प्र1.
माँ से संबंधित पाँच रचनाएँ पुस्तकालय से खोजें और अपनी पत्रिका बनाएँ।
उत्तर
यह एक परियोजना है, जिसमें दो काम हैं — पहले पाँच रचनाएँ खोजना, फिर उन्हें सजाकर अपनी पत्रिका बनाना।
क. रचनाएँ कैसे खोजें —
- पुस्तकालय में हिंदी की कविता-संग्रह और बाल-साहित्य वाली अलमारी देखिए; अनुक्रमणिका (index) में ‘माँ’, ‘माता’, ‘जननी’ शब्द ढूँढ़िए।
- अपनी पिछली कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकें पलटिए — उनमें भी माँ पर रचनाएँ मिल जाएँगी।
- घर के बड़ों से पूछिए — लोकगीतों में माँ पर बहुत कुछ है जो किसी किताब में नहीं मिलता। एक लोकगीत ज़रूर शामिल कीजिए, वह आपकी पत्रिका की सबसे अनोखी चीज़ होगी।
- हर रचना का कवि/लेखक का नाम और पुस्तक का नाम साथ में लिख लीजिए — बिना स्रोत के रचना अधूरी है।
ख. खोजने के लिए कुछ जानी-मानी रचनाएँ —
| रचना | रचनाकार | क्यों पढ़ें |
|---|---|---|
| ‘ऐ मातृभूमि!’ | रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ | आपके इसी पाठ में ‘झरोखे से’ के अंतर्गत दी गई है — पत्रिका की शुरुआत इसी से कीजिए। |
| ‘मातृभूमि’ | सोहनलाल द्विवेदी | आपकी इसी पुस्तक मल्हार का पहला पाठ। धरती को माँ कहकर पुकारने वाली कविता। |
| ‘माँ कह एक कहानी’ | मैथिलीशरण गुप्त | ‘यशोधरा’ से लिया गया प्रसिद्ध अंश — बालक राहुल माँ से कहानी सुनने की ज़िद करता है। |
| ‘मेरी माँ’ (आत्मकथा-अंश) | रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ | आपका यही पाठ — गद्य में लिखी गई माँ की सबसे मार्मिक याद। |
| ‘जो बीत गई’ / माँ पर लिखे गीत | हरिवंशराय बच्चन, सुभद्राकुमारी चौहान, महादेवी वर्मा आदि | इन कवियों के संग्रहों में माँ और ममता पर अनेक रचनाएँ मिलेंगी। |
| अपने क्षेत्र का कोई लोकगीत या लोरी | लोक (अज्ञात) | दादी-नानी से सुनकर लिखिए — इसे लिख लेने से एक बोलती हुई रचना बच जाती है। |
ग. पत्रिका कैसे बनाएँ —
- नाम रखिए: पत्रिका को एक नाम दीजिए, जैसे ‘माँ’, ‘ममता’, ‘आँचल’ या ‘मेरी माँ’। ऊपर अपनी कक्षा और वर्ष लिखिए।
- अनुक्रमणिका: पहले पन्ने पर पाँचों रचनाओं के नाम और पृष्ठ-संख्या लिखिए।
- हर रचना के लिए एक पन्ना: ऊपर रचना का नाम और रचनाकार, बीच में रचना, और नीचे दो-तीन पंक्तियों में — “मुझे इसमें क्या अच्छा लगा”।
- सजाइए: हाथ से बनाया चित्र, रंगीन बॉर्डर या कोई पुरानी तस्वीर लगाइए। कटिंग-चिपकाई से पन्ना जीवित हो उठता है।
- अपना पन्ना जोड़िए: अंत में एक पन्ना अपनी लिखी कविता या अपनी माँ पर लिखे दस वाक्यों का रखिए। यही पत्रिका का सबसे क़ीमती पन्ना होगा।
- अंतिम पन्ना — आभार: जिन लोगों ने रचनाएँ ढूँढ़ने में मदद की, उनका नाम लिखिए।
पत्रिका बनाने से क्या सीखते हैं: रचनाएँ पढ़ लेना एक बात है, उन्हें चुनना, क्रम में लगाना और अपनी टिप्पणी जोड़ना दूसरी बात। इसी दूसरी बात में असली पढ़ाई है — क्योंकि तब आपको तय करना पड़ता है कि कौन-सी रचना पहले आए और क्यों। यही काम एक संपादक करता है।
कक्षा के लिए सुझाव: सभी समूहों की पत्रिकाएँ एक दिन कक्षा में मेज़ पर सजाइए और सब एक-दूसरे की पत्रिका पढ़ें। हर पत्रिका के अंत में एक ख़ाली पन्ना रखिए, जिस पर पढ़ने वाले अपनी दो पंक्ति की टिप्पणी लिख सकें।