यह पत्र रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है।
इसका प्रमाण पत्र के अंत में है — वहाँ लिखा है “आपका दिनकर”। पत्र के ऊपर पुस्तक ने भी बता दिया है — “यहाँ ‘दिनकर’ का लिखा एक पत्र दिया जा रहा है।”
अद्यतन2026-09-05
यह पत्र रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है।
इसका प्रमाण पत्र के अंत में है — वहाँ लिखा है “आपका दिनकर”। पत्र के ऊपर पुस्तक ने भी बता दिया है — “यहाँ ‘दिनकर’ का लिखा एक पत्र दिया जा रहा है।”
यह पत्र चतुर्वेदी जी को लिखा गया है।
पत्र का आरंभ ही इस संबोधन से होता है — “मान्यवर चतुर्वेदी जी,”। जिसे पत्र लिखा जाता है, उसका नाम पत्र के आरंभ में संबोधन के रूप में आता है।
पत्र 8-7-67 को लिखा गया है, अर्थात 8 जुलाई 1967 को।
यह तिथि पत्र के ऊपरी भाग में, स्थान के ठीक नीचे लिखी है। तिथि लिखने का यह तरीका दिन-महीना-वर्ष का है — 8 (दिन), 7 (जुलाई), 67 (सन 1967)।
पत्र नई दिल्ली से लिखा गया है।
यह पत्र में दो जगह मिलता है —
पत्र पाने वाले के नाम से पहले ‘मान्यवर’ शब्द का प्रयोग किया गया है — “मान्यवर चतुर्वेदी जी,”
‘मान्यवर’ का अर्थ है — मान के योग्य, आदरणीय, सम्मानित। यह शब्द बताता है कि दिनकर चतुर्वेदी जी को अपने से बड़ा और आदरणीय मानते थे। नाम के बाद ‘जी’ लगाकर उन्होंने आदर और बढ़ा दिया।
| किसे पत्र | प्रायः प्रयोग होने वाले संबोधन |
|---|---|
| आदरणीय बड़े / अपरिचित | मान्यवर, आदरणीय, महोदय, श्रीमान |
| माता-पिता, गुरुजन | पूज्य, पूजनीय, आदरणीय |
| मित्र या बराबर वाले | प्रिय मित्र, प्रिय … |
| छोटों को | प्रिय, चिरंजीव, आयुष्मान |
पत्र-लेखक ने अपने नाम से पहले ‘आपका’ शब्द लिखा है — “आपका दिनकर”।
इसका भाव क्या है — ‘आपका’ लिखकर लेखक कहता है कि ‘मैं आपका अपना हूँ’। यह अपनापन, विनम्रता और स्नेह दिखाने वाला शब्द है। ध्यान दीजिए कि दिनकर ने अपने नाम के आगे ‘राष्ट्रकवि’ या कोई उपाधि नहीं लगाई — इतने बड़े लेखक होकर भी उन्होंने सिर्फ़ ‘आपका दिनकर’ लिखा। यही सच्ची विनम्रता है।
| पत्र के अंत में लिखे जाने वाले शब्द | कब |
|---|---|
| आपका / आपकी | परिचित, मित्र या स्नेह वाले संबंध में |
| आपका आज्ञाकारी / आज्ञाकारिणी | माता-पिता या गुरुजन को लिखते समय |
| भवदीय / भवदीया | औपचारिक पत्र में — प्रधानाचार्य, अधिकारी, संपादक को |
| तुम्हारा / तुम्हारी | अपने से छोटों या घनिष्ठ मित्रों को |