मल्हार अध्याय 6 शब्द-प्रयोग तरह-तरह के

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं।” इस वाक्य में अक्षर-बोध का अर्थ है— अक्षर का बोध या ज्ञान। एक अन्य वाक्य देखिए— “जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं।” इस वाक्य में पढ़ना-लिखना अर्थात पढ़ना और लिखना। हम लेखन में शब्दों को मिलाकर छोटा बना लेते हैं जिससे समय, स्याही, कागज़ आदि की बचत होती है। संक्षेपीकरण मानव का स्वभाव भी हैं। इस पाठ से ऐसे शब्द खोजकर सूची बनाइए।
उत्तर

पाठ में ऐसे मिले-जुले शब्द बहुत हैं। नीचे उनकी सूची है — साथ में यह भी कि हर शब्द किन शब्दों के मेल से बना है और उसका अर्थ क्या है।

1. ‘और’ छिपाकर बने शब्द (दोनों शब्द बराबर हैं, बीच का ‘और’ लुप्त है) —

पाठ का शब्दपूरा रूपअर्थ
पढ़ना-लिखनापढ़ना और लिखनापढ़ाई-लिखाई करना
काम-काजकाम और काजघर के सब काम
सखी-सहेलीसखी और सहेलीसंगिनियाँ, सहेलियाँ
डाँट-फटकारडाँट और फटकारकड़ी बातें सुनना
पालन-पोषणपालन और पोषणपालना और खिलाना-पिलाना
भोग-विलासभोग और विलाससुख-सुविधा का जीवन
जन्म-जन्मांतरजन्म और दूसरे जन्मएक जन्म से दूसरे जन्म तक
सुख-शांति-कांतिमयसुख, शांति और कांति से भरा(कविता ‘ऐ मातृभूमि!’ से)

2. ‘का / की / के’ छिपाकर बने शब्द

पाठ का शब्दपूरा रूपअर्थ
अक्षर-बोधअक्षर का बोधअक्षरों की पहचान
देश-सेवादेश की सेवादेश के लिए किया गया काम
सेवा-समितिसेवा की समितिसेवा-कार्य करने वाली संस्था
गृहकार्यगृह का कार्यघर का काम
प्राणहानिप्राण की हानिजान चली जाना
प्राणदंडप्राण का दंडमृत्युदंड
धर्म-रक्षार्थधर्म की रक्षा के लिएधर्म बचाने के वास्ते
जन्मदात्री / जीवनदात्रीजन्म देने वाली / जीवन देने वालीमाँ
संसार-चक्रसंसार का चक्रदुनियादारी का चक्कर
दुखभरी (खबर)दुख से भरीदुखद समाचार

3. ‘आदि’ लगाकर बनी सूची (एक शब्द में पूरी सूची समा जाती है) — भोजनादि = भोजन आदि (भोजन, जलपान वग़ैरह); शिक्षादि = शिक्षा आदि (शिक्षा, संस्कार वग़ैरह)।

4. एक ही शब्द दोहराकर बने शब्द — ठीक-ठीक (बिल्कुल ठीक), रहते-रहते (रहते हुए ही), बचते-बचाते (बचाव करते हुए), चोरी-छिपे (छिपकर), दो-एक (एक या दो), कौन-कौन (सब कौन-कौन)।

ऐसे शब्द बनते क्यों हैं: पुस्तक ने इसका कारण खुद बता दिया है — समय, स्याही और काग़ज़ की बचत। ज़रा तुलना कीजिए: “माताजी उनसे अक्षरों का बोध किया करती थीं” — नौ शब्द; “माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं” — चार शब्द। अर्थ वही रहा, कहने का ढंग कसा हुआ हो गया। भाषा हमेशा कम शब्दों में ज़्यादा कहने की ओर बढ़ती है।
ख़ुद बनाकर देखिए: अपने आस-पास से ऐसे शब्द छाँटिए — रोटी-पानी, आना-जाना, हँसी-मज़ाक, रख-रखाव, माता-पिता, सुबह-शाम, लेन-देन, चाय-नाश्ता, फल-सब्ज़ी। हर शब्द के आगे उसका ‘पूरा रूप’ लिखिए, तभी अभ्यास पूरा माना जाएगा।
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