सीधा अर्थ: घोड़ा छिन जाने के बाद वाली सुबह भी बाबा भारती नहाकर, रोज़ की तरह, बिना सोचे अस्तबल की ओर चल पड़े। फाटक तक पहुँचने पर उन्हें याद आया कि अब वहाँ सुलतान है ही नहीं — यानी उनसे भूल हो गई।
इस वाक्य में आदत की ताक़त दिखाई गई है: बरसों से यही क्रम था — उठना, स्नान करना, सीधे अस्तबल जाना। मन को चोट लगी है, पर पैरों को अभी ख़बर नहीं हुई। इसीलिए लेखक ने ठीक पहले लिखा है — “इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो”। यह पंक्ति हमें बताती है कि उनका दुख कितना गहरा था, बिना एक बार भी ‘दुख’ शब्द लिखे।
अगला वाक्य इसे और भारी बना देता है — “घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया।” निराशा का बोझ मानो शरीर पर लद गया हो। यह मानवीकरण जैसा प्रयोग है — निराशा कोई चीज़ नहीं, फिर भी उसका वज़न बताया गया है (एक मन ≈ 40 किलो)।
ध्यान दीजिए: ठीक इसी क्षण कहानी अपने सबसे सुंदर मोड़ पर पहुँचती है — घोड़ा भीतर से हिनहिनाता है। जिस फाटक पर निराशा ने पाँव रोक दिए थे, उसी फाटक से वे दौड़ते हुए भीतर घुसते हैं। दुख और आनंद के बीच केवल एक हिनहिनाहट का फ़ासला है।