मल्हार अध्याय 5 मेरी समझ से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे सही (सटीक) उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए— (1) “रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।” दोहे का भाव है— • सोच-समझकर बोलना चाहिए। • मधुर वाणी में बोलना चाहिए। • धीरे-धीरे बोलना चाहिए। • सदा सच बोलना चाहिए।
उत्तर

सही उत्तर है — सोच-समझकर बोलना चाहिए। इसी विकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।

पहले दोहे का अर्थ देख लीजिए —

“रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥”

यानी — जीभ बावली (पगली) है, वह बिना सोचे स्वर्ग-पाताल एक कर देती है, कुछ भी कह जाती है। कहकर वह तो मुँह के भीतर सुरक्षित बैठी रहती है, पर उसके कहे की मार कपाल यानी सिर को सहनी पड़ती है। रहीम यही चेतावनी दे रहे हैं कि मुँह से निकलने से पहले बात तौल लो, वरना भुगतना पूरे व्यक्ति को पड़ता है।

विकल्पसही / ग़लतकारण
सोच-समझकर बोलना चाहिए।सही ★दोहे का पूरा ढाँचा यही है — बिना सोचे बोलने का परिणाम दिखाना। ‘बावरी’ शब्द का अर्थ ही है बिना सोचे-समझे बोल देने वाली।
मधुर वाणी में बोलना चाहिए।ग़लतयह बात सुंदर है, पर इस दोहे की नहीं। यहाँ बात मिठास की नहीं, सावधानी की है। मधुर वाणी वाला भाव कबीर के “ऐसी बानी बोलिए” दोहे का है।
धीरे-धीरे बोलना चाहिए।ग़लतदोहे में बोलने की गति की कोई चर्चा नहीं है। ‘बावरी’ का अर्थ तेज़ बोलना नहीं, बिना विचारे बोलना है।
सदा सच बोलना चाहिए।ग़लतसच-झूठ का प्रश्न ही नहीं उठाया गया। जीभ सच भी बिना सोचे कह दे तो भी कपाल को जूती खानी पड़ सकती है।
‘जूती खात कपाल’ की चोट कहाँ है: रहीम ने यहाँ एक बहुत बारीक बात पकड़ी है — गलती एक अंग करता है और सज़ा दूसरे को मिलती है। जीभ बोलकर भीतर छिप जाती है, जूता सिर पर पड़ता है। इसी विषमता से दोहा चुभने वाला बन जाता है। यही ‘बोलने से पहले सोचो’ को केवल उपदेश न रहने देकर एक चित्र बना देता है।
प्र2.
(2) “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।” इस दोहे का भाव क्या है? • तलवार सुई से बड़ी होती है। • सुई का काम तलवार नहीं कर सकती। • तलवार का महत्व सुई से ज्यादा है। • हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।
उत्तर

सही उत्तर है — हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

दोहे का अर्थ — बड़ी वस्तु को देखकर छोटी को फेंक मत दीजिए। जहाँ सुई का काम पड़ता है, वहाँ तलवार क्या कर लेगी? रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देकर एक बड़ा नियम बता रहे हैं, केवल सुई-तलवार की तुलना नहीं कर रहे।

विकल्पसही / ग़लतकारण
हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।सही ★यही दोहे की सीख है। पहली पंक्ति ‘लघु न दीजिये डारि’ नियम बताती है, दूसरी पंक्ति सुई-तलवार का उदाहरण देकर उसे समझाती है।
सुई का काम तलवार नहीं कर सकती।ग़लतयह बात दोहे में है ज़रूर, पर यह उदाहरण है, भाव नहीं। उदाहरण को ही उत्तर मान लेना सबसे आम भूल है — पूछा यह गया है कि रहीम इस उदाहरण से कहना क्या चाहते हैं
तलवार सुई से बड़ी होती है।ग़लतयह तो सबको पहले से पता है। इतनी साधारण बात कहने के लिए दोहा नहीं लिखा जाता।
तलवार का महत्व सुई से ज्यादा है।ग़लतयह दोहे के ठीक उलटा है। रहीम तो दिखा रहे हैं कि सिलाई के मौके पर सुई तलवार से कहीं अधिक काम की है।
पहचान का सूत्र: ‘इस दोहे का भाव क्या है?’ पूछा जाए तो वह विकल्प चुनिए जो दोहे के बाहर भी लागू होता हो — जीवन के दूसरे मौकों पर भी। ‘सुई का काम तलवार नहीं कर सकती’ केवल सुई-तलवार पर लागू होता है; ‘हर चीज़ का अपना महत्व है’ हाथी-चींटी, बड़े-छोटे भाई, हर जगह लागू होता है। इसीलिए वही भाव है।
प्र3.
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने यही उत्तर क्यों चुने?
उत्तर

यह चर्चा का प्रश्न है। चर्चा में आपका उत्तर तभी मज़बूत माना जाएगा जब आप उसके साथ दोहे का कोई शब्द प्रमाण के रूप में दिखा सकें।

अच्छी चर्चा में तीन बातें होनी चाहिए —

  • आपने कौन-सा विकल्प चुना;
  • दोहे का वह शब्द या पंक्ति जिससे वह सिद्ध होता है;
  • बाक़ी विकल्प क्यों नहीं चुने — कम-से-कम एक का कारण।
नमूना उत्तर:
“पहले प्रश्न में मैंने चुना — सोच-समझकर बोलना चाहिए। कारण यह है कि रहीम ने जीभ को ‘बावरी’ कहा है। बावरी का अर्थ पगली, यानी बिना सोचे बोल देने वाली। और अंत में लिखा है ‘जूती खात कपाल’ — भुगतना पूरे आदमी को पड़ता है। ‘मधुर वाणी में बोलना चाहिए’ मैंने इसलिए नहीं चुना, क्योंकि दोहे में मिठास की कोई बात ही नहीं आई।

दूसरे प्रश्न में मैंने चुना — हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है। कारण यह कि पहली ही पंक्ति में रहीम कहते हैं ‘लघु न दीजिये डारि’ — छोटे को मत फेंको। सुई-तलवार तो सिर्फ़ उदाहरण है। इसलिए ‘सुई का काम तलवार नहीं कर सकती’ को मैंने उत्तर नहीं माना — वह उदाहरण है, सीख नहीं।”
चर्चा का असली लाभ: हो सकता है आपके किसी मित्र ने दूसरा विकल्प चुना हो। उससे बहस मत कीजिए — पूछिए कि उसने दोहे के किस शब्द के आधार पर चुना। इस तरह पूरी कक्षा को यह आदत पड़ती है कि दोहे का अर्थ अनुमान से नहीं, उसके शब्दों से निकाला जाता है।
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