मल्हार अध्याय 4 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए— “भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता।”
उत्तर

सीधा अर्थ: बाबा भारती का दिन दो ही कामों में बँटा था — भगवान का भजन और सुलतान की सेवा। भजन के बाद जितना भी समय बचता, वह पूरा-का-पूरा घोड़े को दे दिया जाता था।

इस वाक्य में असली बात क्या छिपी है: ‘अर्पण’ शब्द पर ध्यान दीजिए। अर्पण तो देवता को किया जाता है। लेखक यह कहकर बहुत चतुराई से बता देता है कि बाबा भारती के जीवन में घोड़ा दूसरे नंबर का देवता बन चुका है। यानी जिस साधु ने रुपया, माल, ज़मीन सब त्याग दिया, वह एक घोड़े के मोह में बँध गया।

यही वाक्य पूरी कहानी की नींव रखता है —

  • इतना गहरा लगाव था, तभी घोड़ा छिनने का दुख इतना बड़ा बनता है;
  • और तभी यह बात चौंकाती है कि ऐसे प्रिय घोड़े को खोकर भी बाबा भारती के मुख पर “दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी”।
चर्चा के लिए: क्या किसी वस्तु या प्राणी से इतना लगाव रखना ठीक है? कक्षा में दोनों पक्ष रखिए — एक ओर यह प्रेम है, दूसरी ओर यही मोह बाबा भारती की कमज़ोरी भी बनता है, जिसके कारण वे घमंड से घोड़े की चाल दिखा बैठते हैं।
प्र2.
“बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड़्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।”
उत्तर

सीधा अर्थ: बाबा भारती ने अपना घोड़ा गर्व के साथ दिखाया — जैसे कोई अपनी सबसे अनमोल चीज़ दिखाता है। और खड़्गसिंह ने उसे हैरानी से देखा, क्योंकि उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, पर ऐसा बाँका घोड़ा कभी नहीं देखा था।

वाक्य का आधा भागक्रियाभावआगे क्या हुआ
बाबा ने घोड़ा दिखायादिखानाघमंडयही घमंड आगे चलकर उनसे घोड़े की चाल भी दिखवा देता है
खड़्गसिंह ने घोड़ा देखादेखनाआश्चर्यआश्चर्य आगे लालच में बदलता है — “ऐसा घोड़ा खड़्गसिंह के पास होना चाहिए था”
वाक्य की बनावट देखिए: दोनों आधे हिस्से एक ही साँचे में ढले हैं — कर्ता + ‘घोड़ा’ + क्रिया + भाव। ऐसी समानांतर रचना से दो व्यक्तियों का अंतर एक ही झटके में सामने आ जाता है। एक ही वस्तु है, पर देखने वाली दो आँखें अलग हैं — एक की आँख में गर्व, दूसरे की आँख में लालच का बीज। यहीं से कहानी का टकराव शुरू होता है।
सोचिए: यदि बाबा भारती घमंड न दिखाते, केवल शांत भाव से घोड़ा दिखा देते, तो शायद कहानी वहीं ख़त्म हो जाती। लेखक बता रहा है कि घमंड कितना भी छोटा हो, नुक़सान बड़ा कर सकता है।
प्र3.
“वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था।”
उत्तर

सीधा अर्थ: खड़्गसिंह डाकू था। डाकू की सोच यह होती है कि जो चीज़ उसे अच्छी लग जाए, वह उसी की है — भले ही वह किसी और की हो। उसे लेने के लिए वह किसी अनुमति या न्याय की प्रतीक्षा नहीं करता।

यह वाक्य क्यों ज़रूरी था: लेखक यहाँ हमें आगे की घटना के लिए तैयार कर रहा है। इस एक वाक्य के बाद हमें आश्चर्य नहीं होता जब खड़्गसिंह कहता है — “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।” यह धमकी उसके स्वभाव से अपने आप निकली है। कहानी में ऐसे वाक्य को पात्र का परिचय कहते हैं — लेखक बताता नहीं, पात्र की सोच खोलकर दिखा देता है।

इसमें एक गहरी बात भी है — ‘पसंद आना’ और ‘अधिकार होना’ दो बिलकुल अलग बातें हैं, पर डाकू के मन में ये दोनों एक हो गई हैं। यही उसका सबसे बड़ा दोष है।

और यहीं कहानी का मोड़ छिपा है: अंत में यही खड़्गसिंह घोड़ा अपने पास रखने के बजाय लौटा देता है। यानी जो आदमी ‘पसंद = अधिकार’ मानता था, वह पहली बार अपनी पसंद छोड़ना सीखता है। इसी बदलाव के कारण कहानी का नाम ‘हार की जीत’ है।
प्र4.
“बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।”
उत्तर

सीधा अर्थ: घोड़ा छिन जाने के बाद बाबा भारती खड़्गसिंह के पास गए और उसकी ओर उन्हीं आँखों से देखा जिन आँखों से बकरा कसाई की ओर देखता है — यानी बिलकुल असहाय, लाचार और गिड़गिड़ाती हुई दृष्टि से।

तुलनाकिससेक्या दिखता है
बाबा भारतीबकरापूरी तरह निर्बल, जिसके हाथ में कुछ नहीं बचा
खड़्गसिंहकसाईजिसके हाथ में सारी शक्ति है और जो दया करे तो ही कुछ बचे
अलंकार: यहाँ ‘जैसे’ शब्द से तुलना की गई है, इसलिए यह उपमा है। यह उपमा जान-बूझकर बहुत तीखी चुनी गई है। लेखक चाहता तो लिख देता “बाबा भारती ने दीन दृष्टि से देखा”, पर बकरे और कसाई का चित्र मन पर जो चोट करता है, वह ‘दीन दृष्टि’ नहीं कर सकती। एक ही वाक्य में हमें दोनों पात्रों की शक्ति का अंतर दिखाई दे जाता है।
पर सबसे बड़ी बात आगे है: इतनी लाचार दृष्टि से देखने के बाद भी बाबा भारती घोड़ा नहीं माँगते — वे कहते हैं “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।” यानी बाहर से वे बकरे जैसे असहाय हैं, पर भीतर से इतने बड़े कि हारी हुई बाज़ी में भी अपनी सबसे प्रिय चीज़ छोड़ देते हैं। यही विरोधाभास इस पंक्ति को कहानी की सबसे सशक्त पंक्तियों में से एक बनाता है।
प्र5.
“उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई।”
उत्तर

सीधा अर्थ: घोड़ा छिन जाने के बाद वाली सुबह भी बाबा भारती नहाकर, रोज़ की तरह, बिना सोचे अस्तबल की ओर चल पड़े। फाटक तक पहुँचने पर उन्हें याद आया कि अब वहाँ सुलतान है ही नहीं — यानी उनसे भूल हो गई।

इस वाक्य में आदत की ताक़त दिखाई गई है: बरसों से यही क्रम था — उठना, स्नान करना, सीधे अस्तबल जाना। मन को चोट लगी है, पर पैरों को अभी ख़बर नहीं हुई। इसीलिए लेखक ने ठीक पहले लिखा है — “इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो”। यह पंक्ति हमें बताती है कि उनका दुख कितना गहरा था, बिना एक बार भी ‘दुख’ शब्द लिखे।

अगला वाक्य इसे और भारी बना देता है — “घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया।” निराशा का बोझ मानो शरीर पर लद गया हो। यह मानवीकरण जैसा प्रयोग है — निराशा कोई चीज़ नहीं, फिर भी उसका वज़न बताया गया है (एक मन ≈ 40 किलो)।

ध्यान दीजिए: ठीक इसी क्षण कहानी अपने सबसे सुंदर मोड़ पर पहुँचती है — घोड़ा भीतर से हिनहिनाता है। जिस फाटक पर निराशा ने पाँव रोक दिए थे, उसी फाटक से वे दौड़ते हुए भीतर घुसते हैं। दुख और आनंद के बीच केवल एक हिनहिनाहट का फ़ासला है।
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