मल्हार अध्याय 13 अनुमान या कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए। (क) “इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है।” वृक्ष के समाप्त होने के बाद क्या होता है?
उत्तर

वृक्ष का गिरना अंत नहीं, एक नई शुरुआत है। लेखक स्वयं पहले लिख चुका है — “सब पेड़ मरने से पहले संतान छोड़ जाने के लिए व्यग्र हैं। बीज ही उनकी संतान है।” इसलिए वृक्ष के गिरने के बाद यह होता है —

  1. उसके बीज नया वंश चलाते हैं। जो बीज मिट्टी में गिर चुके थे, वे अगली वर्षा में अंकुरित होकर नए पौधे बन जाते हैं। इस तरह वही चक्र फिर से शुरू हो जाता है — बीज से बीज तक।
  2. उसका शरीर मिट्टी बन जाता है। गिरा हुआ तना, डालियाँ और पत्ते धीरे-धीरे गलकर मिट्टी में मिल जाते हैं और उसे उपजाऊ बना देते हैं। जिस माटी से पेड़ ने जीवन-भर रस लिया था, अंत में वह अपना पूरा शरीर उसी माटी को लौटा देता है।
  3. वह दूसरे जीवों के काम आता है। सूखे तने में दीमक, चींटियाँ, भृंग और कठफोड़वा जैसे पक्षी घर बना लेते हैं; उस पर काई और कुकुरमुत्ते उग आते हैं। एक गिरा हुआ पेड़ भी अनेक जीवों को आश्रय देता है।
  4. वह मनुष्य के काम आता है। उसकी लकड़ी से ईंधन, हल, दरवाज़े, फ़र्नीचर और काग़ज़ बनते हैं। और जब हम वह लकड़ी जलाते हैं तो, जैसा पाठ कहता है, उसमें बँधी हुई सूरज की किरणें ही प्रकाश और ताप बनकर बाहर आती हैं।
  5. उसकी जगह खाली होते ही धूप नीचे तक पहुँचती है और छाया में दबे छोटे पौधों को बढ़ने का मौका मिल जाता है — वही ‘होड़’ जिसका ज़िक्र पाठ में है।
निष्कर्ष: पेड़ मरकर भी कुछ बरबाद नहीं होने देता — बीज से नया जीवन, शरीर से मिट्टी, लकड़ी से ऊर्जा और खोखर से दूसरों का घर। इसीलिए लेखक ने उसके अंत को त्याग कहा है, हार नहीं।
चर्चा के लिए एक प्रश्न: क्या मनुष्य भी अपने पीछे ऐसा कुछ छोड़ जाता है जो दूसरों के काम आए? अपने समूह में इसके उदाहरण खोजिए।
प्र2.
(ख) पेड़-पौधों के बारे में लेखक की रुचि कैसे जागृत हुई होगी?
उत्तर

यह अनुमान का प्रश्न है, पर अनुमान हवा में नहीं लगाना है — ‘लेखक से परिचय’ (पृष्ठ 149) और लेख की भाषा, दोनों में सुराग़ मौजूद हैं।

सुराग़इससे क्या अनुमान लगता है
“जगदीशचंद्र बसु का बचपन प्रकृति का अवलोकन करते हुए बीता।”रुचि बचपन में ही, खेल-खेल में जगी होगी — पेड़, तालाब, कीड़े-मकोड़े देखते हुए।
पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं से प्रेम करते हुए उनकी शिक्षा आरंभ हुई।पढ़ाई से पहले प्रेम आया। पहले उन्हें पेड़ अच्छे लगे, फिर उनके बारे में जानने की भूख जगी।
“एक गमले में पौधा था। परीक्षण करने के लिए कुछ दिन गमले को औंधा लटकाए रखा।”वे केवल देखकर संतुष्ट नहीं होते थे — प्रयोग करके जाँचते थे। यही स्वभाव उन्हें वैज्ञानिक बनाता चला गया।
“दो-एक दिन बाद क्या देखता हूँ…”, “क्या तुमने अंकुर को उठते देखा है?”उनके भीतर बच्चों जैसा अचरज ज़िंदा था। अचरज ही हर खोज की पहली सीढ़ी है।
“उन्होंने सिद्ध किया कि पौधों का एक निश्चित जीवनचक्र व प्रजनन प्रणाली होती है और वे अपने परिवेश के प्रति जागरूक होते हैं।”उन्हें लगा होगा कि पौधे भी हमारी तरह अनुभव करते हैं — यही विचार आगे उनकी सबसे बड़ी खोज बना।

नमूना उत्तर: जगदीशचंद्र बसु का बचपन गाँव के खुले परिवेश में, प्रकृति को देखते हुए बीता। उन्होंने बरसात के बाद बीज को फूटते, अंकुर को मिट्टी भेदकर उठते और बेलों को पेड़ों पर चढ़ते देखा होगा। पढ़ाई से पहले उन्हें पेड़-पौधों से प्रेम हुआ, और प्रेम से जिज्ञासा जगी — “ये ऐसा क्यों करते हैं?” इसी जिज्ञासा ने उन्हें प्रयोग करने पर मजबूर किया, जैसे गमले को औंधा लटकाकर देखना। जब उन्होंने पाया कि पौधा दो ही दिन में अपनी दिशा सुधार लेता है, तो उन्हें विश्वास हो गया कि पौधे भी अपने चारों ओर की दुनिया को समझते हैं। यही विश्वास आगे चलकर उनके शोध का आधार बना और उन्होंने संसार में पहली बार यह सिद्ध किया कि पौधे किसी भी अन्य जीव के समान होते हैं।

अपने लिए भी सोचिए: रुचि जगाने का यही नुस्खा आप पर भी लागू होता है — ध्यान से देखिए, प्रश्न पूछिए, फिर छोटा-सा प्रयोग करके खुद जाँचिए। इसी क्रम से एक साधारण बच्चा वैज्ञानिक बनता है।
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