मल्हार अध्याय 13 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। (क) “पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है।”
उत्तर

सीधा अर्थ — पेड़ का हर रेशा असल में सूरज की रोशनी का बना हुआ है। पत्ते दिन-भर सूर्य की ऊर्जा लेकर उसे अपने शरीर में बंद (आबद्ध) कर लेते हैं। जब हम लकड़ी या कोयला जलाते हैं, तो वही जमा की हुई ऊर्जा आग की लपट और गरमी बनकर बाहर निकल आती है। इसलिए चूल्हे की आँच भी सूरज की ही उधार ली हुई रोशनी है।

पंक्ति का हिस्साउसका भाव
“रेशे-रेशे में”कहीं थोड़ी-सी नहीं, पूरे शरीर में — तने, डाल, पत्ती, जड़, सब में।
“सूरज की किरणें आबद्ध हैं”किरणें कैद हैं, बँधी पड़ी हैं। यह रूपक है — रोशनी को बंदी की तरह दिखाया गया है।
“ईंधन को जलाने पर… वह सूर्य की ही ऊर्जा है”आग जलाना असल में उस बँधी हुई किरण को छोड़ देना है।
पाठ से जोड़िए: इसी विचार को लेखक आगे और बड़ा कर देता है — “पेड़-पौधे व समस्त हरियाली प्रकाश हथियाने के जाल हैं… अनाज व सब्ज़ी न खाने पर हम भी बच नहीं सकते हैं। सोचकर देखा जाए तो हम भी प्रकाश की खुराक पाने पर ही जीवित हैं।” यानी रोटी, दाल, दूध — सब घुमा-फिराकर सूरज से ही आते हैं।
अपनी लेखन-पुस्तिका के लिए एक वाक्य: “जब मैं चूल्हे की आग देखता हूँ तो मुझे लगता है कि पेड़ ने बरसों पहले जो धूप जमा की थी, वह आज मेरे लिए रोटी सेंक रही है।”
प्र2.
(ख) “मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं।”
उत्तर

सीधा अर्थ — पेड़ और मधुमक्खी-तितली की दोस्ती बहुत पुरानी है (चिरकाल = बहुत लंबे समय से, घनिष्ठता = गहरी मित्रता)। वे अकेली नहीं, झुंड बनाकर फूलों पर आती हैं।

यह दोस्ती दोनों के फ़ायदे की है — इसे पाठ खुद बताता है :

पेड़ क्या देता हैमधुमक्खी-तितली क्या देती हैं
फूलों में जमा किया हुआ शहद — “वृक्ष अपने फूलों में शहद का संचय करके रखते हैं।”एक फूल के पराग-कण दूसरे फूल तक पहुँचाना — “पराग-कण के बिना बीज पक नहीं सकता।”
रंग-बिरंगी पंखुड़ियों का पता-निशान, ताकि रास्ता न भूलेंउनके आने से “वृक्ष का भी उपकार होता है” — बीज बनता है, वंश चलता है
शाम होते ही चारों ओर फैलाई गई सुगंध, ताकि रात में उड़ने वाले पतंगे भी पहुँच सकेंअँधेरे में भी परागण का काम पूरा हो जाता है
भाषा की बात: ‘दल-बल सहित’ प्रायः सेना या बारात के लिए आता है। यहाँ इसे तितलियों के लिए बरतकर लेखक ने फूलों के मौसम को एक उत्सव, एक निमंत्रण बना दिया है। इसीलिए इससे पहले पेड़ पुकारता है — “कहाँ हो मेरे बंधु, मेरे बांधव, आज मेरे घर आओ।” यह मानवीकरण है।
आज की भाषा में: जिसे विज्ञान ‘परागण’ (pollination) कहता है, उसी को बसु ने ‘पुरानी दोस्ती’ कहकर समझा दिया — यही इस लेख की सबसे बड़ी खूबी है।
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