मल्हार अध्याय 13 लेख की रचना

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
इस लेख में एक के बाद एक विचार को लेखक ने सुसंगत रूप से प्रस्तुत किया है। गमले को औंधा लटकाना या मूली काटकर बोना जैसे उदाहरण देकर बात कहना इस लेख का एक तरीका है। अपने तथ्य को वास्तविकता या व्यावहारिकता से जोड़ना भी इस लेख की विशेषता है। (क) जैसे लेखक ने ‘पेड़ की बात’ कही है वैसे ही अपने आस-पास की चीज़ें देखिए और किसी एक चीज़ पर लेख लिखिए, जैसे—गेहूँ की बात।
उत्तर

पहले देख लीजिए कि बसु का तरीका क्या है — वही आपके लेख का ढाँचा बनेगा।

लेखक की चालपाठ का उदाहरणआप क्या करेंगे
क्रम से चलना (जन्म → बढ़ना → काम → अंत)बीज → अंकुर → तना-जड़ → भोजन → फूल → बीज → वृक्ष का गिरनाअपनी चीज़ की भी शुरू से अंत तक की यात्रा लिखिए।
घर का उदाहरण देनाऔंधा गमला, मूली काटकर बोना, चीनी का पानी में घुलनाकम-से-कम दो ऐसे उदाहरण दीजिए जो पाठक ने खुद देखे हों।
पाठक से सीधे बात करना“क्या तुमने अंकुर को उठते देखा है?”बीच-बीच में एक-दो प्रश्न पूछिए।
मानवीकरणबीज ‘सोता’ है, पेड़ ‘हँसता’ है, ‘बंधुओं को बुलाता’ हैअपनी चीज़ को भी एक जीव की तरह बोलने-चलने दीजिए।
अंत में एक बड़ी बात“संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है।”अंतिम पंक्ति ऐसी हो जो पाठक के मन में रह जाए।

नमूना उत्तर: गेहूँ की बात

क्या तुमने कभी रोटी को फूलते देखा है? उसी फूली हुई रोटी के पीछे गेहूँ की एक लंबी कहानी छिपी है।

कार्तिक के बाद, जब खेत की मिट्टी ठंडी और भुरभुरी हो जाती है, किसान गेहूँ के दाने उसमें बो देता है। दाना पहले चुपचाप पड़ा रहता है, मानो सोच रहा हो कि बाहर निकलूँ या नहीं। फिर पहला पानी लगता है और उसका छिलका दरक जाता है। एक सफ़ेद जड़ नीचे उतरती है और एक हरी सुई ऊपर की ओर मिट्टी फोड़कर निकल आती है। पंद्रह दिन बाद पूरा खेत ऐसा दिखता है जैसे किसी ने हरी चादर बिछा दी हो।

गेहूँ भी हमारी तरह भोजन करता है। उसकी जड़ें पानी में घुली मिट्टी का रस पीती हैं और उसकी पत्तियाँ धूप पीती हैं। जाड़े की कोहरे वाली सुबह में जब सूरज देर से निकलता है, गेहूँ की बढ़त भी धीमी पड़ जाती है — यह मैंने अपने दादा के खेत में खुद देखा है।

फिर फागुन आता है। बालियाँ निकलती हैं, हवा चलती है और पूरा खेत एक साथ झुककर लहराने लगता है, जैसे कोई सुनहरी नदी बह रही हो। दाना पकते-पकते गेहूँ का हरा शरीर पीला पड़ जाता है, सूख जाता है। पौधा अपना सारा रस दानों को दे चुका होता है।

चैत में कटाई होती है। दाने कोठी में चले जाते हैं, भूसा पशुओं के काम आता है, और थोड़े-से दाने अगली बुआई के लिए बचा लिए जाते हैं। इस तरह गेहूँ का पौधा मिट जाता है, पर उसका दाना हमारी थाली तक और अगले खेत तक — दोनों जगह पहुँच जाता है। सचमुच, हर रोटी किसी पौधे की पूरी ज़िंदगी है।

दूसरे विषय जिन पर आप लिख सकते हैं: चावल की बात, आम के पेड़ की बात, तुलसी के पौधे की बात, बाँस की बात, मधुमक्खी की बात, चींटी की बात, बरसात की एक बूँद की बात, हमारे नल के पानी की बात, मेरी पुरानी साइकिल की बात।
प्र2.
(ख) उसे कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
उत्तर

यह लिखने के बाद बोलकर सुनाने की गतिविधि है। इसे इस तरह कीजिए —

  1. पहले चुपचाप एक बार पढ़ लीजिए — जहाँ जीभ अटके, वह वाक्य छोटा कर दीजिए। लंबे वाक्य सुनने में उलझ जाते हैं।
  2. शुरुआत ऐसी कीजिए जिससे सबके कान खड़े हो जाएँ — कोई प्रश्न या कोई चित्र। जैसे बसु ने शुरू किया था — “क्या आपने कभी कोई बीज बोया है?”
  3. धीरे, साफ़ और रुक-रुककर बोलिए। हर अनुच्छेद के बाद एक क्षण ठहरिए।
  4. यदि हो सके तो एक चीज़ दिखाइए — गेहूँ की बाली, अंकुरित चना, पत्ती या अपना बनाया चित्र। दिखाई गई चीज़ बात को याद रहने लायक बना देती है।
  5. अंत में साथियों से पूछिए — “आपने अपने आस-पास ऐसा क्या देखा है?” इससे चर्चा आगे बढ़ेगी।
  6. दूसरों को सुनते समय दो बातें नोट कीजिए — एक जो आपको अच्छी लगी और एक सुझाव। सुझाव विनम्रता से दीजिए।
मूल्यांकन के लिए तीन कसौटियाँ: (1) क्या लेख में चीज़ की पूरी यात्रा क्रम से आई? (2) क्या उसमें कम-से-कम दो असली उदाहरण थे? (3) क्या अंत की पंक्ति ने कुछ सोचने पर मजबूर किया? इन्हीं तीन बातों पर एक-दूसरे को राय दीजिए।
कक्षा के लिए सुझाव: सभी लेखों को एक साथ जोड़कर एक हस्तलिखित पत्रिका बनाइए — नाम रख सकते हैं ‘हमारे आस-पास की बातें’। हर लेख के साथ बच्चे का बनाया चित्र भी लगाइए और उसे कक्षा की दीवार पर लगा दीजिए।
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