पहले देख लीजिए कि बसु का तरीका क्या है — वही आपके लेख का ढाँचा बनेगा।
| लेखक की चाल | पाठ का उदाहरण | आप क्या करेंगे |
|---|---|---|
| क्रम से चलना (जन्म → बढ़ना → काम → अंत) | बीज → अंकुर → तना-जड़ → भोजन → फूल → बीज → वृक्ष का गिरना | अपनी चीज़ की भी शुरू से अंत तक की यात्रा लिखिए। |
| घर का उदाहरण देना | औंधा गमला, मूली काटकर बोना, चीनी का पानी में घुलना | कम-से-कम दो ऐसे उदाहरण दीजिए जो पाठक ने खुद देखे हों। |
| पाठक से सीधे बात करना | “क्या तुमने अंकुर को उठते देखा है?” | बीच-बीच में एक-दो प्रश्न पूछिए। |
| मानवीकरण | बीज ‘सोता’ है, पेड़ ‘हँसता’ है, ‘बंधुओं को बुलाता’ है | अपनी चीज़ को भी एक जीव की तरह बोलने-चलने दीजिए। |
| अंत में एक बड़ी बात | “संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है।” | अंतिम पंक्ति ऐसी हो जो पाठक के मन में रह जाए। |
नमूना उत्तर: गेहूँ की बात
क्या तुमने कभी रोटी को फूलते देखा है? उसी फूली हुई रोटी के पीछे गेहूँ की एक लंबी कहानी छिपी है।
कार्तिक के बाद, जब खेत की मिट्टी ठंडी और भुरभुरी हो जाती है, किसान गेहूँ के दाने उसमें बो देता है। दाना पहले चुपचाप पड़ा रहता है, मानो सोच रहा हो कि बाहर निकलूँ या नहीं। फिर पहला पानी लगता है और उसका छिलका दरक जाता है। एक सफ़ेद जड़ नीचे उतरती है और एक हरी सुई ऊपर की ओर मिट्टी फोड़कर निकल आती है। पंद्रह दिन बाद पूरा खेत ऐसा दिखता है जैसे किसी ने हरी चादर बिछा दी हो।
गेहूँ भी हमारी तरह भोजन करता है। उसकी जड़ें पानी में घुली मिट्टी का रस पीती हैं और उसकी पत्तियाँ धूप पीती हैं। जाड़े की कोहरे वाली सुबह में जब सूरज देर से निकलता है, गेहूँ की बढ़त भी धीमी पड़ जाती है — यह मैंने अपने दादा के खेत में खुद देखा है।
फिर फागुन आता है। बालियाँ निकलती हैं, हवा चलती है और पूरा खेत एक साथ झुककर लहराने लगता है, जैसे कोई सुनहरी नदी बह रही हो। दाना पकते-पकते गेहूँ का हरा शरीर पीला पड़ जाता है, सूख जाता है। पौधा अपना सारा रस दानों को दे चुका होता है।
चैत में कटाई होती है। दाने कोठी में चले जाते हैं, भूसा पशुओं के काम आता है, और थोड़े-से दाने अगली बुआई के लिए बचा लिए जाते हैं। इस तरह गेहूँ का पौधा मिट जाता है, पर उसका दाना हमारी थाली तक और अगले खेत तक — दोनों जगह पहुँच जाता है। सचमुच, हर रोटी किसी पौधे की पूरी ज़िंदगी है।