प्र1.
यह पाठ रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का एक अंश है। आत्मकथा यानी अपनी कथा। दुनिया में अनेक लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं, कभी अपने लिए, तो कभी दूसरों के पढ़ने के लिए। (क) इस पाठ को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पाठ की ऐसी पंक्तियों की सूची बनाइए जिनसे पता लगे कि लेखक अपने बारे में कह रहा है।
उत्तर
पहचान का सूत्र — आत्मकथा में लेखक उत्तम पुरुष में लिखता है, यानी ‘मैं, मेरा, मुझे, मैंने, मुझसे’ जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। इसलिए सूची बनाने के लिए पाठ में ‘मैं / मेरा / मुझे’ वाले वाक्य छाँट लीजिए।
पाठ से ऐसी पंक्तियों की सूची —
| क्रम | पाठ की पंक्ति | लेखक अपने बारे में क्या बता रहा है |
|---|---|---|
| 1 | “लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी।” | अपनी इच्छा |
| 2 | “मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था।” | अपना काम |
| 3 | “मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है।” | अपने गुणों का श्रेय किसे देते हैं |
| 4 | “किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।” | अपना स्वभाव |
| 5 | “मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म विरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता।” | अपने जीवन की एक घटना |
| 6 | “किंतु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए।” | अपना निर्णय |
| 7 | “अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।” | अपना सिद्धांत |
| 8 | “जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता।” | अपने जीवन का मोड़ |
| 9 | “यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।” | अपने बारे में आकलन |
| 10 | “उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।” | अपनी कठिनाई |
| 11 | “तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका।” | अपने जीवन की दिशा |
| 12 | “मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है…” | अपनी स्मृति |
| 13 | “इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है…” | अपनी अंतिम इच्छा |
आत्मकथा और जीवनी में अंतर: पाठ के आरंभ का भाग — “श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ बड़े होनहार नौजवान थे…” — जीवनी जैसा है, क्योंकि उसमें कोई और (भगत सिंह और पुस्तक के संपादक) बिस्मिल के बारे में बता रहे हैं; वहाँ ‘वे, उन्होंने, उनकी’ आता है। और “लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी” से जो भाग शुरू होता है वह आत्मकथा है, क्योंकि वहाँ ‘मैं, मेरा’ आता है। सर्वनाम बदलते ही विधा बदल जाती है — यही इस गतिविधि की असली सीख है।