‘हार की जीत’ नाम इसलिए रखा गया है कि इस कहानी में हार आख़िर में जीत बन जाती है। ऊपर से देखने पर बाबा भारती हारे — उनका प्रिय घोड़ा सुलतान छिन गया। पर वे जिस बात के लिए लड़ रहे थे, वह जीत गई; और अंत में घोड़ा भी अपने आप लौट आया।
| किसकी हार दिखती है | वह हार जीत कैसे बन गई | कहानी का प्रमाण |
|---|---|---|
| बाबा भारती — घोड़ा छिन गया | उन्होंने घोड़ा तो खोया, पर मनुष्य पर से विश्वास बचा लिया। यही उनकी असली जीत है — और घोड़ा भी उसी रात लौट आया। | “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे। दुनिया से विश्वास उठ जाएगा।” |
| खड़्गसिंह — घोड़ा जीत लिया | वह घोड़ा पाकर भी हार गया, क्योंकि उसका अपना मन उसे धिक्कारने लगा। और जब उसने घोड़ा लौटा दिया, तो असल में उसने अपने भीतर के डाकू को हराकर जीत हासिल की। | “इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।” |
कारण संक्षेप में —
- बाबा भारती ने घोड़ा वापस नहीं माँगा; उन्होंने केवल यह माँगा कि घटना छिपी रहे। यह त्याग ही उनका सबसे बड़ा हथियार बन गया।
- उनकी इसी बात ने एक कुख्यात डाकू का हृदय बदल दिया — “कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है!”
- अंत में दोनों के आँसू एक ही जगह मिट्टी पर गिरते हैं। यानी हार-जीत का भेद ही मिट जाता है — दोनों जीत गए।