना, जानवर को खाना न देना, बाहर न निकलना और एक समय में गिनी-चुनी गाड़ियाँ ही अंदर जाने देना।
भारत से उदाहरण: जिम कॉर्बेट और रणथंभौर जैसे हमारे राष्ट्रीय उद्यानों में भी सफ़ारी की गाड़ियों की संख्या और समय तय है, और जानवर को खाना देना दंडनीय है — कारण ठीक वही है जो ऊपर बताया गया।
प्र3.
(ग) “हिरनों का एक झुंड दिखाई पड़ा, जिनके बीच एक जिराफ बिल्कुल बेवकूफ की तरह खड़ा था।” सिंहों के आस-पास होने के बाद भी जिराफ क्यों खड़ा रहा होगा?
उत्तर

सबसे मज़बूत कारण यह है कि जिराफ को अपने आकार और अपनी ऊँचाई पर भरोसा था — वह सिंह के लिए आसान शिकार नहीं होता। इसीलिए वह हिरनों की तरह चौकन्ना होकर भागा नहीं, बल्कि जहाँ था वहीं खड़ा रहा।

  • बड़ा और ताकतवर होना — पूरा बड़ा जिराफ बहुत ऊँचा और भारी होता है और उसकी लात इतनी ज़ोरदार होती है कि सिंह भी घायल हो सकता है। सिंह प्रायः जिराफ के बजाय हिरन जैसे छोटे और तेज़ पर कमज़ोर जानवर चुनते हैं।
  • ऊँचाई से दूर तक देख पाना — जिराफ की गरदन इतनी ऊँची है कि उसे सिंह बहुत दूर से दिख जाते हैं। उसे यह भी दिख गया होगा कि सिंह अभी हिरनों की ओर बढ़ रहे हैं, उसकी ओर नहीं — इसलिए घबराने की ज़रूरत ही नहीं समझी।
  • पाठ का अपना संकेत — “शिकार सिंह सूर्यास्त के बाद किया करते हैं।” यह दिन का समय था और सिंह अभी-अभी आराम से उठे थे। जिराफ यह ताड़ चुका होगा कि यह पूरा शिकार नहीं, बस टोह लेना है।
  • भागना उलटा नुकसान — जिराफ की चाल भारी होती है; दौड़कर भागने पर वह और अधिक ध्यान खींचता। खड़े रहकर स्थिर रहना उसके लिए ज़्यादा सुरक्षित था।
‘बेवकूफ की तरह’ क्यों लिखा: यह लेखक की अपनी नज़र है, जिराफ की सच्चाई नहीं। हिरन डरकर चौकन्ने हो रहे थे और उनके बीच एक लंबा-सा जिराफ बिना हिले खड़ा था — यह दृश्य देखने में हास्यास्पद लगा, इसलिए दिनकर ने चुटकी लेते हुए ऐसा लिख दिया। असल में जिराफ का शांत खड़े रहना उसकी समझदारी थी, बेवकूफ़ी नहीं।
ध्यान दें: यह प्रश्न ‘अनुमान या कल्पना से’ शीर्षक के नीचे है, इसलिए इसका एक ही निश्चित उत्तर नहीं। आप कोई और तर्कसंगत कारण भी दे सकते हैं — शर्त यही है कि वह पाठ या पशु-व्यवहार की जानकारी से जुड़ा हो।
प्र4.
(घ) “मॉरिशस के मध्य में एक झील है, जिसका संबंध हिंदुओं ने परियों से बिठा दिया है और उस झील का नाम अब परी-तालाब हो गया है।” उस झील का नाम ‘परी-तालाब’ क्यों पड़ा होगा?
उत्तर

सबसे सीधा कारण — झील इतनी सुंदर और शांत रही होगी कि लोगों को लगा यहाँ परियाँ उतरती होंगी। पाठ भी यही कहता है कि यह जगह “केवल तीर्थ ही नहीं, दृश्य से भी पिकनिक का स्थान है।”

  • सुंदरता का असर — पहाड़ों के बीच बना शांत, साफ़ पानी का सरोवर लोकभाषा में सदा ‘परियों का ठिकाना’ कहा जाता है। जो चीज़ इस दुनिया की-सी न लगे, उसे लोग अलौकिक नाम दे देते हैं।
  • लोककथा का जुड़ जाना — लेखक ने ध्यान से लिखा है कि झील का संबंध परियों से “हिंदुओं ने बिठा दिया है”। यानी यह कोई इतिहास नहीं, लोगों की गढ़ी हुई कथा है — और जब कथा चल पड़े तो नाम भी उसी के साथ चल पड़ता है।
  • पवित्रता की भावना — “वहाँ पिकनिक पर जाने वाले लोग अपने साथ माँस-मछली नहीं ले जाते, न अपवित्रता का वहाँ कोई व्यापार करते हैं।” जिस जगह के साथ इतना संयम जुड़ा हो, उसका नाम भी पवित्र और सुंदर ही रखा जाएगा।
  • पहचान का सहारा — भारत से गए लोगों के मन में तालाब, घाट और तीर्थ की तस्वीर बसी थी। नई भूमि की झील को नाम देकर उन्होंने उसे अपना तीर्थ बना लिया।
जोड़कर देखिए: भारत में भी ऐसे नाम मिलते हैं — पर्वत पर ‘परी झील’, ‘नागिन झील’, ‘भीमकुंड’। हर ऐसे नाम के पीछे एक लोककथा होती है, ठीक वैसे ही जैसे परी-तालाब के पीछे है।
प्र5.
(ङ) आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि लगभग 50 साल पहले ‘परी-तालाब’ का नाम बदलकर ‘गंगा-तालाब’ कर दिया गया है। मॉरिशस के लोगों ने यह नाम क्यों रखा होगा?
उत्तर

क्योंकि वहाँ के लोग उस तालाब को अपनी ‘गंगा’ मान चुके थे। भारत से हज़ारों मील दूर बैठे लोग गंगा-स्नान करने भारत नहीं आ सकते थे, इसलिए उन्होंने अपने द्वीप की इसी झील को गंगा का दर्जा दे दिया — और फिर नाम भी वही रख दिया।

  • काम पहले, नाम बाद में — पाठ बताता है कि शिवरात्रि पर लोग “परी-तालाब का जल भरकर अपने-अपने गाँव के शिवालय को लौट जाते हैं तथा शिवजी को जल चढ़ाकर अपने घरों में प्रवेश करते हैं।” भारत में यही काम गंगाजल से होता है। जब इस तालाब का जल गंगाजल की जगह ले चुका था, तो नाम भी ‘गंगा-तालाब’ हो जाना स्वाभाविक था।
  • काँवर की परंपरा — “कंधों पर काँवर लिए जुलूस बाँधकर” जाना बिलकुल भारत की काँवड़-यात्रा जैसा है, जिसमें गंगाजल लाया जाता है। नाम बदलने से यह जुड़ाव और स्पष्ट हो गया।
  • ‘परी’ से ‘गंगा’ — भाव में अंतर — ‘परी’ शब्द कल्पना और सुंदरता का है; ‘गंगा’ शब्द श्रद्धा, पवित्रता और भारत से नाते का है। नाम बदलकर उन्होंने झील को कहानी से उठाकर तीर्थ बना दिया।
  • अपनी जड़ों की घोषणा — यह नाम पूरी दुनिया को बता देता है कि मॉरिशस के लोग किस संस्कृति से आए हैं। यह उसी बात का प्रमाण है जो लेखक ने लिखी — “उस द्वीप को उन्होंने छोटा-सा हिंदुस्तान बना डाला।”
नाम इतने ज़रूरी क्यों: नाम केवल पहचान नहीं, भावना भी होता है। जिस दिन तालाब ‘गंगा-तालाब’ कहलाया, उस दिन से वहाँ जाने वाले हर व्यक्ति के मन में गंगा जैसी श्रद्धा जगने लगी। इसी को हम कहते हैं — संस्कृति नाम के सहारे यात्रा करती है।
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