मल्हार अध्याय 5 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे दिए गए दोहों पर समूह में चर्चा कीजिए और उनके अर्थ या भावार्थ अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— (क) “रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय। हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥”
उत्तर

शब्दार्थ पहले — बिपदाहू = विपदा, मुसीबत; भली = अच्छी; थोरे दिन = थोड़े दिनों की; हित = भला चाहने वाला; अनहित = बुरा चाहने वाला; जानि परत = जान पड़ जाता है, पहचान में आ जाता है; सब कोय = सब लोग।

अर्थ — रहीम कहते हैं कि विपदा भी अच्छी ही है, बशर्ते वह थोड़े दिनों की हो। क्योंकि विपदा में ही इस संसार में यह पता चल जाता है कि कौन हमारा भला चाहने वाला है और कौन बुरा चाहने वाला।

भावार्थ — सुख के दिनों में सब मुस्कराकर मिलते हैं, इसलिए तब कोई परख नहीं हो पाती। मुसीबत आते ही चेहरे अलग-अलग हो जाते हैं — कुछ लोग आगे बढ़कर हाथ थाम लेते हैं, कुछ रास्ता बदल लेते हैं। इसीलिए रहीम विपदा को ‘भली’ कहते हैं — वह दुख देती है, पर साथ में एक बहुत क़ीमती चीज़ भी देती है: लोगों की सही पहचान

‘जो थोरे दिन होय’ — यह शर्त क्यों जोड़ी: रहीम भोले नहीं हैं। वे यह नहीं कह रहे कि मुसीबत जितनी लंबी हो उतनी अच्छी। लंबी विपदा तो तोड़ देती है। इसलिए वे साफ़ शर्त लगाते हैं — थोड़े दिनों की हो तो। इसी एक शर्त से दोहा उपदेश न रहकर व्यावहारिक अनुभव की बात बन जाता है। यही रहीम की नीति-काव्य की विशेषता है।
पाठ से जोड़िए: यही बात रहीम एक और दोहे में दोहराते हैं — “कहि रहीम संपति सगे… बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।” दोनों दोहों में विपत्ति एक कसौटी है, दंड नहीं। परीक्षा में इन दोनों को साथ लिखने पर उत्तर और मज़बूत हो जाता है।
प्र2.
(ख) “रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥”
उत्तर

शब्दार्थ पहले — जिह्वा = जीभ; बावरी = बावली, पगली, बिना सोचे-समझे काम करने वाली; कहि गइ = कह गई; सरग पताल = स्वर्ग और पाताल, यानी कुछ भी, कैसी भी बड़ी-छोटी बात; आपु = स्वयं; भीतर रही = मुँह के अंदर ही रह गई; जूती खात = जूते खाती है, मार और अपमान सहती है; कपाल = माथा, सिर।

अर्थ — रहीम कहते हैं कि यह जीभ बावली है। यह बिना सोचे स्वर्ग से पाताल तक की, यानी कुछ भी बात कह जाती है। कहकर वह तो मुँह के भीतर आराम से बैठी रहती है, पर उसकी कही बात का दंड कपाल यानी सिर को भोगना पड़ता है — जूती सिर पर पड़ती है।

भावार्थ — बिना सोचे बोली गई बात का नुक़सान बोलने वाले को ही उठाना पड़ता है। इसलिए मुँह से निकलने से पहले हर बात तौल लेनी चाहिए। तीर और बात, दोनों एक बार छूट जाने पर लौटते नहीं।

भाषा का कमाल — मानवीकरण: रहीम ने जीभ को एक जीता-जागता शरारती पात्र बना दिया है, जो शरारत करके भीतर छिप जाता है। शरीर के एक अंग को इस तरह मनुष्य की तरह बरतना मानवीकरण कहलाता है। साथ ही ‘सरग-पताल’ में विरोधाभासी जोड़ा रखकर उन्होंने ‘कुछ भी, कैसी भी बात’ को केवल दो शब्दों में कह दिया — यही दोहे की कसावट है।
ऐसे प्रश्न में क्या लिखें: भावार्थ लिखते समय तीन बातें रखिए — (1) कठिन शब्दों के अर्थ, (2) सीधा-सादा अर्थ, (3) जीवन की वह सीख जो दोहे से निकलती है। इन तीनों के बिना उत्तर अधूरा माना जाता है।
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