मल्हार अध्याय 13 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ को एक बार फिर से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए— (क) बीज के अंकुरित होने में किस-किस का सहयोग मिलता है?
उत्तर

पाठ के पहले ही अनुच्छेद में अंकुरण की पूरी शर्तें आ जाती हैं —

“बहुत दिनों तक मिट्टी के नीचे बीज पड़े रहे। … सर्दियों के बाद वसंत आया। उसके बाद वर्षा की शुरूआत में दो-एक दिन पानी बरसा। अब और छिपे रहने की आवश्यकता नहीं थी! … आहिस्ता-आहिस्ता बीज का ढक्कन दरक गया, दो सुकोमल पत्तियों के बीच अंकुर बाहर निकला।”

इसलिए बीज को अंकुरित होने में इनका सहयोग मिलता है —

सहयोगीउसका कामपाठ का आधार
मिट्टीबीज को ढककर सुरक्षित रखती है और उसमें घुले द्रव्य भोजन बनते हैं“मिट्टी के नीचे बीज पड़े रहे”; “माटी में पानी डालने पर उसके भीतर बहुत-से द्रव्य गल जाते हैं।”
पानी (वर्षा)बीज का छिलका नरम करके फोड़ता है, मिट्टी के द्रव्यों को घोलता है“वर्षा की शुरूआत में दो-एक दिन पानी बरसा।”
उपयुक्त ऋतु/गरमाहटठंड बीत जाने पर ही बीज जागता है“सर्दियों के बाद वसंत आया।”
प्रकाश (सूर्य)बाहर निकलते ही अंकुर को बढ़ने की ऊर्जा देता है, उसी की ओर तना उठता है“ऊपर उठ जाओ, सूरज की रोशनी देखो।”; “प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है।”
हवापत्तों को साँस और ‘अंगारक’ वायु देती है, जिससे पौधा भोजन बनाता है“वृक्ष के पत्ते हवा से आहार ग्रहण करते हैं।”
समय और धैर्यअंकुरण एक झटके में नहीं होता“महीना-दर-महीना बीतता गया।”; “आहिस्ता-आहिस्ता बीज का ढक्कन दरक गया।”
एक वाक्य में: मिट्टी, पानी, उचित ऋतु की गरमाहट, हवा और सूरज का प्रकाश — इन पाँचों के मिल जाने पर ही बीज का ढक्कन दरकता है और अंकुर बाहर आता है। इनमें से एक भी न हो तो बीज सोया ही रह जाता है।
खुद देखिए: इसी पाठ की ‘अंकुरण’ गतिविधि (पृष्ठ 153) में चने या राजमा के बीज बोकर आप ये सारी शर्तें अपनी आँखों से जाँच सकते हैं — एक गमला अँधेरे में और एक धूप में रखकर तुलना कीजिए।
प्र2.
(ख) पौधे अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं?
उत्तर

लेखक पहले तुलना से बात शुरू करता है — “हमारे दाँत हैं, कठोर चीज़ खा सकते हैं… पेड़-पौधों के भी दाँत नहीं होते, इसलिए वे केवल तरल द्रव्य या वायु से भोजन ग्रहण करते हैं।” इसलिए पौधे दो रास्तों से भोजन लेते हैं —

रास्ताकैसेपाठ की पंक्ति
1. जड़ों से — नीचे सेपानी पड़ने पर मिट्टी के भीतर बहुत-से द्रव्य घुल जाते हैं (जैसे पानी में चीनी घुलती है); जड़ें वही घुला हुआ रस पी लेती हैं। पेड़ के भीतर हज़ारों-हज़ार नल होते हैं जिनसे यह रस पूरे शरीर में पहुँचता है।“पेड़-पौधे जड़ के द्वारा माटी से रस-पान करते हैं।” … “पेड़ में हज़ारों-हज़ार नल हैं। इन्हीं सब नलों के द्वारा माटी से पेड़ के शरीर में रस का संचार होता है।”
2. पत्तों से — ऊपर सेपत्तों में अनगिनत छोटे-छोटे मुँह होते हैं और हर मुँह पर होंठ, जो ज़रूरत न होने पर बंद हो जाते हैं। ये मुँह हवा से ‘अंगारक’ वायु लेते हैं और सूर्य-ऊर्जा के सहारे उससे अंगार खींचकर पेड़ के शरीर में मिला देते हैं।“वृक्ष के पत्ते हवा से आहार ग्रहण करते हैं।” … “पत्ते सूर्य-ऊर्जा के सहारे ‘अंगारक’ वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं। और यही अंगार वृक्ष के शरीर में प्रवेश करके उसका संवर्द्धन करते हैं।”
यानी पौधे का भोजन तीन चीज़ों से बनता है — जड़ से लिया पानी और घुले हुए द्रव्य + पत्तों से ली ‘अंगारक’ वायु + सूरज का प्रकाश। इसीलिए लेखक चेतावनी भी देता है — “जड़ों को पानी न मिलने पर पेड़ का भोजन बंद हो जाता है, पेड़ मर जाता है।” और “प्रकाश न मिलने पर ये बच नहीं सकते।”
आज की भाषा में: जिसे बसु ने ‘पत्तों के छोटे-छोटे मुँह और होंठ’ कहा, विज्ञान उसे रंध्र (stomata) कहता है; ‘हज़ारों नल’ को जाइलम-फ्लोएम, और भोजन बनाने की इस पूरी क्रिया को प्रकाश-संश्लेषण। सन 1858–1937 में जीने वाले लेखक ने यह सब बच्चों के लिए बिना कठिन नाम लिए समझा दिया।
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