शब्दार्थ पहले — बिपदाहू = विपदा, मुसीबत; भली = अच्छी; थोरे दिन = थोड़े दिनों की; हित = भला चाहने वाला; अनहित = बुरा चाहने वाला; जानि परत = जान पड़ जाता है, पहचान में आ जाता है; सब कोय = सब लोग।
अर्थ — रहीम कहते हैं कि विपदा भी अच्छी ही है, बशर्ते वह थोड़े दिनों की हो। क्योंकि विपदा में ही इस संसार में यह पता चल जाता है कि कौन हमारा भला चाहने वाला है और कौन बुरा चाहने वाला।
भावार्थ — सुख के दिनों में सब मुस्कराकर मिलते हैं, इसलिए तब कोई परख नहीं हो पाती। मुसीबत आते ही चेहरे अलग-अलग हो जाते हैं — कुछ लोग आगे बढ़कर हाथ थाम लेते हैं, कुछ रास्ता बदल लेते हैं। इसीलिए रहीम विपदा को ‘भली’ कहते हैं — वह दुख देती है, पर साथ में एक बहुत क़ीमती चीज़ भी देती है: लोगों की सही पहचान।