मल्हार अध्याय 6 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ को एक बार फिर से पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। 1. बिस्मिल की माता जी जब ब्याह कर आईं तो उनकी आयु काफ़ी कम थी। (क) फिर भी उन्होंने स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला?
उत्तर

बिस्मिल की माताजी केवल ग्यारह वर्ष की आयु में ब्याह कर शाहजहाँपुर आई थीं और उस समय वे “नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान” थीं। इतनी कम उम्र और बिल्कुल नए घर में भी उन्होंने हार नहीं मानी — उन्होंने सीखकर स्वयं को परिवार के अनुकूल ढाल लिया।

उन्होंने यह किया —

  • सिखाने वाली को अपनाया: शाहजहाँपुर आने के थोड़े ही दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी और माताजी ने उसे मन लगाकर सीखा।
  • जल्दी सीखा: पाठ के शब्दों में — “थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया।”
  • ज़िम्मेदारी सँभाल ली: वे “भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं” — यानी घर का रसोई-प्रबंध पूरी तरह उनके हाथ में आ गया।
  • घर का माहौल पहचाना: उन्होंने यह भी समझ लिया कि इस घर में दादीजी और पिताजी का मत क्या है और उससे टकराए बिना अपनी बात कैसे रखनी है। इसीलिए वे बेटे की मदद करती रहीं और डाँट भी चुपचाप सह लेती रहीं।
‘अनुकूल ढालना’ का मतलब यहाँ क्या है: ध्यान दीजिए — माताजी ने अपने आप को ढाला ज़रूर, पर मिटाया नहीं। घर के काम उन्होंने घर के ढंग से सीखे, पर बेटे की शिक्षा और सेवा-कार्य के सवाल पर वे अपनी बात पर डटी रहीं। सच्चा अनुकूलन यही है — जहाँ सीखना है वहाँ झुक जाना, जहाँ सिद्धांत है वहाँ खड़े रहना
प्र2.
(ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?
उत्तर

बिस्मिल की माँ को पढ़ाने के लिए कोई स्कूल नहीं भेजा गया, कोई मास्टर नहीं रखा गया। उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर पढ़ना सीखा। पाठ में उनका पूरा रास्ता क्रम से दिया गया है —

क्रमउन्होंने क्या कियापाठ के शब्द
1पढ़ने की इच्छा किसी ने जगाई नहीं, स्वयं भीतर से जगी“पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था।”
2देर से ही सही, शुरुआत कर दी — बेटे के जन्म के पाँच-सात वर्ष बाद“मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया।”
3गुरु आस-पास ही ढूँढ़ लिया — मुहल्ले की पढ़ी-लिखी सहेलियाँ“मुहल्ले की सखी-सहेली… उन्हीं में जो शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं।”
4समय निकाला — घर का पूरा काम निपटाने के बाद जो समय बचता, उसी में पढ़तीं“घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करती।”
5परिश्रम का फल — अक्षरों से आगे बढ़कर पूरी पुस्तकें पढ़ने लगीं“परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं।”
6जो सीखा, वह आगे बाँटा — बेटियों को स्वयं पढ़ाया“मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं।”
सबसे बड़ी बात कौन-सी है: इस पूरी सूची में सबसे कठिन काम चौथा है — समय निकालना। घर का सारा काम निपटाने के बाद बचा हुआ समय कितना होता होगा? थोड़ा-सा, और वह भी थकान के बाद। उसी थोड़े-से समय में लगातार पढ़ते रहना ही ‘इच्छाशक्ति’ है। प्रतिभा नहीं, यही निरंतरता उन्हें अक्षर-बोध से पुस्तक-अध्ययन तक ले गई।
याद रखने योग्य: उस ज़माने में लड़कियों की पढ़ाई का चलन ही नहीं था। एक अशिक्षित ग्रामीण कन्या का स्वयं पढ़ना सीखना और फिर अपनी बेटियों को पढ़ाना — यह उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी बात थी।
प्र3.
2. बिस्मिल को साहसी बनाने में उनकी माता जी ने कैसे सहयोग दिया?
उत्तर

बिस्मिल स्वयं लिखते हैं — “मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है।” उनकी माँ ने यह साहस कई तरह से दिया —

  • पहला क़दम उठाने दिया — लखनऊ कांग्रेस में जाने की बिस्मिल की बड़ी इच्छा थी। दादीजी और पिताजी विरोध करते रहे, “किंतु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया।” यहीं से उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हुआ।
  • उत्साह टूटने नहीं दिया — सेवा-समिति के काम पिताजी और दादीजी को पसंद नहीं थे, फिर भी “माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं, जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड सहन करना पड़ता था।” यानी बेटे का साहस बचाने के लिए उन्होंने खुद पर चोट ले ली।
  • विवाह के दबाव से बचाया — दादीजी और पिताजी बार-बार विवाह के लिए कहते, पर माताजी अड़ी रहीं कि “शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।” इससे बिस्मिल को पढ़ने और अपना रास्ता चुनने का समय मिला।
  • दृढ़ता पैदा की — “माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।”
  • संकट में सहारा बनीं — “महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं।”
  • क्रांतिकारी जीवन में साथ दिया — “शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी।”
यहाँ साहस का असली अर्थ: ध्यान दीजिए, माँ ने बिस्मिल को कभी ‘बहादुर बनो’ का उपदेश नहीं दिया। उन्होंने कुछ और किया — जब बेटा सही काम कर रहा था, वे उसके साथ खड़ी हो गईं और उसका ख़ामियाज़ा खुद भुगत लिया। बच्चा साहस उपदेश से नहीं, यह देखकर सीखता है कि उसके पीछे कोई खड़ा है। इसी भरोसे से बिस्मिल में वह दृढ़ता आई कि फाँसी के सामने भी वे विचलित न हुए।
प्र4.
3. आज से कई दशक पहले बिस्मिल की माँ शिक्षा के महत्व को समझती थीं, बताइए कैसे?
उत्तर

बिस्मिल की माँ खुद अशिक्षित रहकर आई थीं, फिर भी वे शिक्षा का महत्व उस ज़माने के बहुत-से पढ़े-लिखे लोगों से बेहतर समझती थीं। इसके चार पक्के प्रमाण पाठ में मिलते हैं —

प्रमाणपाठ की बातइससे क्या सिद्ध होता है
1. स्वयं पढ़ना सीखाबेटे के जन्म के पाँच-सात वर्ष बाद हिंदी पढ़ना आरंभ किया और आगे चलकर देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं।वे जानती थीं कि पढ़ना सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
2. बेटियों को पढ़ाया“मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं।”उस समय जब लड़कियों की पढ़ाई का चलन ही नहीं था, वे बेटियों को पढ़ा रही थीं।
3. विवाह से पहले शिक्षादादीजी और पिताजी विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, पर माताजी यही कहतीं कि “शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।”वे शिक्षा को विवाह से भी ऊपर रखती थीं — और घर के विरोध के सामने डटी रहीं।
4. किताबी शिक्षा से आगे भी सोचालखनऊ कांग्रेस जाने का खर्च दिया; सेवा-समिति के काम में उत्साह भंग न होने दिया।वे समझती थीं कि दुनिया देखना और समाज-सेवा करना भी शिक्षा का ही हिस्सा है।
सबसे प्रभावशाली प्रमाण कौन-सा है: तीसरा। पहले दो में वे अपने और अपनी बेटियों के साथ कुछ कर रही हैं। तीसरे में उन्हें घर के बड़ों से टकराना पड़ रहा है — दादीजी और पिताजी दोनों के विरुद्ध जाकर कहना कि पहले शिक्षा, फिर विवाह। किसी बात का महत्व तभी पूरी तरह समझा हुआ माना जाता है, जब उसके लिए कुछ क़ीमत चुकाने को तैयार हों।
आज से जोड़िए: ‘बेटी पढ़ाओ’ की बात आज नारे के रूप में कही जाती है। बिस्मिल की माँ ने यह काम बिना नारे के, सौ साल से भी पहले, अपने घर में कर दिखाया था।
प्र5.
4. हम कैसे कह सकते हैं कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्र और उदार विचारों वाली थीं?
उत्तर

‘स्वतंत्र विचार’ यानी अपनी बुद्धि से सोचकर निर्णय लेना, केवल घर की परंपरा के पीछे न चलना। ‘उदार विचार’ यानी दिल का बड़ा होना, दूसरों के लिए भी सोचना। बिस्मिल की माँ में दोनों बातें थीं —

स्वतंत्र विचार के प्रमाण —

  • घर के दो बड़ों — दादीजी और पिताजी — के विरोध के बावजूद उन्होंने बेटे को लखनऊ कांग्रेस जाने का खर्च दिया।
  • विवाह के अनुरोध के सामने वे झुकी नहीं — “शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।”
  • बेटे के सेवा-कार्य में उन्होंने साथ दिया, चाहे इसके लिए उन्हें डाँट-फटकार और दंड सहना पड़ा। यानी वे परिणाम जानते हुए भी अपने निर्णय पर टिकीं।
  • अशिक्षित होते हुए भी उन्होंने स्वयं पढ़ना शुरू किया — किसी ने कहा नहीं, “पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था।”

उदार विचार के प्रमाण —

  • सबसे बड़ा प्रमाण उनका वह आदेश है — “अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना।” अपने बेटे के दुश्मन के लिए भी दया माँगना उदारता की सबसे ऊँची सीढ़ी है।
  • बेटियों को पढ़ाना — उस समय के समाज की सोच से आगे बढ़कर।
  • बेटे के आर्यसमाज में जाने पर उन्होंने नाराज़ होकर मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि उससे खुलकर बात की — “जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता।”
  • और इसका परिणाम बिस्मिल स्वयं लिखते हैं — “उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं।”
यह अंतिम पंक्ति सबसे कीमती क्यों है: उदार होने का अर्थ यह नहीं कि आप जन्म से ही सब कुछ जानते हों। असली उदारता यह है कि नई बात सुनकर आप बदलने को तैयार हों। बिस्मिल की माँ ने बेटे से बहस नहीं की, बातचीत की — और अपने विचार बदल लिए। एक बड़े का छोटे से सीख लेना ही खुले मन की सबसे पक्की पहचान है।
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