बिस्मिल की माताजी केवल ग्यारह वर्ष की आयु में ब्याह कर शाहजहाँपुर आई थीं और उस समय वे “नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान” थीं। इतनी कम उम्र और बिल्कुल नए घर में भी उन्होंने हार नहीं मानी — उन्होंने सीखकर स्वयं को परिवार के अनुकूल ढाल लिया।
उन्होंने यह किया —
- सिखाने वाली को अपनाया: शाहजहाँपुर आने के थोड़े ही दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी और माताजी ने उसे मन लगाकर सीखा।
- जल्दी सीखा: पाठ के शब्दों में — “थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया।”
- ज़िम्मेदारी सँभाल ली: वे “भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं” — यानी घर का रसोई-प्रबंध पूरी तरह उनके हाथ में आ गया।
- घर का माहौल पहचाना: उन्होंने यह भी समझ लिया कि इस घर में दादीजी और पिताजी का मत क्या है और उससे टकराए बिना अपनी बात कैसे रखनी है। इसीलिए वे बेटे की मदद करती रहीं और डाँट भी चुपचाप सह लेती रहीं।