मल्हार अध्याय 5 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
दोहों को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— 1. “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥” (क) इस दोहे में ‘मिले’ के स्थान पर ‘जुड़े’ और ‘छिटकाय’ के स्थान पर ‘चटकाय’ शब्द का प्रयोग भी लोक में प्रचलित है। जैसे— “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय॥” इसी प्रकार पहले दोहे में ‘डारि’ के स्थान पर ‘डार’, ‘तलवारि’ के स्थान पर ‘तरवार’ और चौथे दोहे में ‘मानुष’ के स्थान पर ‘मानस’ का उपयोग भी प्रचलित हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर

ऐसा इसलिए होता है कि ये दोहे सैकड़ों वर्षों तक किताब से नहीं, ज़ुबान से चलते रहे। रहीम लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पहले हुए थे। तब न छापाख़ाना था, न घर-घर पुस्तकें। लोग दोहे सुनते, याद करते और आगे सुनाते थे। इसी मौखिक परंपरा में शब्द थोड़े-थोड़े बदलते चले गए।

मुख्य कारण —

  • सुनकर याद रखना: याद रखते समय आदमी वही रूप पकड़ता है जो उसकी अपनी बोली में सहज हो। ‘छिटकाय’ कठिन लगा तो ‘चटकाय’ हो गया; ‘मिले’ की जगह वही ‘जुड़े’ आ गया जो धागे के साथ रोज़ बोला जाता है।
  • अलग-अलग बोलियाँ: ये दोहे अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी — हर इलाक़े में गाए गए। हर बोली ने शब्द को अपने ढंग से ढाल लिया — ‘तलवारि’ ब्रज का रूप है, ‘तरवार’ बोलचाल का।
  • अर्थ वही, ध्वनि आसान: ‘डारि → डार’, ‘मानुष → मानस’ — दोनों रूपों का अर्थ एक ही है, पर छोटा और चलता हुआ रूप बोलने में आसान पड़ता है। भाषा हमेशा आसानी की ओर बहती है।
  • छंद बना रहता है: बदले हुए शब्द भी दोहे की मात्रा और तुक नहीं तोड़ते — ‘जाय’ की तुक ‘चटकाय’ से भी उतनी ही बैठती है जितनी ‘छिटकाय’ से। इसीलिए लोक ने बदलाव सहज स्वीकार कर लिया।
पाठ का रूपलोक में प्रचलित रूपअर्थबदलाव का कारण
छिटकायचटकायझटका देकर / चटकाकर तोड़ना‘चटकना’ रोज़ की बोली का शब्द है, इसलिए ज़ुबान पर जल्दी चढ़ा।
मिलेजुड़ेजुड़ना, मिल जानाधागे के साथ ‘जुड़ना’ ही स्वाभाविक क्रिया लगती है।
डारिडारफेंक देनाब्रज का पुराना रूप छोटा होकर बोलचाल में आ गया।
तलवारितरवारतलवारक्षेत्रीय उच्चारण — ‘ल’ का ‘र’ हो जाना बोलियों में आम है।
मानुषमानसमनुष्यसंस्कृत-प्रभावित रूप और तत्सम रूप, दोनों साथ-साथ चलते रहे।
इसे ‘पाठ-भेद’ कहते हैं: एक ही रचना के दो अलग-अलग प्रचलित रूपों को विद्वान पाठ-भेद या पाठांतर कहते हैं। इसमें कोई रूप ‘ग़लत’ नहीं होता — जो प्राचीनतम हस्तलिखित प्रतियों में मिले, वह ‘प्रामाणिक पाठ’ माना जाता है। इसीलिए आपकी पुस्तक ने पाठ के नीचे स्रोत लिखा है — रहीम ग्रंथावली (सं.) विद्यानिवास मिश्र। परीक्षा में सदा पुस्तक वाला रूप ही लिखिए।
करके देखिए: अपने घर के बड़ों से यही दोहा सुनिए और उनका बोला हुआ रूप ज्यों-का-त्यों लिख लीजिए। फिर पुस्तक वाले रूप से मिलाइए। एक ही कक्षा में तीन-चार रूप निकल आएँ, तो समझिए आपने ‘पाठ-भेद’ अपनी आँखों से देख लिया।
प्र2.
(ख) इस दोहे में प्रेम के उदाहरण में धागे का प्रयोग ही क्यों किया गया है? क्या आप धागे के स्थान पर कोई अन्य उदाहरण सुझा सकते हैं? अपने सुझाव का कारण भी बताइए।
उत्तर

धागा चुना गया, क्योंकि प्रेम और धागे का स्वभाव आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा है। रहीम को जो चार बातें कहनी थीं, वे चारों धागे में एक साथ मिल जाती हैं —

धागे का गुणप्रेम में वही बात
धागा दो चीज़ों को जोड़ता हैप्रेम भी दो लोगों को जोड़ता है — यही उसका मूल काम है।
धागा महीन और नाज़ुक होता हैप्रेम भी नाज़ुक है — ज़रा-सी कठोरता से चटक जाता है।
झटका देने पर तुरंत टूट जाता हैक्रोध का एक झटका बरसों के संबंध को तोड़ देता है। ‘छिटकाय’ शब्द इसी झटके के लिए है।
टूटकर जुड़े तो गाँठ पड़ जाती हैयह सबसे गहरी बात है — मनमुटाव के बाद सुलह हो भी जाए, तो मन में एक गाँठ रह जाती है। रिश्ता पहले जैसा चिकना नहीं रहता।

चौथी बात ही असली कारण है। यदि रहीम केवल ‘नाज़ुक’ कहना चाहते तो काँच या फूल भी चल जाता। पर काँच टूटकर जुड़ता ही नहीं, और फूल मुरझाकर ख़त्म हो जाता है। धागा अकेली ऐसी चीज़ है जो टूटकर फिर जुड़ भी सकती है — पर गाँठ के साथ। रहीम को यही ‘गाँठ’ चाहिए थी, इसीलिए धागा ही सटीक बैठा।

धागे की जगह और कौन-से उदाहरण चल सकते हैं —

  • काँच या दर्पण: टूटने पर जोड़ भी दें तो दरार दिखती रहती है — ठीक वैसे ही जैसे मन की गाँठ। पर कमी यह है कि काँच जुड़ता नहीं, केवल चिपकता है।
  • काग़ज़: एक बार मोड़ दीजिए, सीधा करने पर भी निशान रह जाता है। मन पर पड़े निशान के लिए बहुत अच्छा उदाहरण है।
  • दूध: एक बूँद नींबू से फट जाता है और फिर कभी दूध नहीं बनता। यह बताता है कि कुछ रिश्ते तो लौटते ही नहीं।
  • पौधे की टहनी: हरी टहनी मुड़ भी जाए तो चलती रहती है, पर चटकाने पर सूख जाती है — धैर्य से रिश्ता बचाने की सीख इसमें है।
नमूना उत्तर:
“रहीम ने धागे का उदाहरण इसलिए चुना है कि धागा जोड़ता है, नाज़ुक है, झटके से टूटता है और टूटकर जुड़ने पर उसमें गाँठ पड़ जाती है। प्रेम के साथ भी ठीक यही चारों बातें होती हैं।
मैं धागे के स्थान पर काग़ज़ का उदाहरण सुझाऊँगा — ‘रिश्ते काग़ज़ की तरह हैं, एक बार मोड़ दो तो निशान रह ही जाता है।’ कारण यह कि काग़ज़ भी हर घर में है, वह भी नाज़ुक है, और उस पर पड़ा सिलवट का निशान ठीक वैसा ही है जैसा मन में पड़ी गाँठ। पर मानना पड़ेगा कि धागा फिर भी ज़्यादा सटीक है, क्योंकि उसमें ‘जोड़ने’ का काम पहले से मौजूद है, जो काग़ज़ में नहीं।”
प्र3.
2. “तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिँ न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥” इस दोहे में प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के किस मानवीय गुण की बात की गई है? प्रकृति से हम और क्या-क्या सीख सकते हैं?
उत्तर

इस दोहे में प्रकृति के माध्यम से परोपकार (परहित, दूसरों का भला करना) नामक मानवीय गुण की बात की गई है। इसी के साथ त्याग और निःस्वार्थ भाव भी जुड़े हुए हैं।

दोहे का अर्थ — पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते, सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीते। रहीम कहते हैं कि इसी प्रकार सज्जन लोग धन-संपत्ति दूसरों के काम आने के लिए ही जोड़ते हैं।

तरुवर → फल देता है, खाता नहीं
सरवर → जल देता है, पीता नहीं
सुजान → संपत्ति जोड़ता है, अपने लिए नहीं — ‘पर काज हित’

रहीम ने पहले दो उदाहरण प्रकृति से दिए और तीसरी पंक्ति में उसी नियम को मनुष्य पर लागू कर दिया। इस तरह उपदेश देना नहीं पड़ा — प्रकृति ने अपने आप उपदेश दे दिया। यही इस दोहे की सुंदरता है।

प्रकृति से और क्या-क्या सीख सकते हैं —

प्रकृति का उदाहरणजो वह करती हैहमारी सीख
सूरजबिना भेदभाव के सबको एक-सा प्रकाश देता हैसमानता — अमीर-ग़रीब, अपना-पराया का भेद न करना।
नदीबहती रहती है, रास्ते में पत्थर आए तो मुड़कर आगे निकल जाती हैनिरंतर परिश्रम और धैर्य — रुकावट से लड़ने के बजाय रास्ता निकालना।
फूलकाँटों के बीच रहकर भी सुगंध बाँटता हैकठिन परिस्थिति में भी मिठास और अच्छा स्वभाव बनाए रखना।
चींटीबार-बार गिरकर भी फिर चढ़ती है, और मिलकर काम करती हैलगन, सहयोग और संचय की आदत।
मधुमक्खीअनेक फूलों से थोड़ा-थोड़ा लेकर शहद बनाती हैपरिश्रम, अनुशासन और मिल-जुलकर काम करना।
बादलसमुद्र से लेकर धरती पर बरसा देता हैजो पाया है उसे लौटाना — यही सच्चा परोपकार है।
पहाड़चुपचाप, अडिग खड़ा रहता हैधैर्य और स्थिरता — मुश्किल में विचलित न होना।
बीजमिट्टी में गलकर पूरा पेड़ बन जाता हैआज का छोटा त्याग कल की बड़ी उपलब्धि बनता है।
रहीम ने पेड़ और सरोवर ही क्यों चुने: दोनों एक जगह टिके रहते हैं और फिर भी सारा जीवन देते रहते हैं। न वे मोल-भाव करते हैं, न धन्यवाद माँगते हैं, न देखते हैं कि लेने वाला कौन है। बच्चा भी पेड़ का फल तोड़ ले, पक्षी भी। यही निःस्वार्थ ‘देना’ रहीम को मनुष्य में चाहिए — और यह बात एक बच्चा भी अपनी आँखों से रोज़ देखता है, इसलिए दोहा सीधे मन में उतर जाता है।
याद रखिए: रहीम यह नहीं कह रहे कि धन कमाना बुरा है। वे ‘संपति सँचहि’ — संपत्ति जोड़ो — कह ही रहे हैं। उनका ज़ोर उद्देश्य पर है: जोड़ो, पर दूसरों के काम आने के लिए
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