सही उत्तर है — सोच-समझकर बोलना चाहिए। इसी विकल्प के सामने तारा (★) बनाइए।
पहले दोहे का अर्थ देख लीजिए —
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥”
यानी — जीभ बावली (पगली) है, वह बिना सोचे स्वर्ग-पाताल एक कर देती है, कुछ भी कह जाती है। कहकर वह तो मुँह के भीतर सुरक्षित बैठी रहती है, पर उसके कहे की मार कपाल यानी सिर को सहनी पड़ती है। रहीम यही चेतावनी दे रहे हैं कि मुँह से निकलने से पहले बात तौल लो, वरना भुगतना पूरे व्यक्ति को पड़ता है।
| विकल्प | सही / ग़लत | कारण |
|---|---|---|
| सोच-समझकर बोलना चाहिए। | सही ★ | दोहे का पूरा ढाँचा यही है — बिना सोचे बोलने का परिणाम दिखाना। ‘बावरी’ शब्द का अर्थ ही है बिना सोचे-समझे बोल देने वाली। |
| मधुर वाणी में बोलना चाहिए। | ग़लत | यह बात सुंदर है, पर इस दोहे की नहीं। यहाँ बात मिठास की नहीं, सावधानी की है। मधुर वाणी वाला भाव कबीर के “ऐसी बानी बोलिए” दोहे का है। |
| धीरे-धीरे बोलना चाहिए। | ग़लत | दोहे में बोलने की गति की कोई चर्चा नहीं है। ‘बावरी’ का अर्थ तेज़ बोलना नहीं, बिना विचारे बोलना है। |
| सदा सच बोलना चाहिए। | ग़लत | सच-झूठ का प्रश्न ही नहीं उठाया गया। जीभ सच भी बिना सोचे कह दे तो भी कपाल को जूती खानी पड़ सकती है। |