ऐसा इसलिए होता है कि ये दोहे सैकड़ों वर्षों तक किताब से नहीं, ज़ुबान से चलते रहे। रहीम लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पहले हुए थे। तब न छापाख़ाना था, न घर-घर पुस्तकें। लोग दोहे सुनते, याद करते और आगे सुनाते थे। इसी मौखिक परंपरा में शब्द थोड़े-थोड़े बदलते चले गए।
मुख्य कारण —
- सुनकर याद रखना: याद रखते समय आदमी वही रूप पकड़ता है जो उसकी अपनी बोली में सहज हो। ‘छिटकाय’ कठिन लगा तो ‘चटकाय’ हो गया; ‘मिले’ की जगह वही ‘जुड़े’ आ गया जो धागे के साथ रोज़ बोला जाता है।
- अलग-अलग बोलियाँ: ये दोहे अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी — हर इलाक़े में गाए गए। हर बोली ने शब्द को अपने ढंग से ढाल लिया — ‘तलवारि’ ब्रज का रूप है, ‘तरवार’ बोलचाल का।
- अर्थ वही, ध्वनि आसान: ‘डारि → डार’, ‘मानुष → मानस’ — दोनों रूपों का अर्थ एक ही है, पर छोटा और चलता हुआ रूप बोलने में आसान पड़ता है। भाषा हमेशा आसानी की ओर बहती है।
- छंद बना रहता है: बदले हुए शब्द भी दोहे की मात्रा और तुक नहीं तोड़ते — ‘जाय’ की तुक ‘चटकाय’ से भी उतनी ही बैठती है जितनी ‘छिटकाय’ से। इसीलिए लोक ने बदलाव सहज स्वीकार कर लिया।
| पाठ का रूप | लोक में प्रचलित रूप | अर्थ | बदलाव का कारण |
|---|---|---|---|
| छिटकाय | चटकाय | झटका देकर / चटकाकर तोड़ना | ‘चटकना’ रोज़ की बोली का शब्द है, इसलिए ज़ुबान पर जल्दी चढ़ा। |
| मिले | जुड़े | जुड़ना, मिल जाना | धागे के साथ ‘जुड़ना’ ही स्वाभाविक क्रिया लगती है। |
| डारि | डार | फेंक देना | ब्रज का पुराना रूप छोटा होकर बोलचाल में आ गया। |
| तलवारि | तरवार | तलवार | क्षेत्रीय उच्चारण — ‘ल’ का ‘र’ हो जाना बोलियों में आम है। |
| मानुष | मानस | मनुष्य | संस्कृत-प्रभावित रूप और तत्सम रूप, दोनों साथ-साथ चलते रहे। |