प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। (क) “पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है।”
उत्तर
सीधा अर्थ — पेड़ का हर रेशा असल में सूरज की रोशनी का बना हुआ है। पत्ते दिन-भर सूर्य की ऊर्जा लेकर उसे अपने शरीर में बंद (आबद्ध) कर लेते हैं। जब हम लकड़ी या कोयला जलाते हैं, तो वही जमा की हुई ऊर्जा आग की लपट और गरमी बनकर बाहर निकल आती है। इसलिए चूल्हे की आँच भी सूरज की ही उधार ली हुई रोशनी है।
| पंक्ति का हिस्सा | उसका भाव |
|---|---|
| “रेशे-रेशे में” | कहीं थोड़ी-सी नहीं, पूरे शरीर में — तने, डाल, पत्ती, जड़, सब में। |
| “सूरज की किरणें आबद्ध हैं” | किरणें कैद हैं, बँधी पड़ी हैं। यह रूपक है — रोशनी को बंदी की तरह दिखाया गया है। |
| “ईंधन को जलाने पर… वह सूर्य की ही ऊर्जा है” | आग जलाना असल में उस बँधी हुई किरण को छोड़ देना है। |
पाठ से जोड़िए: इसी विचार को लेखक आगे और बड़ा कर देता है — “पेड़-पौधे व समस्त हरियाली प्रकाश हथियाने के जाल हैं… अनाज व सब्ज़ी न खाने पर हम भी बच नहीं सकते हैं। सोचकर देखा जाए तो हम भी प्रकाश की खुराक पाने पर ही जीवित हैं।” यानी रोटी, दाल, दूध — सब घुमा-फिराकर सूरज से ही आते हैं।
अपनी लेखन-पुस्तिका के लिए एक वाक्य: “जब मैं चूल्हे की आग देखता हूँ तो मुझे लगता है कि पेड़ ने बरसों पहले जो धूप जमा की थी, वह आज मेरे लिए रोटी सेंक रही है।”