मल्हार अध्याय 5 सरगम

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
रहीम, कबीर, तुलसी, वृंद आदि के दोहे आपने दृश्य-श्रव्य (टी.वी.-रेडियो) माध्यमों से कई बार सुने होंगे। कक्षा में आपने दोहे भी बड़े मनोयोग से गाए होंगे। अब बारी है इन दोहों की रिकॉर्डिंग (ऑडियो या विजुअल) की। रिकॉर्डिंग सामान्य मोबाइल से की जा सकती है। इन्हें अपने दोस्तों के साथ समूह में या अकेले गा सकते हैं। यदि संभव हो तो वाद्ययंत्रों के साथ भी गायन करें। रिकॉर्डिंग के बाद दोहे स्वयं भी सुनें और लोगों को भी सुनाएँ।
उत्तर

यह करके देखने की गतिविधि है। नीचे पूरी विधि दी गई है — इसी क्रम से कीजिए तो रिकॉर्डिंग एक ही बार में अच्छी बनेगी।

चरण 1 — दोहा चुनिए और अर्थ समझिए। बिना अर्थ समझे गाया दोहा सपाट सुनाई देता है। जिस पंक्ति में चेतावनी है (‘मत तोड़ो छिटकाय’) वहाँ आवाज़ थोड़ी दृढ़ रखिए, और जहाँ कोमल भाव है (‘मिले गाँठ परि जाय’) वहाँ धीमी।

चरण 2 — दोहे की चाल पकड़िए। दोहे की हर पंक्ति दो हिस्सों में बँटी होती है और बीच में ज़रा-सा ठहराव आता है। यहीं से लय बनती है —

रहिमन धागा प्रेम का / मत तोड़ो छिटकाय
टूटे से फिर ना मिले / मिले गाँठ परि जाय

पहले बिना गाए, केवल ताली बजाते हुए इसी ठहराव के साथ बोलिए। लय अपने आप बैठ जाएगी।

चरण 3 — तैयारी।

  • कम-से-कम पाँच बार रियाज़ कीजिए; रटा हुआ दोहा ही आत्मविश्वास से गाया जाता है।
  • समूह में गाना हो तो शुरुआत एक साथ करने के लिए कोई एक साथी हाथ से इशारा करे।
  • ढोलक, मंजीरा, खँजरी या केवल ताली — कोई भी संगत चलेगी। ताल सादा रखिए।

चरण 4 — रिकॉर्डिंग।

  • शांत कमरा चुनिए; पंखा और खिड़की बंद कर लीजिए — पंखे की आवाज़ रिकॉर्डिंग में सबसे ज़्यादा खलती है।
  • मोबाइल को मुँह से लगभग एक बित्ता (20–25 सें.मी.) दूर रखिए और किसी चीज़ पर टिका दीजिए, हाथ में मत पकड़िए।
  • शुरू में दो सेकंड चुप रहिए, फिर बोलिए — “यह दोहा रहीम का है।” फिर गाइए। अंत में भी दो सेकंड चुप रहिए।
  • वीडियो बना रहे हों तो रोशनी आपके सामने हो, पीछे नहीं। खिड़की की तरफ़ मुँह करके खड़े होइए।

चरण 5 — सुनिए और सुधारिए। पहली रिकॉर्डिंग सुनकर जाँचिए — शब्द साफ़ सुनाई दे रहे हैं? कहीं जल्दबाज़ी तो नहीं? लय टूटी तो नहीं? एक बार सुधार कर दोबारा रिकॉर्ड करने से नतीजा बहुत बेहतर हो जाता है।

कक्षा के लिए सुझाव: सब बच्चों की रिकॉर्डिंग मिलाकर एक ‘दोहा-संग्रह’ बना लीजिए और उसे विद्यालय की प्रार्थना-सभा में एक-एक दिन एक दोहे के हिसाब से बजाइए। बच्चों को दोहे बहुत जल्दी याद हो जाएँगे और सुनाने का उत्साह भी बना रहेगा।
दोहा गाया क्यों जाता है: दोहा छपने के लिए नहीं, कंठ से कंठ तक जाने के लिए बना छंद है। इसकी मात्राएँ इतनी संतुलित हैं कि एक बार सुनने पर ही याद रह जाती हैं। यही कारण है कि रहीम और कबीर के दोहे साढ़े चार सौ साल बाद भी उन लोगों को याद हैं जिन्होंने कभी उनकी किताब नहीं देखी।
प्र2.
रहीम, वृन्द, कबीर, तुलसी, बिहारी आदि के दोहे आज भी जनजीवन में लोकप्रिय हैं। दोहे का प्रयोग लोग अपनी बात पर विशेष ध्यान दिलाने के लिए करते हैं। जब दोहे समाज में इतने लोकप्रिय हैं तो क्यों न इन दोहों को एकत्र करें और अंत्याक्षरी खेलें। अपने समूह में मिलकर दोहे एकत्र कीजिए। इस कार्य में आप इंटरनेट, पुस्तकालय और अपने शिक्षकों या अभिभावकों की सहायता भी ले सकते हैं।
उत्तर

यह समूह-कार्य है। पहले दोहे इकट्ठे कीजिए, फिर अंत्याक्षरी खेलिए।

दोहे कहाँ से मिलेंगे —

  • घर से: दादा-दादी और नाना-नानी से पूछिए। सबसे अच्छे और सबसे कम मिलने वाले दोहे यहीं मिलते हैं।
  • पुस्तकालय से: ‘रहीम ग्रंथावली’, ‘कबीर ग्रंथावली’, ‘बिहारी सतसई’, वृंद के ‘वृंद सतसई’ और ‘रामचरितमानस’ के दोहे।
  • इंटरनेट से: खोजते समय कवि का नाम भी लिखिए (‘रहीम के दोहे अर्थ सहित’), और जो मिले उसे शिक्षक से एक बार जँचवा लीजिए — जाल पर बहुत-से दोहे ग़लत कवि के नाम से चढ़े रहते हैं।
  • कक्षा से: हर विद्यार्थी पाँच दोहे लाए तो चालीस बच्चों की कक्षा में दो सौ दोहे इकट्ठे हो जाएँगे।

संग्रह इस तरह बनाइए — केवल दोहा लिखने से काम नहीं चलेगा, तीन खाने बनाइए:

दोहाकविभाव / सीख
“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥”रहीमहर छोटी-बड़ी वस्तु का अपना महत्व है।
“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥”कबीरमीठी वाणी दूसरों को भी सुख देती है और स्वयं को भी।
“तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर॥”तुलसीदासमीठे बोल सबको अपना बना लेने का मंत्र हैं।
“करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥”वृंदनिरंतर अभ्यास से मंदबुद्धि भी विद्वान बन जाता है।
“कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। वा खाए बौराय जग, या पाए बौराय॥”बिहारीधुतूरे से भी सौ गुना अधिक नशा सोने (धन) में होता है।

अंत्याक्षरी के नियम — दोहों की अंत्याक्षरी इस तरह खेली जाती है:

  1. कक्षा दो दलों में बँट जाए।
  2. पहला दल कोई दोहा पूरा सुनाए। अधूरा दोहा मान्य नहीं होगा।
  3. दोहे का अंतिम अक्षर लीजिए। जैसे “…कहा करे तलवारि” का अंतिम अक्षर रि हुआ।
  4. दूसरा दल उसी अक्षर से शुरू होने वाला दोहा सुनाए। अक्षर कठिन पड़े (जैसे ‘ङ’, ‘ञ’) तो उससे पहले वाला अक्षर लिया जा सकता है — यह नियम पहले ही तय कर लीजिए।
  5. तीस सेकंड में उत्तर न आया तो बारी दूसरे दल की।
  6. दोहे के साथ कवि का नाम बताने पर एक अतिरिक्त अंक — इससे बच्चे कवि भी याद रखेंगे।
  7. एक दोहा एक ही बार चलेगा; दोहराने पर अंक कट जाएगा।
दोहे इतने लोकप्रिय क्यों हैं: तीन कारण हैं — छोटे हैं, इसलिए याद हो जाते हैं; लयदार हैं, इसलिए ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं; और बात पूरी कह देते हैं, इसलिए बहस में एक दोहा दस वाक्यों का काम कर देता है। इसीलिए आज भी लोग अपनी बात पर ज़ोर देने के लिए बीच में दोहा टाँक देते हैं।
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