प्र1.
ऐ मातृभूमि! — “ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो। / प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो। / अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में; / संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो। / तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो। / तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो। / वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझे न भूले, / वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।” — रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ — इस कविता को पढ़िए और समझिए कि कवि क्या कहना चाहता है।
उत्तर
यह कविता उसी लेखक की है जिसकी आत्मकथा आपने अभी पढ़ी — रामप्रसाद ‘बिस्मिल’। पाठ में उन्होंने अपनी जन्म देने वाली माँ को पुकारा था; इस कविता में वे मातृभूमि को माँ मानकर पुकारते हैं। दोनों को साथ पढ़िए तो पाठ का पूरा अर्थ खुल जाता है।
पंक्ति-दर-पंक्ति भाव —
| पंक्ति | भाव |
|---|---|
| “ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो।” | हे मातृभूमि! तेरी जय हो और तू सदा विजयी रहे। कविता का आरंभ ही एक पुकार से होता है। |
| “प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो।” | तेरा हर भक्त सुख, शांति और कांति (तेज) से भरा रहे। कवि अपने लिए नहीं, सबके लिए माँग रहा है। |
| “अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में; संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो।” | अज्ञान की रात में और दुख से भरी दिशाओं में — सारे संसार के हृदय में तेरा प्रकाश उदय हो। कवि चाहता है कि भारत की ज्योति केवल भारत तक नहीं, पूरी दुनिया तक पहुँचे। |
| “तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।” | और यदि तू क्रोध करे, तो वह क्रोध ऐसा हो कि सारे जग को हिला दे। यानी माँ केवल कोमल नहीं, शक्तिशाली भी है। |
| “तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो।” | हमारे आनंद का कारण केवल एक हो — तेरा प्रसन्न होना। अपना सुख नहीं, देश का सुख। |
| “वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझे न भूले, वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।” | मुझे ऐसी भक्ति देना कि सुख के दिनों में भी तुझे भूलूँ नहीं, और ऐसी शक्ति देना कि दुख के दिनों में यह हृदय कायर न बने। |
कविता की भाषा — कौन-कौन-सी विशेषताएँ हैं:
- संबोधन और मानवीकरण — पूरी कविता ‘ऐ मातृभूमि!’ कहकर धरती से सीधी बात करती है, मानो वह जीती-जागती माँ हो जो सुन सकती है, प्रसन्न हो सकती है और क्रोध भी कर सकती है।
- रूपक — “अज्ञान की निशा” में अज्ञान को रात कहा गया है, और “तेरी प्रभा उदय हो” में मातृभूमि की महिमा को सूर्य की प्रभा। पूरा चित्र रात के बाद सूर्योदय का है — यानी अज्ञान के बाद ज्ञान।
- अनुप्रास — “सुख-शांति” में ‘स’ की और “दुख से भरी दिशा” में ‘द’ की आवृत्ति से पंक्तियाँ गाने योग्य बन जाती हैं।
- तुक — हर पंक्ति का अंत ‘…य हो’ पर होता है — जय हो, विजय हो, कांतिमय हो, उदय हो, महाप्रलय हो, विषय हो, हृदय हो। इसी एक तुक से पूरी कविता में प्रार्थना की लय बँध जाती है।
- विरोधी जोड़े — ‘सुख में… दुख में’, ‘भक्ति दे… शक्ति दे’। दोनों को आमने-सामने रखकर कवि जीवन के दोनों छोर एक साथ माँग लेता है।
- कवि का नाम कविता के भीतर — अंतिम दो पंक्तियों में ‘बिस्मिल’ अपना उपनाम स्वयं ले आते हैं। ग़ज़ल में इसे तख़ल्लुस कहते हैं, हिंदी में इसे छाप कहा जाता है — जैसे कबीर ‘कहै कबीर’ और रहीम ‘कहि रहीम’ लिखते थे।
कविता की सबसे बड़ी बात: अंतिम दो पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए। बिस्मिल मातृभूमि से न धन माँगते हैं, न जीत, न लंबी उम्र। वे दो चीज़ें माँगते हैं — भक्ति और शक्ति। और उनके साथ जो शर्तें लगाते हैं वे और भी सुंदर हैं: भक्ति ऐसी हो कि सुख में देश भूल न जाए, और शक्ति ऐसी हो कि दुख में हृदय कायर न हो जाए। लोग प्रायः सुख में देश को भूल जाते हैं और दुख में डर जाते हैं — बिस्मिल ठीक इन्हीं दोनों कमज़ोरियों से बचने की प्रार्थना कर रहे हैं। और उन्होंने जो माँगा, वही करके दिखाया — फाँसी के तख़्ते पर भी उनका हृदय विचलित नहीं हुआ।
पाठ से जोड़िए: ‘मेरी माँ’ में बिस्मिल लिखते हैं — “वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो।” कविता में वे कहते हैं — “वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।” एक ही प्रार्थना दो जगह — एक बार जन्म देने वाली माँ से, एक बार मातृभूमि से। दोनों को साथ रखकर पढ़िए तो पता चलता है कि बिस्मिल के लिए ये दोनों माँएँ अलग नहीं थीं।
करके देखिए: इस कविता को कक्षा में समूह-गान की तरह गाइए। हर पंक्ति के अंत में आने वाला ‘हो’ सबसे मिलकर बोलिए — तब आपको पता चलेगा कि तुक केवल सजावट नहीं होती, वह पूरे समूह को एक लय में बाँध देती है।