क्योंकि नाम ही वह सबसे हल्की चीज़ थी जिसे वे अपने साथ ले जा सकते थे। भारत से गए मज़दूर अपने खेत, घर और गाँव पीछे छोड़ आए थे; वे केवल अपनी यादें और अपनी भाषा साथ ले गए। नई जगह पर उन्होंने अपने पुराने तीर्थों और गाँवों के नाम दोहरा दिए, ताकि परदेस भी अपना-सा लगे।
- घर की याद जीवित रखने के लिए — जिस गली का नाम ‘काशी’ हो, वहाँ से गुज़रते ही अपना देश याद आ जाता है। पाठ बताता है कि पोर्टलुई की गलियों के नाम भी कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद और बम्बई हैं — ये वही बंदरगाह-शहर हैं जहाँ से जहाज़ चले थे।
- पहचान बचाए रखने के लिए — मालिक चाहते थे कि वे अपना धर्म बदल लें। नाम रखना बिना झगड़े का, चुपचाप किया जाने वाला विरोध था — “वे अपने धर्म पर डटे रहे।”
- अगली पीढ़ी को जड़ें बताने के लिए — जो बच्चे मॉरिशस में ही जन्मे, उन्होंने भारत कभी नहीं देखा। पर ‘बनारस’, ‘गोकुल’ और ‘ब्रह्मस्थान’ नाम सुनते-सुनते वे जान गए कि उनके पुरखे कहाँ से आए थे।
- पूजा-स्थल को नाम देने के लिए — बनारस शिव का, गोकुल कृष्ण का और ब्रह्मस्थान गाँव के देवस्थान का नाम है। जिस मोहल्ले में शिवालय बना, वह ‘बनारस’ हो गया — नाम अपने-आप उस स्थान का काम भी बता देता है।