वृक्ष का गिरना अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। लेखक स्वयं पहले लिख चुका है — “सब पेड़ मरने से पहले संतान छोड़ जाने के लिए व्यग्र हैं। बीज ही उनकी संतान है।” इसलिए वृक्ष के गिरने के बाद यह होता है —
- उसके बीज नया वंश चलाते हैं। जो बीज मिट्टी में गिर चुके थे, वे अगली वर्षा में अंकुरित होकर नए पौधे बन जाते हैं। इस तरह वही चक्र फिर से शुरू हो जाता है — बीज से बीज तक।
- उसका शरीर मिट्टी बन जाता है। गिरा हुआ तना, डालियाँ और पत्ते धीरे-धीरे गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं और उसे उपजाऊ बना देते हैं। जिस माटी से पेड़ ने जीवन-भर रस लिया था, अंत में वह अपना पूरा शरीर उसी माटी को लौटा देता है।
- वह दूसरे जीवों के काम आता है। सूखे तने में दीमक, चींटियाँ, भृंग और कठफोड़वा जैसे पक्षी घर बना लेते हैं; उस पर काई और कुकुरमुत्ते उग आते हैं। एक गिरा हुआ पेड़ भी अनेक जीवों को आश्रय देता है।
- वह मनुष्य के काम आता है। उसकी लकड़ी से ईंधन, हल, दरवाज़े, फ़र्नीचर और काग़ज़ बनते हैं। और जब हम वह लकड़ी जलाते हैं तो, जैसा पाठ कहता है, उसमें बँधी हुई सूरज की किरणें ही प्रकाश और ताप बनकर बाहर आती हैं।
- उसकी जगह खाली होते ही धूप नीचे तक पहुँचती है और छाया में दबे छोटे पौधों को बढ़ने का मौका मिल जाता है — वही ‘होड़’ जिसका ज़िक्र पाठ में है।