मल्हार अध्याय 12 पत्र

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यहाँ ‘दिनकर’ का लिखा एक पत्र दिया जा रहा है। इसे पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर लिखिए। पत्र पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने समूह में मिलकर खोजिए— (क) पत्र किसने लिखा है?
उत्तर

यह पत्र रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है।

इसका प्रमाण पत्र के अंत में है — वहाँ लिखा है “आपका दिनकर”। पत्र के ऊपर पुस्तक ने भी बता दिया है — “यहाँ ‘दिनकर’ का लिखा एक पत्र दिया जा रहा है।”

ध्यान दें: पत्र में लेखक का नाम सबसे अंत में, बाईं या दाईं ओर आता है — इसे ‘हस्ताक्षर’ या ‘प्रेषक का नाम’ कहते हैं। पत्र किसका है, यह जानने के लिए सबसे पहले अंत देखिए।
प्र2.
(ख) पत्र किसे लिखा गया है?
उत्तर

यह पत्र चतुर्वेदी जी को लिखा गया है।

पत्र का आरंभ ही इस संबोधन से होता है — “मान्यवर चतुर्वेदी जी,”। जिसे पत्र लिखा जाता है, उसका नाम पत्र के आरंभ में संबोधन के रूप में आता है।

पत्र के दो सिरे: ऊपर का संबोधन बताता है कि पत्र किसे लिखा गया, और नीचे का नाम बताता है कि पत्र किसने लिखा। दोनों को देखते ही पूरा पता चल जाता है कि बातचीत किन दो लोगों के बीच है।
प्र3.
(ग) पत्र किस तिथि को लिखा गया है?
उत्तर

पत्र 8-7-67 को लिखा गया है, अर्थात 8 जुलाई 1967 को।

यह तिथि पत्र के ऊपरी भाग में, स्थान के ठीक नीचे लिखी है। तिथि लिखने का यह तरीका दिन-महीना-वर्ष का है — 8 (दिन), 7 (जुलाई), 67 (सन 1967)।

यह तिथि क्यों महत्त्वपूर्ण है: पत्र में दिनकर लिखते हैं — “15 जुलाई को प्रस्थान करना है।” और पाठ के पहले ही वाक्य में लिखा है — “यात्रा पर मैं दिल्ली से 15 जुलाई को… रवाना हुआ।” यानी यह पत्र मॉरिशस-यात्रा से ठीक एक सप्ताह पहले लिखा गया था। पत्र और पाठ, दोनों एक ही यात्रा की बात कर रहे हैं।
प्र4.
(घ) पत्र किस स्थान से लिखा गया है?
उत्तर

पत्र नई दिल्ली से लिखा गया है।

यह पत्र में दो जगह मिलता है —

  • सबसे ऊपर, तिथि से पहले — “नई दिल्ली”
  • सबसे नीचे, नाम के बाद पूरा पता — “सफ़दरजंग लेन, नई दिल्ली”
पत्र का नियम: प्रेषक (भेजने वाला) अपना स्थान और तिथि पत्र के ऊपर दाईं या बाईं ओर लिखता है, ताकि पाने वाले को तुरंत पता चल जाए कि पत्र कहाँ से और कब आया है।
प्र5.
(ङ) पत्र पाने वाले के नाम से पहले किस शब्द का प्रयोग किया गया है?
उत्तर

पत्र पाने वाले के नाम से पहले ‘मान्यवर’ शब्द का प्रयोग किया गया है — “मान्यवर चतुर्वेदी जी,”

‘मान्यवर’ का अर्थ है — मान के योग्य, आदरणीय, सम्मानित। यह शब्द बताता है कि दिनकर चतुर्वेदी जी को अपने से बड़ा और आदरणीय मानते थे। नाम के बाद ‘जी’ लगाकर उन्होंने आदर और बढ़ा दिया।

किसे पत्रप्रायः प्रयोग होने वाले संबोधन
आदरणीय बड़े / अपरिचितमान्यवर, आदरणीय, महोदय, श्रीमान
माता-पिता, गुरुजनपूज्य, पूजनीय, आदरणीय
मित्र या बराबर वालेप्रिय मित्र, प्रिय …
छोटों कोप्रिय, चिरंजीव, आयुष्मान
अपना एक वाक्य: प्रधानाचार्य को अवकाश के लिए पत्र लिखते समय हम भी आरंभ में लिखते हैं — “मान्यवर / महोदय,”।
प्र6.
(च) पत्र-लेखक ने अपने नाम से पहले अपने लिए क्या शब्द लिखा है?
उत्तर

पत्र-लेखक ने अपने नाम से पहले ‘आपका’ शब्द लिखा है — “आपका दिनकर”

इसका भाव क्या है — ‘आपका’ लिखकर लेखक कहता है कि ‘मैं आपका अपना हूँ’। यह अपनापन, विनम्रता और स्नेह दिखाने वाला शब्द है। ध्यान दीजिए कि दिनकर ने अपने नाम के आगे ‘राष्ट्रकवि’ या कोई उपाधि नहीं लगाई — इतने बड़े लेखक होकर भी उन्होंने सिर्फ़ ‘आपका दिनकर’ लिखा। यही सच्ची विनम्रता है।

पत्र के अंत में लिखे जाने वाले शब्दकब
आपका / आपकीपरिचित, मित्र या स्नेह वाले संबंध में
आपका आज्ञाकारी / आज्ञाकारिणीमाता-पिता या गुरुजन को लिखते समय
भवदीय / भवदीयाऔपचारिक पत्र में — प्रधानाचार्य, अधिकारी, संपादक को
तुम्हारा / तुम्हारीअपने से छोटों या घनिष्ठ मित्रों को
पूरा पत्र एक नज़र में: स्थान (नई दिल्ली) → तिथि (8-7-67) → संबोधन (मान्यवर चतुर्वेदी जी) → विषय-वस्तु (स्वास्थ्य की बात और मॉरिशस जाने की सूचना) → समापन (आपके आशीर्वाद की कामना करता हूँ) → हस्ताक्षर (आपका दिनकर) → पता (सफ़दरजंग लेन, नई दिल्ली)। यही किसी भी पत्र के छह अंग हैं — इसी क्रम से आप भी अपना पत्र लिख सकते हैं।
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